भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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पृष्ठ 29

सन्तति-शास्त्र ।

८ पित्त और कफसे दूषित रज ।

१ ऐसे रजका रंग लाली लिये पीप सरीखा गाढ़ा और वद्वृद्धार होता है । (सुश्रुत)

७ पित्त और वायुसे दूषित रज ।

१. ऐसा रज क्षीण होता है और कष्टसे निकलता है । (सुश्रुत)

८ निद्रोष ( बात पित्त-कफ ) से दूषित रज ।

१. ऐसे रजका रंग लालीमें म्याही और पीलापन लिये होता है । इसमें मल और सूत्रकी सी दुर्गंध आने लगती है । (सुश्रुत)

२. ऐसा रज गरम, भागदार कष्टसे निकलने और दाह उत्पन्न करनेवाला होता है । (सुश्रुत)

इन आठ प्रकारोंमेंसे नम्बर १-२-३ के रोगचाली स्त्रियाँ निरोग हो सकती हैं, बाकी लगभग असाध्य हैं ।

( सु० न० अ० २ श्लो० ४ )

१. शुद्ध वीर्य ।

१ बिल्लीरी पत्थरके समान, सफेद, पतला, चिकना और मीठा, जिसमें शहदकी सी सुगंध आती हो । कोई वैद्य तेल और गहदके समान वीर्यको भी शुद्ध मानते हैं ।

( सु० स० अ० २ श्लो० १६ )

२- पानी मे डालनेसे ह्वने और कष्टसे न निकलनेवाला वीर्य शुद्ध होता है ।

( श० क० )