संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंगर्भाशयके रोग ।
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गर्भाशयका कुछ भाग सड़ जाता है । जब रोग बढ़ जाता है, तो स्त्री बन्ध्या हो जाती है ।
१३. गर्भाशयमें दाने पड़ जाना ।
इसके कई कारण हैं ।
१. रक्त-विकारसे ।
२. रज अशूद्ध होनेसे ।
३. बच्चा पैदा होते समयमें गन्धगी पहुँचनेसे ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. पेट्टु दवानेसे दर्द होना ।
२. कभी रक्त और कभी मवाद मिले हुए रक्तका निकलना ।
३. रक्तमें बदबू आना ।
इस रोगमें गर्भाशयकी श्रीवापर छोटे छोटे दाने पड़ जाते हैं और एक दूसरे सम्बन्धसे बढ़ते जाते हैं ।
१४. गर्भाशयके धाव ।
ये दो प्रकारके होते हैं । ( १ ) बाहरी और ( २ ) भीतरी ।
१. बाहरी धाव—इसके अनेक कारण हैं ।
१. गर्भाशयमें बाहरसे चोट लगनेपर ।
२. रज और फिल्लीके फट जानेपर ।
३. गर्भाशयमें धमक पहुँचनेपर ।
२. गर्भाशयके भीतरी धाव—इसके अनेक कारण हैं ।
१. मरे हुए बालकके खोंचनेमें रंगड़ लगने या चोट लगनेसे ।
२. रज वा किसी फिल्लीके फट जानेसे ।
३. जनन समयमें दर्दकी अधिकतासे ।
४. गर्भाशयमें सूजन और फुसियोंके उत्पन्न होनेसे ।
५. बच्चा कठिनाईसे पैदा होना ।