सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ रामानुज- भूषण असम्भव है तिसी प्रकार भावरूप अविद्याका प्रत्यक्षभी असम्भव है । न्का भावरूप और ज्ञानप्रागभावरूप दोनों पक्षमें दूषण भूषण समान है । ( तथा हीति ) अज्ञानके आश्रयरूपसे और विषयतारूपसे व्यावर्तक प्रत्यगात्मा भासमान है या नही ? यदि प्रत्यगात्मा भासमान है तो स्वरूपज्ञानसे निवर्तनीय अज्ञान स्वरूप ज्ञानभासित होनेपर कैसे रहसकता है? यदि नही प्रतिपन्न हो तो व्यावर्तकके आश्रय और विषय शून्य अज्ञानका अनुभवही कैसे होगा ? यदि कहो स्वरूपका विशद रूपसे अवभास ( ज्ञान ) अज्ञानका विरोधी है । अविशदरूपज्ञान अज्ञानका विरोधी नहीं है यहाँपर अविशदरूप प्रतीत होता है अतः आश्रय और विषय- ज्ञान होनेपरभी अज्ञानानुभवमे कोई विरोध नहीं प्रत्यगात्माके प्रमाणज्ञानसे जो अवभास है उसको विशदावभास कहते हैं । यह समाधान ज्ञानप्रागभाव पक्षमें भी समान है केवलभावपक्षमें हठके सिवाय कुछ विशेष नहीं है अतः उभयपक्षसिद्ध अज्ञानज्ञानका अभावरूपही है भावरूप नहीं है ॥ इत्यविद्याप्रत्यक्षखण्डनम् ॥ १२ ॥ अस्तु तर्ह्यनुमानं विवादास्पदं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरि- क्तस्वविषयावरणस्वनिवर्त्यस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकम् अप्रका शितार्थप्रकाशकत्वात् अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीप प्रभावा- दिति ॥ १३ ॥ अथ अविद्यानुमान और उसका खण्डन- ( अस्तु तर्हि अनुमानमित्यादि ) विवा- दास्पदम् ( विवादाग्रस्त ) प्रमाण ज्ञान । यहाँतक पक्ष है (स्वप्रागभावेत्यादि ) साध्य है ( अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्व ) हेतु है ( अन्धकारेति ) दृष्टान्त है पक्षमें यदि प्रमाणपद न देते तो ब्रह्मस्वरूपभूतज्ञान भी पक्षकोटीमें आजायगा परन्तु उसमें वस्त्वन्तरपूर्व- क रूप साध्य नहीं रहेगा अतः स्वरूपज्ञानकी व्यावृत्तिके लिये प्रमाणपद है । घटोऽय पटोयम् इत्यादि धारावाहिक बुद्धिस्थलमें उत्तरोत्तरज्ञानमें अभिमत वस्त्व- न्तरपूर्वक न होनेसे उसकी व्यावृत्तिके लिये विवादाध्यासित पद है । साध्यस्वरूपमें केवल वस्त्वन्तरपूर्वकत्वमात्र कहते तो घटपटादिरूप स्वविषयपूर्वकत्व होनेसे सिद्ध- साधन होजायगा अतः उसकी व्यावृत्तिके लिये स्वदेशपद है स्वाश्रयगत ऐसे कहते तो दृष्टान्त ( प्रदीपप्रभा ) में साध्य शून्यता होगी क्योंकि अन्धकार प्रदीपप्रभामें नहीं रहता है धर्माधर्म अथवा सम्भाग्ब्यावृत्तिके लिये स्वनिवर्त्यपद है गदादि- व्यावृत्तिके लिये स्वविषयावरण पद है । प्रागभाव उक्तलक्षण विशिष्ट होनेसे उसमें अनिष्टापत्तिवारणके लिये स्वप्रागभावव्यतिरिक्त पद है । हेतुकृत्य कहते है, प्रकाशकमात्र कहते तो धारावाहिकबुद्धिमें व्यभिचार होगा अतः अप्रकाशितार्थ पद है । इन्द्रियमें अनिष्टापत्तिवारणके लिये मासमानत्व भी हेतुमें विशेषण देना