संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरडोके रोग ।
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स्त्रियों में यह रोग अधिक होता है । पहले पहल प्रायः तीन लक्षण होते हैं ।
१. मैथुनमें कष्ट ।
२. पाचनशक्तिका कम हो जाना ।
३. रजो-धर्मका न होना या थोड़े कष्टके साथ होना ।
रोगके साथ पेटकी सूजन बढ़ती जाती है । मुख, हाथ-पांव और पेटसे गर्भके लक्षण प्रगट होते हैं । पेशी दशामें जब रजोधर्म बन्द होजाता है, तो गर्भका सन्देह होता है । जिनके रजोधर्म बन्द नहीं होता उनके मोटे होनेका सन्देह रहता है । कुछ दिन बीतनेपर अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. हथेली, तलुचे और भगमें जलन उत्पन्न होना ।
२. आंतोंका भारी पड़ जाना ।
३. पेशाबका रक्त २ कर आना ।
४. सिवा पेटके और सब अङ्गोंसे क्षय (तपेदिक) के लक्षण प्रतीत होना ।
५. बड़े हुए रोगमें सारे शरीर में कठिन पीड़ा होना ।
६. फेफड़ेका विगड़ जाना और साँसका जल्दी चलना ।
७. सारे शरीरका पीला पड़ जाना ।
८. खड़े करके देखनेमें गाँठोंका दिखलाई देना ।
९. अत्यन्त बड़े रोगमें सारे शरीरपर सूजन का होना ।
यह रोग बहुत धीरे धीरे होता है । इसके तीन तीन चार चार वर्षके रोगी पाए जाते हैं । इतने दिनोंमें गाठों से सारा पेट भर जाता है । सबसे अच्छा इलाज चीरकर गाठें निकाल लेना है ।
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