भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( १०२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ गमानुज- शरीरपर्य्यन्तत्वं प्रतिपाद्य संस्थानेकसाध्यभाव इत्यादिना- शरीरलक्षणं दर्शयित्वा शब्दैस्तन्वंशरूपप्रभृतिभिरित्या- दिना विश्वेश्वरादपृथक्सिद्धत्वमुपपाद्य निष्कर्षोक्तेत्यादिना पद्येन सर्वेषां शब्दानां परमात्मपर्य्यन्तत्वं प्रतिपादितं । तत् सर्वं तत एवावधार्य्यम् । अयमेवार्थः समर्थितो वेदार्थसंग्रहे नामरू- पश्रुतिव्याकरणसमये रामानुजेन ॥ २४ ॥ देवादि शब्द जीवका वाचक है । और निष्कर्ष अभिप्राययुक्त सब लौकिक और वैदिक प्रयोग, जीवसे अभिन्न सिद्ध मागाभिधान अर्थात् परमात्माका वाचक होता है ॥ आत्मसम्बन्ध कालमे देव और मनुष्यादि मूर्तिविशिष्ट होकर जो अवस्थिति करता है, सो नहीं जानाजाता । वही जीवात्माही ससार्ग अनुप्रवेशकर, नाम और रूपव्यक्त करता है । यहां देवादि शब्दोंका शरीर पर्य्यन्तत्व प्रतिपादन कर, 'संस्थानैकसाध्यभाव' इत्यादिसे शरीरलक्षणकहकर " शब्दैस्तन्वंशरूपप्रभृतिभिरखिलं स्थाप्यते विश्वमूर्तेस्त्वन्मात्र प्रपञ्चस्तदनवगमतस्तत्प्रयुक्तसिद्धिमोहः । श्रोत्राद्यैराश्रयेभ्यः स्फुरति खलु पृथक्शब्द- गंधादिधर्मो जीवात्मन्यप्यदृश्ये वपुषि हि दृशा गृह्यतेऽनन्यदृष्टिम् ॥ " शब्दैस्तन्व शैरिति । " यस्यात्मा शरीरम् " " तत्सर्वं वै हरेस्तनु " " ममैवांशो जीवलोके ' इत्यादि तनु अंश और क्षेत्रादिशब्दोंद्वारा चेतनाचेतनात्मक समस्त प्रपञ्चको परमात्माका प्रकार अर्थात् अपृथक्सिद्ध विशेषणख्यापित किया है परन्तु तादृश ईश्वरापृथक्सि द्धत्वको जाननेसे देवादिंशब्दको लोकप्रसिद्ध केवल तत्तत्पिण्डविशेष अर्थोंमें पृथक्सिद्धिरूप मोह होता है यथा आकाशका प्रत्यक्ष न होने पर भी श्रोत्रादि इन्द्रियों द्वारा आश्रय आकाशसे पृथक् होकर शब्द, रस और गन्धादि प्रतीत होते हैं तथा जीवात्मा अदृश्य होनेपरभी ज्ञानद्वारा शरीरका ग्रहण होसकता है इस श्लोकसे परमात्मासे अपृथक्सिद्धत्व प्रतिपादन करके-"निष्कर्षोक्तेर्हानौ निमतपदपदान्य न्तरात्मानमेकं तन्मूर्तेर्वाचकत्वादभिदधति यया रामकृष्ण दिशब्दा । सर्वेषामात्म- मुख्यैरगणि च वचसा शाश्वतेऽस्मिन् प्रतिष्ठा पाकेस्तस्याप्रतीतेर्जगति तदितरे स्याच्च भक्त्या प्रयोग ॥ " निष्कर्षोक्तेरिति । पृथक्बोधतात्पर्य्यसे उच्चरित शब्द निष्कर्षोक्तशब्द है यथा देवदत्तके शरीर यहापर शरीरशब्दचेतनविशिष्टका बोधक नही किन्तु केवल शरीरका बोधक है यथावा गोशब्द गोत्वविशिष्टका बोधकहै परन्तु गोत्वानिष्कर्परूपसे गोत्वजातिमात्रका बोधक है तथा निष्कर्ष बोधनतात्पर्यके जहाँ हानि हो तहाँ शरीरवाचक शब्द शरीरीपर्यन्तका बोधक है