भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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विरुद्ध होनेसे जैनमत अत्यन्त अग्राह्य है । इसमें सूत्रकारकी सम्मति भी कहते हैं ( तदुक्तमिति ) संक्षेपसे विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तमें चित्, अचित् और ईश्वर तीन तत्त्व हैं वह क्रमसे भोक्ता, भोग्य और नियामक हैं चित्पद चेतन अर्थात् जीवको कहते हैं जीवका लक्षण " अणुत्वे सति चेतनत्वम् " अत्यन्तसूक्ष्म हो और चेतन हो वही जीवका लक्षण है । परमाणुसे व्यावृत्तिके लिये चेतनपद है, ईश्वरव्यावृत्तिके लिये अणुपद है, कर्तृत्व भोक्तृत्व ज्ञातृत्वादि जीवका स्वाभाविक धर्म है, अचित्पदवाच्य प्रकृति है इसका लक्षण अवस्थाश्रयत्व है । ईश्वर सर्वनियन्ता श्रीमन्नारायण हैं ईश्वरका लक्षण 'महत्त्वे सति चेतनत्वम्' महान् होकर जो चेतन हो वही ईश्वर है जीवकी व्यावृत्तिके लिये महत्पद है आकाशादिकी व्यावृत्तिके लिये चेतनपद है ॥ ६ ॥ अपरे पुन.-अशेषाविशेषप्रत्यनीकं चिन्मात्रं ब्रह्मैव परमार्थं । तच्च नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावमपि तत्त्वमस्यादिसामानाधिकर- ण्याविगतजीवैक्यं बध्यते मुच्यते च । तदतिरिक्तनानाविध- भोक्तृभोक्तव्यादिभेदप्रपञ्चः सर्वोऽपि तस्मिन्नविद्यया परि- कल्पित ॥ ७ ॥ अद्वैतमताभिप्रायसे पूर्वपक्ष कहते हैं-(अपरे पुन इति)(निर्विशेषद्वैतवादी) अशेष ज्ञातृत्व कर्तृत्वादि सजातीय विजातीय स्वगत समस्त विशेष गुणसे रहित चिन्मात्र स्वयंप्रकाश ज्ञेयत्वादि रहित ब्रह्मैव (निर्गुणब्रह्मही) परमार्थ है अर्थात् तत्त्वनिर्णायक प्रमाणका विषय है सगुणवाक्य उपासनारूप फलविशेषके लिये उपयुक्त होनेसे तत्त्वावेदक प्रमाणका विषय नही है वह ब्रह्म नित्य कालत्रयार्थ भी अबाध्य शुद्ध "अपहतपात्माविजरोविमृत्यु' इत्यादि श्रुति प्रतिपादित्तापहतपाप्मत्वादि तथा "नि- ष्कल निष्क्रिय शान्त निरवद्यमित्यादि" वचन बोधित कर्मबन्धादिरहित बुद्ध ज्ञाना- नन्द स्वरूप है तथापि अनादिकालकी जो अनिर्वचनीय अविद्या है उससे तिरोहित स्वरूप होनेसे बन्धमोक्षको प्राप्त होते हैं । इसमे (तत्त्वमसि) हे श्वेतकेतु तुम वही ब्रह्म हो जो उपक्रममे (सदेवेत्यादि) वाक्योंसे सत्यज्ञानानन्दस्वरूप प्रतिपादित है इत्यादि वाक्यमें तत् पद और त्वंपदका जो सामानाधिकरण्य है वह जीव ब्रह्मके भेदपक्षमें नहीं होसकता अतः उक्त सामानाधिकरण्यबोधक वाक्य ही अविद्याक- ल्पित जीवभावमे प्रमाण है । अद्वैतमतमें सामानाधिकरण्य अखण्डार्थकरव अर्थात् स्वरूपका ऐक्य है। रज्जुज्ञानसे सर्पनिवृत्तिवत् ब्रह्मज्ञानसे प्रपञ्चनिवृत्तिके लिये कहते हैं (कल्पित इति) (नेहनानास्ति इत्यादि) वाक्यसे ब्रह्मव्यतिरिक्त अनेकविधि ज्ञातृज्ञेयादि सब भेद उस ब्रह्ममें अविद्यासे कल्पित हे ॥ ७ ॥