भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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शुद्ध और दूषित रज-वीर्यकी पहचान ।

२. दूषित वीर्य ।

वायुसे दूषित वीर्य ।

१. ऐसे वीर्यका रंग कुछ लालऔर कालापन लिये होता है और कुछ रक्त रक्तरक्त निकलता है । (सुश्रुत)

२. ऐसा वीर्य भारादार, शुष्क पिच्छिल और कष्टसे निकलता है । (श० क०)

पित्तसे दूषित वीर्य ।

१. ऐसा वीर्य पीली और नीली रंगतका होता है, निकलने में दाह उत्पन्न करता है । (सुश्रुत)

२. ऐसा वीर्य नीले और पीले रंगका, गरम दुर्गन्धयुक्त और निकलनेमें दाह उत्पन्न करता है । (श० क०)

कफसे दूषित वीर्य ।

१. ऐसे वीर्यका रंग सफेदीसे ज़रा पीलापन लिये होता है और निकलनेमें दर्द पैदा करता है । (सुश्रुत)

२. ऐसा वीर्य गिलगिला हो जाता है । कफके कारण निकलनेका मार्ग रुक जाता है, और इसी कारण कष्ट होता है । (श० क०)

वृन्मसे दूषित वीर्य ।

१. ऐसे वीर्य का रंग लाल होता है, सुरदेकोसी दुर्गन्ध आती है; बहुत निकलता है और जलन होती है । (सुश्रुत)

२. अतिमैथुन, वस्तिस्थान, लिंग और आस पासके स्थानों में चोट लगने या वीर्य कम होनेसे जो वीर्य निकलता है, उसमें रक्त मिला होता है । (श० क०)

रक्त और वायुसे दूषित वीर्य ।

१. ऐसे वीर्यमें गाठें पड़ जाती हैं और निकलनेमें कष्ट होता है । (सुश्रुत)