सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत.। ( ८९ ) “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्”इत्यादिवचननिचयप्रा- माण्यादिति ब्रुवाणा 'तरति शोकमात्मवित्' इत्यादिश्रुतिशिर शत वशेन निर्विशेषब्रह्मात्मैकत्वविद्यया अनाद्यविद्यानिवृत्तिमङ्गी- कुर्वाणाः 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' इति भेद- निन्दाश्रवणेन पारमार्थिकं भेदं निराचक्षाणाः विचक्षणंमन्या- स्तमिमं विभागं न सहन्ते ॥ ८ ॥ ब्रह्मसे अतिरिक्त वस्तुका कल्पितत्वमें प्रमाण-( सदेवेति ) सदेव यहाँ एवशब्दसे विजातीय अचेतनकी सत्ताका निषेध होता है 'एकमेव' इस पदसे सजातीय चेतनका निषेध होता है। अद्वितीयपदसे स्वगत कर्तृत्वादिका निषेध होता हे इस प्रकार " एकमेवाद्वितीयम् ' " सर्वं खल्विदं ब्रह्म " इत्यादि अनेक श्रुतिबलसे परमार्थ भेदका निषेधकर निर्विशेष आत्मैकत्वविज्ञानसे अनादिकालकी अविद्याकी निवृत्ति मानते हुए " मृत्योस्स " इत्यादि भेदज्ञानसे घोरसंसारप्राप्ति प्रतिपादक श्रुतियों द्वारा पारमार्थिक भेदका तिरस्कार करनेवाले पण्डितमानी पूर्वोक्त चिदचित् ईश्वरादि विभागसे भयभीत होते हैं ॥ ८ ॥ तत्रायं समाधिरभिधीयते-भवेदेतदेवं यद्यविद्यायां प्रमाणं विद्येत न चैवमनादिभावरूपं ज्ञाननिवर्त्यमज्ञानमहमज्ञो मामन्यं च न जानामीति प्रत्यक्षप्रमाणसिद्धम् ॥ ९ ॥ अविद्यामें प्रमाणाभावकथन- यह अविद्यापरिकल्पितत्व कथन तब होसकता है जब अविद्यामें कोई प्रमाण हो, सो नहीं है। यदि कहो, वस्तु स्वरूपको तिरोधान करने- वाली यथार्थज्ञानसे नष्ट होनेवाली प्रागभावसे भिन्न अनादि भावरूप जो अविद्या है उसमें प्रत्यक्षही प्रमाण हे क्योकि मैं अज्ञ हूँ अपनेको और परको भी नहीं जानता हूँ ऐसी प्रतीति होती है अतः अज्ञानरूप अविद्याकाभी प्रत्यक्ष सार्वजनिक है। यहा अज्ञपदसे अज्ञान और न जानामिपदसे स्वरूपाच्छादन कार्य कहा है ॥९॥ तदुक्तम्-“अनादिभावरूपं यद्विज्ञानेन विलीयते। तदज्ञानमिति प्राज्ञालक्षणं संप्रचक्षते ॥" इति । न चैतत् ज्ञानाभावविषयमि- त्याशङ्कनीयम्, को हि कं ब्रूयात् प्रभाकरकरावलम्बी, भट्टदत्तह- स्तो वा ? नाद्यः-“स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके । सर्वं तुनि ज्ञायते किञ्चित् कैश्चिद्रूपं कदाचन ॥” इति । "भावान्तर-