संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअण्डोके रोग ।
१५
१६. अन्तिम दशामें पेटके अस्तरकी फिल्ली सूजन आ जाता है ।
१७ ज्यों ज्यों रोग बढ़ता जाता है कष्ट भी उसीके साथ बढ़ता जाता है ।
३. अण्डोका एक जाना—
१. यह रोग अण्डोकी सूजनके पीछे होता है । ऐसी दशामें मवाद दो तरहसे निकलती है ( १ ) चीर कर ( २ ) आपही आप फूट कर ।
जो मवाद आप ही फूटकर निकलती है वह दो ओरको जाती है ( १ ) भगकी ओर ( २ ) पेटके अस्तरकी फिल्लीसे फूटकर भीतरकी ओर । चीरकर निकाल लेना अथवा भगकी ओरसे निकल जाना अच्छा है, परन्तु फिल्लीका टूट जाना मौतकी निशानी है । इसके अनेक कारण हैं ।
१. अण्डोकी सूजनके समय ज्वरका आना अथवा कुछ दिनोंतक उसका बराबर रहना ।
२. सूजनके समय अण्डोमें चाँट लगना ।
३. रक्त-विकारसे ।
इसके निम्नलिखित लक्षण हैं ।
१. ऊपर कहे हुए अण्डोकी सूजनके सारे लक्षण ।
२. खड़े होनेमें पीड़ा ।
३. पीड़ासे कमर झुक जाना और चलते समय पैरोंका थराना ।
४. अण्डोका भंश ।
१. यह कठिन रोग है । इसमें दोनों ओर या एक ओरका अण्डा अपने स्थानसे खसक कर पीछे या योनि-द्रोणमें आ जाता है । इसके अनेक कारण हैं ।