सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ रामानुज-
द्वितीये विवक्षितार्थासिद्धिः । अनेकान्तत्वेनासाधकत्वात् । तथा चेयमुभयतः पाशारज्जु स्याद्वादिन् स्यात् ॥ अपि च नवत्वसप्तत्वादिनिर्द्धारणस्य फलस्य तन्निर्द्धारयितुः प्रमातुश्च तत्करणस्य प्रमाणस्य प्रमेयस्य नवत्वादेरनियमे साधु सम- र्थितमात्मनस्तीर्थंकरत्वं देवानां प्रियेणार्हतमतप्रवर्त्तकेन ॥ ४ ॥ दूषणान्तर कहते हैं-(किञ्चेति) सत्त्वासत्त्वादि विरुद्धधर्माध्यासरूप अनेकान्तका मूल भूत सप्तभङ्गीन्याय क्या एकान्त है या अनेकान्त ? यदि एकान्त मानो तो समस्त वस्तुएं अनेकान्त हैं यह तुम्हारी प्रतिज्ञा भंग होगी । अनेकान्त मानो तो मूलमें कुठाराघात होगा अर्थात् जिस सप्तभङ्गी नयके बलसे अनेकान्तत्व साधना था वह स्वयं अने कान्त होनेसे उसकी सत्ताभी अनिश्चित हुई अतः साधन असिद्ध होनेसे साध्यभी असिद्ध होगा। ओरभी दोष देते हैं-(अपिचेत्यादि) जीवाजीवरूप दो पदार्थ आस्र वादि सात अथवा पुण्यपापादि सहित नौ पदार्थ वादियोंके मतमें न्यूनाधिक पदार्थका निषेधरूप सप्तत्व नवत्वादिका निर्णय और उससे होनेवाला 'सम्यग्ज्ञान मोक्षादि तथा निर्णय करनेवाला पुरुष आलोकाकाशादि और मुक्तात्मसञ्चरण स्थान प्रमाण प्रमेयादि सबको अनिश्चित माने तो जैनमतप्रवर्त्तक तीर्थंकरकी बुद्धिमत्ता भी प्रशंसनीय है ॥ ४ ॥ तथा जीवस्य देहानुरूपपरिमाणत्वाङ्गीकारे योगबलादनेक- शरीरपरिग्राहकयोगिजीवेषु प्रतिशरीरं जीवविच्छेदः प्रसज्येत, मनुजशरीरपरिमाणो जीवो मातङ्गजदेहं कृत्स्नं प्रवेष्टुं न प्रभवेत् ॥ किञ्च गजादिशरीरं परित्यज्य पिपीलिकाशरीरं विशतः प्राचीनशरीरसन्निवेशविनाशोऽपि प्राप्नुयात् ॥ ५ ॥ जीवको देह परिमाणत्वका खंडन-(तथा जीवस्येति ) सौभरिनामकर्षि ने एक समय १०० राजकन्याओको परिणय करके प्रत्येकके साथ विहार करनेके लिये १०० शरीर धारण किये, ऐसी कथा इतिहासमें प्रसिद्ध है इस प्रकार योगबलसे युगपत् अनेकशरीर धारण करनेवाले योगियोंका जीव टुकडे टुकडे होजायगा एवं टुकडे होनेपर भी तत्तत् शरीर परिमित नहीं हो सकेगा जैसे एक पात्रमें भरे हुए जलको उतनेही बडे सौ पात्रोंमें थोडा थोडा छोडनेसे सब पात्र नहीं भर सकते । योगियोंने पूर्व देहकी अपेक्षा छोटे २ शरीर धारण किये हों जिससे आत्मा समस्त