संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें६
सन्तति-शास्त्र ।
८ पित्त और कफसे दूषित रज ।
१ ऐसे रजका रंग लाली लिये पीप सरीखा गाढ़ा और वद्वृद्धार होता है । (सुश्रुत)
७ पित्त और वायुसे दूषित रज ।
१. ऐसा रज क्षीण होता है और कष्टसे निकलता है । (सुश्रुत)
८ निद्रोष ( बात पित्त-कफ ) से दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लालीमें म्याही और पीलापन लिये होता है । इसमें मल और सूत्रकी सी दुर्गंध आने लगती है । (सुश्रुत)
२. ऐसा रज गरम, भागदार कष्टसे निकलने और दाह उत्पन्न करनेवाला होता है । (सुश्रुत)
इन आठ प्रकारोंमेंसे नम्बर १-२-३ के रोगचाली स्त्रियाँ निरोग हो सकती हैं, बाकी लगभग असाध्य हैं ।
( सु० न० अ० २ श्लो० ४ )
१. शुद्ध वीर्य ।
१ बिल्लीरी पत्थरके समान, सफेद, पतला, चिकना और मीठा, जिसमें शहदकी सी सुगंध आती हो । कोई वैद्य तेल और गहदके समान वीर्यको भी शुद्ध मानते हैं ।
( सु० स० अ० २ श्लो० १६ )
२- पानी मे डालनेसे ह्वने और कष्टसे न निकलनेवाला वीर्य शुद्ध होता है ।
( श० क० )