संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुद्ध और दूषित रज-वोध्यकी पहचान ।
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२—दूषित रज ।
१. वातमें दूषित रज ।
१. ऐसे दूषित रजका रंग लालीमें काला लिये होता है और कुछ रुक कर निकलता है । (सुश्रुत)
२. ऐसे रजका रंग कुसुमके पतले और मुलायम फूलके समान होता है । खावके समय कमर और योनिमें पीड़ा तथा ज्वर भी होता है । (श० क०)
२. पित्तसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लालीमें पीला लिये कुछ नीला होता है और निकलनेके समय दाह उत्पन्न करता है। (सुश्रुत)
२. ऐसे रजका रंग जामुनके फलसे मिलता हुआ होता है खावके समय कुछ पीड़ा और जलन होती है । (श० क०)
३. कफसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लालीमें सफेदी या पीलापन लिये होता है, और खावके समय दर्द पैदा करता है । (सुश्रुत)
२. ऐसा रज कुछ थोड़ा भागदार और खावके समय नाभीके नीचे दर्द पैदा करता है । (श० क०)
४. रक्तमें दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लाल होता है । मुरदेकी सी दुर्गंध आती है । अधिक खाव होता है और दाह उत्पन्न करता है । (सुश्रुत)
५. कफ और वायुसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लाली लिये होता है और कुटकी सी गांठे पड़ी रहती है । खावमें कष्ट होता है । (सुश्रुत)