सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ९३ ) प्रागुक्तदूषणाभावादयमभावो भावरूपाज्ञानगोचर एवाभ्युप- गर्थ न्तव्य इति ॥ ११ ॥ • न ( यदि इति ) कोई अज्ञानको ज्ञानाभाव मानकर अभावको भी प्रत्यक्ष माने तो क्या अज्ञानके अनुभव समय आत्मामें ज्ञान रहता है या नहीं ? यदि रहता हो तो ज्ञान और अज्ञानके परस्पर विरोध होनेके कारण ग्राह्य ( अज्ञान ) के न होनेमे प्रत्यक्ष न होगा । यदि नही रहता हो तो अज्ञानका ग्राहक ( ज्ञान ) न होनेसे ही प्रत्यक्ष नहीं होगा इसी आशयसे कहते है-( तं प्रत्याचक्षीत इत्यादि ) मै अज्ञ हूँ इस अनुभवमें अह, ज्ञान और अभाव तीन पदार्थ हैं। अभावका प्रतियोगी ज्ञान है अहम्पदार्थ जो आत्मा वह अभावका धर्मी है मैं ज्ञानाभाववान् हू यह वाक्यार्थ होता है यही सिद्धान्तकी बात है । अब प्रश्न यह है कि, उक्त अनुभवमे धर्मीरूपसे आत्मा- का और प्रतियोगिरूपसे ज्ञानका अवगाहन है या नही ? यदि है तो पूर्वोक्त प्रका रसे अभावका प्रत्यक्ष नहीं होगा । यदि नहीं है तो धर्मी और प्रतियोगीके विना अभावका ग्रहण नही होगा इस प्रकार दोनों ओरसे फँस जाते हैं । ( अस्य चाज्ञान- स्येति ) भावरूप अज्ञानपक्षमें धर्मी प्रतियोगीसापेक्ष होनेपरभी विरोधन होनेसे प्रत्यक्ष होजाता है क्योंकि भाव और अभावका परस्पर विरोध है अत यह अज्ञान भाव- रूप है यह सिद्ध हुआ ॥ ११ ॥ तदेतत् गगनरोमन्थन्यायितं भावरूपस्याज्ञानस्य ज्ञानाभाव- समानयोगक्षेमत्वात् । तथाहि विषयत्वेनाश्रयत्वेन च ज्ञानस्य व्यावर्तकतया प्रत्यगर्थ प्रतिपन्नो न वा ? प्रतिपन्नश्चेत् स्वरूप- ज्ञानानिवर्त्य तदज्ञानमित तस्मिन् प्रतिपन्ने कथङ्कारमवतिष्ठेत। अप्रतिपन्नश्चेद्व्यावर्त्तकाश्रयविषय शून्यमज्ञानं कथमनुभूयेत । अथ विशद स्वरूपावभास एवाज्ञानविरोधिना ज्ञानेनाभा- सित इति आश्रयविषयज्ञाने सत्यपि नाज्ञानानुभवविरोध इति। हन्त तर्हिज्ञानाभावेऽपि समानमेतत् अन्यत्राभिनिवेशात्। तस्मादुभयाभ्युपगतज्ञानाभाव ' एवाहमज्ञो मामन्यं च न जानामीत्यनुभवगोचर इत्यभ्युपगन्तव्यम् ॥ १२ ॥ अविद्याप्रत्यक्षका खण्डन-( तदेतदिति ) चर्वित वस्तुका चर्वण रोमन्थ है वह चर्वण तृणादिका होसक्ता है आकाशका चर्वण नही होसकता । जिस प्रकार आका-