भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 316 में से

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ९५ ) ननु ज्ञानरूपस्यात्मनः कथं ज्ञानगुणकत्वमिति चेत् तदसत् यथाहि मणिद्युमणिप्रभृति तेजोद्रव्यं प्रभावद्रूपेणावतिष्ठमानं प्रभारूपगुणाश्रयः । स्वाश्रयादन्यत्रापि वर्त्तमानत्वेन रूपत्वेन च प्रभाद्रव्यरूपापि तच्छेषत्वनिबन्धनगुणव्यवहारा एवमयमात्मा स्वप्रकाशचिद्रूप एव चैतन्यगुणः ॥ तथा च श्रुतिः 'सदा सैन्ध- वघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नरसघन एव एवं वा अरे अयमात्मा- ऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्यो- तिर्भवति न विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते । अथ यो वेदेदं जिघ्राणेति स आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुष एष हि द्रष्टा श्रोता रसयिता घ्राता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः” इत्यादिका श्रुतिरपि ॥ १६ ॥ ( ननु इति ) “ सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म ” इत्यादि श्रुतियोंसे आत्माको ज्ञानस्व- रूपत्व प्रतिपादन होता है । उसको ज्ञानाश्रयत्व कैसे कहते हो ? यहभी अयुक्त है क्योंकि जिस प्रकार मणि, सूर्य्य, दीपादि तेजोद्रव्य प्रभा और प्रभावद् रूपसे वर्तमान होते हुएभी प्रभारूप गुणका आश्रय रहता है । यद्यपि प्रभाप्रभावद्रव्यका गुणभूत है तथापि प्रभातेजोद्रव्यही है शौक्ल्यादिके समान गुण नहीं क्योंकि शौक्ल्यादि गुण द्रव्य देशहीमें रहता है प्रभा उसके आश्रय मण्यादि द्रव्यसे अन्यत्र भी रहती है अर्थात् दीपक एक छोटीसी जगहपर रहता है परन्तु उसकी प्रभा बहुत दूरतक व्याप्त रहती है शुक्लादिगुणमें रूप नहीं रहता है परन्तु प्रभामें रूप रहता है अतः प्रभा द्रव्य है तथापि सदा दीपादि द्रव्याश्रित एव तादृश द्रव्यका शेषभूत होनेसे प्रभामें गुणत्व व्यवहार होता है । उसी प्रकार आत्माभी स्वयंप्रकाशरूप ज्ञानस्वरूप और ज्ञानगुणवान् भी है । श्रुतिभी कहती है ( स यथेत्यादि ) जैसे अनन्तर-अन्तरङ्ग और बहिरंग भावशून्य होकर समस्त प्रदेशमें सैन्धवखण्ड ( लवण ) एक रस रहता है वैसेही यह आत्माभी अनन्तर अबाह्य अर्थात् धर्म धर्मी रूप समस्त अंशोंमें ज्ञान- स्वरूप है । शरीरीत्वावस्थामेंभी ज्ञानात्मकत्वप्रतिपादक वाक्य कहते हैं ( विज्ञानघन एव इति ) ज्ञानत्वको स्वयं प्रकाशकत्व ज्ञापनके लिये कहते हैं-( अत्राय पुरुष इति ) पुरुषः आत्मा स्वयं ज्योति स्वयंप्रकाश है आत्माके स्वरूपभूत ज्ञान और धर्मभूत ज्ञानका परस्पर भेद प्रतिपादक श्रुति कहते हैं ( न विज्ञातुरिति ) ज्ञानाश्रय आत्माके

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