संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगर्भाशयके रोग ।
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इसमें रक्ख की भाँति फैलने और सुकड़ने की शक्ति होती है आकार ठीक एक नासपाती (Pyiform) के समान होता है ।
वैद्यक का मत है कि स्त्रियों की योनि शंख की नाभी के आकार की तीन फेरवाली होती है । उसके तीसरे फेर में गर्भाशय रोह मछली के मुख के सदृश और उसीके समान होता है ।
( सु० श० ३० ४९ व ५० )
यह तीन भागोंमें बँटा रहता है । ऊपरके भागको (Fundus) कहते हैं । दूसरा नीचे का पतला भाग, इसको गर्दन या शीवा ( Cervix ) कहते हैं । यह सुराही की भाँति लम्बा और गोल योनि तक होता है । मुख ऊपरी भागमें आगेकी दीवारके ओर होता है । लम्बाई स्त्रीके शरीरकी लम्बाईके अनुसार होती है । इसका भीतरी मुख गर्भाशयमें रहता है । तीसरा बीचका भाग कि जिसको गर्भाशय (Body) कहते हैं, पोला होता है । इसके दोनों ओर टहिन बायें अण्ड और अण्डवाहक नालियोंके छेद होते हैं इसी गस्ते से रज गर्भाशयमें पहुँचता है । गर्भाशय इतना छोटा होने पर भी गर्भके पूरे दिनों तक पच्चीस गुना बढ़ जाता है । यह हर समय गर्भ धारण नहीं करता । वैद्यक का मत है कि जिस प्रकार सन्ध्या होने पर कमल बन्द हो जाता है उसी तरह रजोदर्शनसे सोलह रात्रि बीत जाने पर गर्भाशय का मुख बन्द हो जाता है ( सु० श० अ० ३२ लो० ८ ) इसके बाद गर्भाशय गर्भ धारण नहीं करता, परन्तु अर्द्धरात्रि ऋतुमती होने पर गर्भ धारण होता है । इस बिषयपर आगे लिखा जायगा ।
(६) गर्भाशय के रोग ।
यह कह चुके हैं कि गर्भाशय वह जगह है कि जहाँ बच्चा