संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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सन्ताति-शास्त्र ।
३. ऋतु-धर्ममें कर्म ।
४. रजोधर्मके समय नारीके दोनों ओर ओर नीचे टट्टा ।
२. बचपनमें उत्पन्न होनेवाले रोग ।
१. समयके पहले रजस्वला होना । यह उसी समय होना है जब कि कन्याई जल्द सयानी हो जावे और सब बालोंको समझने लगे । यह रोग भ्रनी और शौकीन घरोंकी कन्याओंको विशेष होता है, इसके अनेक कारण हैं ।
१. बुरी सङ्गनका होना ।
२. मिलने और साथ रहनेवाली स्त्रियोंकी हँसी, टिल्लगी और मजाक ।
३. हँसी मजाक और ऐश्यों तथा मनोरञ्जनभरी पुस्तकों का पढ़ना ।
४. ऐसे नये ढंगका अन्हूटा न्यूनाग कि जिससे शीघ्र कामोद्दीपन हो ।
५. ऐसा बुरा व्यवहार कि जिससे पुस्तकोंमें पढ़ी और स्त्रियां या बराबरकी अवस्थावाली कन्याओंसे सुनी बात सच्ची मालूम हो ।
३. जवानीमें उत्पन्न होनेवाले रोग ।
१. चोट--
यह दो प्रकारकी होती हैं (१) पेटके ऊपरसे लगनेवाली । (२) मँथुनकी असावधानीसे लगनेवाली ।
दोनों प्रकारकी हलकी चोटोंमें थोड़ा टट्टा होता है और आप ही अरुद्ध हो जाता है, परन्तु अधिक चोट लगनेसे अण्डेमें सूजन आ जाती है, और भवाद भी पैदा हो जाता है ।