भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] ˙ भाषाटीकासमेत । (९३) चाहियें । दृष्टान्त-केवल प्रदीपप्रभा कहते तो उत्तरोत्तरप्रभामे अप्रकाशित अर्थ प्रकाशक न होनेसे दृष्टान्तसाधन विकल होगा और स्वनिवर्त्यवस्त्वन्तरपूर्वकत्व न होनेसे साध्य विकल भी होगा अतः तद्व्यावृत्तिके लिये प्रथमोत्पन्नत्वविशेषण दिया। दिनमें प्रथमोत्पन्न दीपप्रभामें भी अप्रकाशित वस्तु प्रकाशकत्व न होनेसे साधन वैकल्य होगा अतः तद्व्यावृत्तके लिये अन्धकार पद है। यदि कहो जालोकाभाव या रूपदर्शनाभाव तम (अन्धकार) है तथा च भावरूप अज्ञानमें दृष्टान्त कैसा होगा सो ठीक नहीं चलनादि क्रिया और नीलादि रूपवान् होनेसे अन्धकार भी द्रव्यही है अतएव कहा है "तमोनाम द्रव्य बहलविरल मेचकचल प्रतीत केनापि क्वचिदपि न बाधश्च ददृशे । जतः कल्प्यो हेतुः प्रमितिरपि शाब्दी विजयते निरालोक चक्षु प्रथयति हि तद्दर्शनवशात् ॥" इति ॥ इति अविद्यानुमानपूर्वपक्ष ॥ १३ ॥ तदपि न क्षोदक्षमम् अज्ञानेऽप्यनभिमताज्ञानान्तरसाधने अपसिद्धान्तापातात् । तदसाधने अनैकान्तिकत्वात् ॥ १४ ॥ उक्त अविद्यानुमानका खण्डन-(तदपिन क्षोदक्षममित्यादि) तात्पर्य-अद्वैतवादी प्रमाणज्ञानको अज्ञान (अविद्या) मूलकत्व मान लेते हैं. उस अज्ञानके मूलभूत अज्ञानान्तर नहीं मानते हैं अब उक्त अनुमानसे अज्ञानको भी अज्ञानान्तरमूलक मानोगे तो सिद्धान्त विरुद्ध होगा अतः स्वसिद्धान्त रक्षाके लिये अज्ञानमे अज्ञानान्तरमूलकत्व नही साधन करोगे तो अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वरूप हेतु साध्या- भाववान्में रहनेवाला होनेसे अनेकान्तरूप हेत्वाभास दूषित होगा। तात्पर्य यह है कि अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वरूप हेतुसे ज्ञायमान (स्वप्रागभावेत्यादि) साध्यविषयक अनुमितिको भी अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वस्वीकार करना होगा अन्यथा प्रकाशितार्थ प्रकाशकत्व अथवा अप्रकाशकत्व होगा । एवञ्च तादृश अनुमितिमैं हेतु तो रह गया. परन्तु अनुमातकविषयीभूत अज्ञानका आदरक अज्ञानान्तर न मान- नेसे स्वविषय आवरण पूर्वकत्वरूप साध्य न होनेसे हेतुका अनैकान्त्य होगा ॥ १४ ॥ दृष्टान्तस्य साधनविकलत्वाच्च न हि प्रदीपप्रभाया अप्रका- शितार्थप्रकाशकत्वं सम्भवति ज्ञानस्यैव प्रकाशकत्वात् सत्यपि प्रदीपे ज्ञानेन विना विषयप्रकाशासम्भवात् प्रदीपप्र- भायास्तु चक्षुरिन्द्रियस्य ज्ञानं समुत्पादयतो विरोधि सन्त- सनिरासनद्वारेणोपकारकत्वमात्रमेवेत्यलमतिविस्तरेण ॥ प्रतिप्रयोगश्च विवादाध्यासितमज्ञानं न ज्ञानमात्रब्रह्माश्रितम् ।