भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

( ९० ) सर्वदर्शनसंग्रहः। , [ रामानुज- मभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया । भावान्तरमभावोऽन्यो न कश्चिदनिरूपणात् ॥ ” इति वदता भावव्यतिरिक्तस्याभावस्या- नभ्युपगमात् । अभावस्य षष्ठप्रमाणगोचरत्वेन ज्ञानस्य नित्या- नुमेयत्वेन च तदभावस्य प्रत्यक्षविषयत्वानुपपत्ते ॥ १० ॥ एतादृश अविद्यारूपमें अभियुक्तोंकी सम्मति कहते हैं-( तदुक्तमिति ) जन्यो न्याश्रय जनवस्था आदि परिहारके लिये अनादिपद, प्रागभाव व्यावृत्तिके लिये भावरूप, ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारसे निवृत्तिबोधनकेलिये विज्ञानेनेत्यादि। तथाच अनादि और भावरूप हो ज्ञानसे जिसकी निवृत्ति हो उसको विद्वान् लोग अज्ञान कहते हैं यह अज्ञान ज्ञानका प्रागभावरूप नहीं होसकता क्योंकि प्रागभाव परोक्षज्ञानका विषय है और अज्ञान प्रत्यक्ष विषय है। इसी बातको विशदरूपसे कहते हैं ( कोहि कश्च्यादित्यादि) मीमांसकोंमें दो विभाग हैं, एक प्रभाकर मतावलम्बी और दूसरा कुमा- रिलभट्टमतावलम्बी प्रभाकरके मतमें अभाव अतिरिक्तपदार्थ नहीं है। तथाहि (स्वरूपेति) घटादिवस्तुके दो स्वरूप हैं एक स्वकीय ( घटादि ) दूसरा परकीय (पटादि ) स्वकीय रूपसे सत् और परकीय रूपसे असदात्मक है तथाच कदाचित् किसी एक रूपका ग्रहण होता है जिस प्रकार जाम्बादि फलमें रूप और रस दोनों होनेपरभी किसी समय केवल रूपका ग्रहण होता है और किसी समय केवल रसकाही ग्रहण होता है। तिसी प्रकार जिस समय स्वकीयरूपका ग्रहण हो तब सत् कहा जाता है और जिस समयपर रूपका ग्रहण हो तब असत् कहाता है (भावान्तरेति) भाव घटादिपदार्थ है उससे अन्यभाव भावान्तर है अर्थात् घटादिका अभाव पटभूतलादि है । इससे अन्य निरुपाय अभावपदार्थका निरूपण नहीं करसकते हैं अतः प्रभाकरके मतको ज्ञानका अभावरूप नहीं कहसकते हैं। कुमारिलभट्टके मतसे कहते हैं-( अभा वस्य षष्ठेति ) इस मतमें अभाव अतिरिक्त पदार्थ होनेपर भी अनुपलब्धिरूप षष्ठप्रमाण गम्य और ज्ञान अनुमेय है अतः ज्ञानाभाव प्रत्यक्षका विषय नहीं होसक्ता है ज्ञानका अग्रभावरूप अज्ञान किसी मतसे भी उत्पन्न नहीं होसक्ता है ॥ १० ॥ यदि पुन प्रत्यक्षाभाववादी कश्चिदेनमाचक्षीत तं प्रत्याचक्षीत अहमज्ञ -इत्यस्मिन्ननुभवे अहमित्यात्मनोऽभानधर्मितया ज्ञा- नस्य प्रतियोगितया चावगतिरस्ति न वा ? अस्ति चेद्विरोधा- देव न ज्ञानाभावानुभवसम्भव । नचेद्धर्मिप्रतियोगिज्ञानसापेक्षो ज्ञा- नाभावानुभवः सुतरां न सम्भवति । अस्य चाज्ञानस्य भा व,

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