संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 302 में से
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सन्तति-शास्त्र ।
१. अरण्डोंमें रक्तका जमाव होनेमें या और किसी कारण वजन बढ़ जानेसे ।
२. गर्भाशयके हटनेसे ।
३. फलवाहिनी नलीके विकार या उसके टेढ़े होनेसे ।
४. कड़ी चोट या दबाव पहुँचनेसे ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. पाखना जाते समय पेड़ और अरण्डोंके स्थानोंमें दर्द होता ।
२. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट होता ।
३. पेड़ और अरण्डोंकी जगह दवानेसे पीड़ा होता ।
४. घुमनी पेटका भारीपन और कुपच होता ।
५. जिस और अण्ड भुका हो उधर के पेड़में दर्द होता ।
अण्डोंकी गाँठें ।
१ ये दो प्रकारकी होती हैं ।
(१) शैलीदार ।
(२) गूच मरी हुई दोस ।
२ शैलीदार गाँठें तीन प्रकार की होती हैं ।
(१) मामूली ।
(२) जिसमें कुछ गाढ़ा पदार्थ रहता है ।
(३) जिसमें चरबीका भाग होता है ।
दोस और तीसरी तरहकी गाँठें बहुत कम पाई जाती हैं । ये अण्डोंपर होती हैं । प्रायः अण्डों और गर्भाशयके बीचमें भी पाई जाती हैं । प्रारम्भमें कुछ जान नहीं पड़ता, पर गाँठें ज्यों ज्यों बढ़ती जाती हैं, त्यों त्यों कष्ट भी बढ़ता जाता है । रोग उत्पन्न होने ही सारे लक्षण प्रकट नहीं होते । विषवा और कुमारी