भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

रहता है । इसमें नाना भाँति के रोग उत्पन्न हो जाते हैं और उनके अनेक भेद हैं ।

१—गर्भाशय के बाहरी मुखका छोटा होजाना ।

इसके दो भेद हैं—

१ जन्म से छोटा होना ।

२ समय पाकर छोटा होना ।

१ पहला भेद—जन्म से छोटा होना ।

यह रोग गर्भ से ही होता है । इसका कारण यह है कि—

१. जब माता पिता के मिले हुये रज-वीर्य में जिस अवयव के बनाने का अशक्त कम होता है, वह अवयव गर्भ में अधूरा बन जाता है ऐसेही इसको भी समझना चाहिये ।

ऐसी दशा में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।

१. ऋतु, धर्मकी रुकावट ।

२. गर्भाशय में रज इकट्ठा हो जाने से सूजन ।

३. गर्भाशय से संबंध रखने वाली दन्तियों की सूजन ।

४ रजकी गर्भा से भीतरी अवयव के किसी भाग का पक जाना ।

५ रजका अत्यन्त कष्ट से निकलना ।

६ पैड़, पीठ और साँथलों में पीड़ा ।

७ दर्द के कारण स्त्री का ठीक तौर से खड़ा न हो सकना ।

८ छातियों में दर्द, पेट में अपफार और असुविधा ।

९ सरदर्द, पेटमें जलन और कन्क ।

यह कठिन रोग है इसके बढ़ जाने पर रोगी की दशा बिगड़ जाती है ।