भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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अण्डोंके रोग ।

१३

अण्डोंकी सूजन ।

यह दो प्रकारकी होती हैं 'नई' और 'पुरानी' ।

१. 'नई सूजन' । यह कभी एक और कभी दोनों अण्डोंमें होती है । ऐसा भी होना है कि एकमें कम और दूसरेमें अधिक हो । इसके अनेक कारण हैं ।

१. पेटके ऊपरकी गहरी चोटसे ।

२. रति समयकी असावधानीसे ।

३. गुरदेके अनेक रोगोंसे ।

४. किसी प्रकार अण्डोंपर सर्दीके पहुँच जानेसे ।

५. गर्भाशयके अनेक रोगोंसे ।

६. रक्त-विकारके अनेक उपद्रवोंसे ।

७. पेटके अस्तरकी भिल्लीमें सूजन होनेसे ।

८. रति समयमें स्त्रीको संतोष न होनेसे ।

९. अति मैथुनसे ।

१०. मंदिरा अधिक पीनेसे ।

११. प्रदरके बढ़ने और उसके उपद्रवोंसे ।

१२. जलन उत्पन्न होनेवाली औषधिका गर्भाशयमें लगानेसे ।

१३. खराब खूनवाले पुरुषके साथ संयोगसे । जैसे— कोढ़, गरमी, और सूजाक इत्यादिका रोगी ।

१४. अण्डोंसे संबंध रखनेवाली नलियोंकी सूजन और इनके दूसरे रोगोंसे ।

१५. योनिसे संबंध रखनेवाले संकामक रोगोंके होनेसे जैसे—गरमी और सूजाक ।

१६. अतु बन्द हो जाने या अधिक होने या चार छः मासमें एक दो चार होने या थोड़ा थोड़ा होनेसे ।