संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 302 में से
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सन्तति-शास्त्र ।
रहता है । इसमें नाना भाँति के रोग उत्पन्न हो जाते हैं और उनके अनेक भेद हैं ।
१—गर्भाशय के बाहरी मुखका छोटा होजाना ।
इसके दो भेद हैं—
१ जन्म से छोटा होना ।
२ समय पाकर छोटा होना ।
१ पहला भेद—जन्म से छोटा होना ।
यह रोग गर्भ से ही होता है । इसका कारण यह है कि—
१. जब माता पिता के मिले हुये रज-वीर्य में जिस अवयव के बनाने का अशक्त कम होता है, वह अवयव गर्भ में अधूरा बन जाता है ऐसेही इसको भी समझना चाहिये ।
ऐसी दशा में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. ऋतु, धर्मकी रुकावट ।
२. गर्भाशय में रज इकट्ठा हो जाने से सूजन ।
३. गर्भाशय से संबंध रखने वाली दन्तियों की सूजन ।
४ रजकी गर्भा से भीतरी अवयव के किसी भाग का पक जाना ।
५ रजका अत्यन्त कष्ट से निकलना ।
६ पैड़, पीठ और साँथलों में पीड़ा ।
७ दर्द के कारण स्त्री का ठीक तौर से खड़ा न हो सकना ।
८ छातियों में दर्द, पेट में अपफार और असुविधा ।
९ सरदर्द, पेटमें जलन और कन्क ।
यह कठिन रोग है इसके बढ़ जाने पर रोगी की दशा बिगड़ जाती है ।