सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- विज्ञानका विनाश नही होता हे । ज्ञातृसम्बन्धि ज्ञानके नित्यत्व कहनेसे ज्ञानमात्र सत्य अन्य मिथ्या हे ऐसी शंका होगी उसके वारण करनेके लिये ज्ञाता (ज्ञानाश्रय) ही आत्मा हे उसकी प्रतिपादक श्रुति कहते हैं ( अथ यो वेदेति ) मैं सूंघताहूं ऐसा जो जानता हो वह आत्मा है । एकही वाक्यसे ज्ञानाश्रयत्व और स्वयंप्रकाशत्वके साथही प्रतिपादिका श्रुति कहते हैं ( कतमआत्मेति ) आत्मा कौन है यह प्रश्न है उसका उत्तर यह हे कि हृदयपुण्डरीकम प्रचुर ज्ञानवान् स्वयंप्रकाश पुरुष आत्मा है । ज्ञानगुणक्त्व ज्ञानाश्रयत्व प्रतिपादक वाक्य कहते हैं ( एष हि द्रष्टेति ) यह आत्मा दर्शन करनेवाला सुननेवाला आस्वादन करनेवाला सूंघनेवाला मनन तथा जाननेवाला कर्ता और ज्ञानस्वरूप है । निष्कृष्ट आत्मस्वरूप बोधक वाक्य यह हे कि “विज्ञाता- रमरेकेनविजानीयात् ” इत्यादि सहस्रों श्रुति आत्माके ज्ञानाश्रय और ज्ञानस्वरूपप्रति पादक हैं ॥ १६ ॥ न च 'अनृतेन हि प्रत्यूढा ”इति श्रुतिरपि विद्यापूर्वप्रमाणमित्याश्र- यितुं शक्यम् । ऋतेतरावषयो ह्यनृतशब्दः ऋतशब्दश्च कर्मवचन “ऋतं पिबन्तौ ”इति वचनात् । ऋतं कर्मफलाभिसन्धिरहितं परम- पुरुषाराधनयैव तत्प्राप्तिफलम् । अत्र तद्व्यतिरिक्तसांसारिका- ल्पफलं कर्मानृतं ब्रह्मप्राप्तिविरोधि । “ य एतं ब्रह्मलोकं न विदन्ति अनृतेन हि प्रत्यूढा ” इति वचनात् ॥ १७ ॥ आत्माका ज्ञातृत्वादिकभी अनृत सदसदानिर्वचनीय मायासे प्रत्यूढ ( तिरोहित ) स्वरूपसे प्रतीत होता हे ऐसा नहीं कहसक्ते क्योकि ( अनृतेनेति ) श्रुतिमें अनृत ऋतसे भिन्न विषयक है ऋत शब्दका अर्थ फलेच्छारहित भगवदाराधनारूप कर्म हे इससे विपरीत सांसारिकफल प्राप्तिरूपकर्म अनृत हे “ऋत पिवन्तौ” इत्यादिश्रुतिमें ऐसाही कहाहै । यद्यपि सुकृत दुष्कृत दोनों मोक्ष विरोधी होनेसे पापरूप हैं अत एव “ तदाविद्वान् पुण्यपापे विधूय ' कहाहै । तथापि भगवदाराध नाव्यतिरिक्त कर्म फलाभिसन्धिसहित कर्म मोक्ष विरोधी हे इसी अभिप्रायको प्रकट करनेके लिये पूर्व वाक्य कहते हैं ( एतामिति ) जिनका ज्ञान काम्यकर्मसे आच्छादित हे वे अज्ञानी ब्रह्मलोकको नही प्राप्त होते ॥ १७ ॥ 'माया तु प्रकृतिं विद्यात्'इत्यादौ मायाशब्दो विचित्रार्थसर्गकरित्रि- गुणात्मकप्रकृत्यभिधायको नानिर्वचनीयाज्ञानवचन । “तेन माया-