भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

१४

१७ हिस्टीरियाके दौरेके समय जब अतुल्यमं होनेवाला हो तो अण्डोंमें रक्तके डकड़ा हो जानेसे ।

२ 'पुरानी सूजन'—नई सूजन जब अच्छी नहीं होती तो कुछ दिनों पीछे वह पुरानी हो जाती है। इन दोनों प्रकारकी सूजनमें अनेक लक्षण होते हैं।

१. पेड़ और साथियोंमें दर्द होना ।

२. पेड़के एक और या दोनों ओर दर्द होना । जब एक ओरका अण्ड सूजा होता है तो एक ओर, और दोनों ओरके सूजने पर दोनों ओर दर्द होता है ।

३. रजस्वला होनेमें रक्तका कम या अधिक आना या एकादम बन्द हो जाना ।

४. रक्त रक्त कर पीड़ा होना, जब कि सूजन हलकी हो।

५. सूजन बढ़ने पर वरावर और अधिक पीड़ा होना ।

६. रजोदर्शनके समय दर्द का बढ़ जाना ।

७. जिस ओरका अण्ड सूजा हो उस ओरकी जाँगमें दर्द होना ।

८. ज्वर, कन्डियत, छाती और पेटमें जलन होना ।

९. मूत्रका थोड़ा थोड़ा आना और जलन होना ।

१०. मँथुनमें पीड़ा होना ।

११. रोग बढ़नेपर पेड़ से अण्डोंतक तथा अण्डोंसे संबंध रखनेवाली नस्ती और नलियोंमें दर्द ।

१२. दूसरे रोगोंके मिलने और उपद्रवोंके बढ़ जानेसे उन्माद होना ।

१३. कुपच, उपकार्द और धुमनीका होना ।

१४, बड़े हुए रोगमें सन्निपातकीसी दशाका होना ।

१५, बड़े हुए रोगमें मूली और दस्तका होना ।