संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंअण्डोंके रोग ।
१३
अण्डोंकी सूजन ।
यह दो प्रकारकी होती हैं 'नई' और 'पुरानी' ।
१. 'नई सूजन' । यह कभी एक और कभी दोनों अण्डोंमें होती है । ऐसा भी होना है कि एकमें कम और दूसरेमें अधिक हो । इसके अनेक कारण हैं ।
१. पेटके ऊपरकी गहरी चोटसे ।
२. रति समयकी असावधानीसे ।
३. गुरदेके अनेक रोगोंसे ।
४. किसी प्रकार अण्डोंपर सर्दीके पहुँच जानेसे ।
५. गर्भाशयके अनेक रोगोंसे ।
६. रक्त-विकारके अनेक उपद्रवोंसे ।
७. पेटके अस्तरकी भिल्लीमें सूजन होनेसे ।
८. रति समयमें स्त्रीको संतोष न होनेसे ।
९. अति मैथुनसे ।
१०. मंदिरा अधिक पीनेसे ।
११. प्रदरके बढ़ने और उसके उपद्रवोंसे ।
१२. जलन उत्पन्न होनेवाली औषधिका गर्भाशयमें लगानेसे ।
१३. खराब खूनवाले पुरुषके साथ संयोगसे । जैसे— कोढ़, गरमी, और सूजाक इत्यादिका रोगी ।
१४. अण्डोंसे संबंध रखनेवाली नलियोंकी सूजन और इनके दूसरे रोगोंसे ।
१५. योनिसे संबंध रखनेवाले संकामक रोगोंके होनेसे जैसे—गरमी और सूजाक ।
१६. अतु बन्द हो जाने या अधिक होने या चार छः मासमें एक दो चार होने या थोड़ा थोड़ा होनेसे ।