सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ८९ ) प्रमाणसिद्धका अपलाप नहीं होता इस न्यायसे यथा मनुष्यत्व गजत्व परस्पर विरुद्ध होनेपर भी गजाननमें दोनों रहते हैं । यथावा सिंहत्व मनुष्यत्व परस्पर विरुद्ध होनेपरभी नरसिंहशरीरमें दोनों रहते हैं तिसी प्रकार संसारका सद् और सदात्मक अनेकान्त होनेमें क्या बाधक है ? यह भी नहीं कहसकते क्योंकि दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक समान नहीं है दृष्टान्तमें सिंहत्व या गजत्व और मनुष्यत्व दोनों एकही स्थानपर होते तो विरोध कहते सो नहीं है सिंहत्व या गजत्व कण्ठके उपरी भागमें है मनुष्यत्व उससे अधोभागमें है अत विरोध नहीं दार्ष्टान्तिकमें एकहीमें सत्त्व और असत्त्व होनेसे विरोध स्पष्ट है ( ननु इति) जिस प्रकार मृत्पिण्डमें द्रव्यत्वरूपसे सत्त्व और घटत्वादिरूपसे असत्त्व दोनों रहते हैं तिसी प्रकार प्रत्येकमें द्रव्यत्वरूपसे सत्त्व और कार्यत्वादिरूपमे असत्त्व दोनों रहसकते हैं सो भी नहीं एकही कालमें एकत्र सत्त्वासत्त्वमें ही विरोध है कालभेद और आकारभेदसे सत्त्वासत्त्व स्वभाव होसकता है इसमें कोई विरोध नहीं परन्तु आपके मतमें एकत्र एकही वस्तुको एक कालमें सत्त्व और असत्त्व दोनों है यह अत्यन्त विरुद्ध होनेसे सर्वथा असम्भव है ॥ २ ॥ न चैकस्य ह्रस्वत्वदीर्घत्ववदनेकान्तत्वं जगत स्यादिति वाच्यम्, प्रतियोगिभेदेन विरोधाभावात् । तस्मात् प्रमाणाभा- वात् युगपत् सत्त्वासत्त्वे परस्पराविरुद्धे नैकस्मिन् वस्तुनि वस्तुयुक्ते । एवमन्यासामपि भङ्गीनां भङ्गोऽवगन्तव्य ॥ ३ ॥ यदि कहो एकही यष्टिकामें ह्रस्वत्व दीर्घत्व जिस प्रकार होते हैं तिसी प्रकार जगत्का अनेकान्त्य होसकता है यह भी ठीक नहीं ह्रस्वत्व दीर्घत्वादिक प्रतियोगि सापेक्ष होता है यथा चार हाथ लम्बी एक यष्टिका हो वह पाँच हाथ लम्बी यष्टिकाकी अपेक्षा ह्रस्व और तीन हाथवालेकी अपेक्षा दीर्घ कहा सकती है एकहीकी अपेक्षा उसको ह्रस्व दीर्घ नहीं कहसकते हैं । अत प्रतियोगिभेदमें उनमें विरोध नहीं । जगत्में ऐसा कोई प्रतियोगिभेद न होनेसे विरोध दुष्परिहरणीय है । अत' एकत्रस्तुमें एककालमें परस्पर विरुद्ध सत्त्वासत्त्व मानना सर्वथा प्रमाण और युक्तिसे विरुद्ध है इसी प्रकार एकत्व, अनेकत्व, नित्यत्व, अनित्यत्वादिकाभी असम्भव जानना ॥ ३ ॥ किञ्च सर्वस्यास्य मूलभूत सप्तभङ्गिनय स्वयमेकान्त अने- कान्तो वा । आद्ये सर्वमनेकान्तमिति प्रतिज्ञाव्याघातः ।