भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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ऽदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ८७ ) शरीरोंमें व्याप्त होजाती है ऐसी आशंकासे कहते हैं-( मनुजशरीरीते ) किसीको अपना कर्मवश मनुष्यशरीर छोड़ गजशरीरमें प्रवेश करनापड़े तो मनुष्यशरीर छोटा होनेके कारण उसमें रहनेवाला आत्मा गजशरीरमें सर्वत्र व्याप्त नहीं होसकेगा और भी हाथीका शरीर छोड़कर चेंटाके शरीरमें प्रवेश करते समय आत्मा छिन्नभिन्न होजायगा एव अवयव विनाश होनेसे आत्माकाभी नाश होजायगा परन्तु आत्माका अनित्यत्व जैनको अभिमत नहीं है ॥ ५ ॥ न च यथा प्रदीपप्रभाविक्षेपः प्रपाप्रासादाद्युदरवर्त्तिसङ्कोच विकासवान् तथा जीवोऽपि मनुजमतङ्गजादिशरीरेषु स्यादि- त्योपेतव्यम्, प्रदीपवदेव सविकारत्वेनानित्यत्वप्राप्तौ कृतप्रणा- शाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् ॥ एवं प्रधानमल्लगिबर्हणन्यायेन जीव- पदार्थदूषणाभिधानदिशाऽन्यत्रापि दूषणमुत्प्रेक्षणीयम् । तस्मान्नित्यनिर्दोषश्रुतिविरुद्धत्वादिनमुपादेयं न भवति । तदुक्तं भगवता व्यासेन-“ नैकस्मिन्नसम्भवात् ” इति । रामानुजेन च जैनमतनिराकरणपरत्वेन तदिदं सूत्रं व्याकारि । एष हि तस्य सिद्धान्तः-चिदचिदीश्वरभेदेन भोक्तृभोग्यनियामकभेदेन व्यवस्थितास्त्रयः पदार्था इति । तदुक्तम्-“ईश्वरश्चिदचिच्चेति पदार्थत्रितयं हरिः । ईश्वरश्चित इत्युक्तो जीवो दृश्यमचित् पुन ॥” इति ॥ ६ ॥ यदि कहो जिस प्रकार विशालस्थानमें रखेहुए दीपककी प्रभा उस स्थानभर व्याप्त रहती है उसी दीपको किसी संकुचितस्थानमे रखनेसे वही प्रभा उतने देशमें व्याप्त रहती है विसी प्रकार जीव भी संकोचविकासस्रूपसे गज मनुष्य पिपीलिकादि शरीरमें छिन्नभिन्न न होनेपर भी व्याप्त रहसकता है यह भी नहीं कहसकते क्योंकि जो संकोचविकासवान् होता है वह अनित्य होता हे दृष्टान्तके लिये दीपप्रभा ही लीजिये एवं संकोचविकासी होनेसे जीव अनित्य होजायगा तो कृतकर्मका नाश और अकृतकर्म फलकी प्राप्ति अर्थात् दूसरेके किये कर्मका फल दूसरेको प्राप्त होने लगेगा । अत जिस प्रकार प्रधान मल्लको जीतनेसे सभीको जीतना कहाजाता है उसी प्रकार प्रधान जीवके स्वरूपका निराकरण करनेसे अन्यका भी खण्डन होजाता है । उपसंहार करते हैं-( तस्मादिति ) अपोरुषेय एव वक्तृप्रमादादिदोषशून्य वेद-