भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १०१) ( यःपृथिवीमन्वेदेत्यादि ) जिस प्रकार उस आत्माको अचेतनपृथिवी नहीं जानती है उसी प्रकार जीवात्मा भी अन्तर्यामी रूपसे अवस्थित परमात्माको नहीं जानता है इस प्रकार “ यस्यापःशरीरम् ’ यस्यमृत्युःशरीरम् ’ यस्यविज्ञान शरीरमित्यादि ” अनेक श्रुति प्रत्यक्ष शरीर शरीरी भावको कहती है यही घटकश्रुति भेद और अभेद दोनोंको अविरोधसे अर्थका वर्णन करती है ॥ २२ ॥ न च पर्यायत्वं द्वारभेदसम्भवात् । तथाहि जीवस्य शरीरत- या प्रकारभूतानि देवमनुष्यादिसंस्थानानीव सर्वाणि वस्तूनीति ब्रह्मात्मकानि तानि सर्वाणि ॥ अत –“देवो मनुष्यो यक्षो वा पिशाचोरगराक्षसा । पक्षी वृक्षो लता काष्ठं शिला तृण घट पटः॥” इत्यादयः सर्वे शब्दा प्रकृतिप्रत्यययोगेनाभिधायकतया प्रसिद्धा लोके तद्वाच्यतया प्रतीयमानतत्तत्संस्थानवद्वस्तुमुखेन तद- भिमानिजीवतदन्तर्यामिपरमात्मपर्य्यन्तसंस्थानस्य वाचकाः । देवादिश्ब्दानां परमात्मपर्य्यन्तत्वमुक्तं तत्त्वमुक्तावल्यां च- तुरन्तरे च ॥ २३ ॥ यदि समस्त शब्द शरीरशरीरी भावसे परमात्माके वाचक हो तो घट कलशके समान पर्यायता होगी ऐसी आशंका भी नहीं करसकते क्योंकि मनुष्यत्व, देवत्व, घटत्वादि द्वार ( प्रवृत्तिनिमित्त ) भेद होनेसे नीलघटके समान विशेष्य विशेषण भाव होनेसे पर्यायता नही होगी जीवके शरीरत्वरूपमे प्रसिद्ध देवमनुष्यादि अवयव- की नाई सब ही वस्तु ब्रह्मात्मक है इसी कारण, देव, मनुष्य, यक्ष, पिशाच, उरग, राक्षस, पक्षी, वृक्ष, काष्ठ, शिला, तृण, घट और पट इत्यादि जो सब शब्द प्रकृति प्रत्ययके योगमें अभिधायक कहकर लोकमें प्रसिद्ध है, सो सब ही उसकी वाच्यतामें प्रतीयमान तत्तत्संस्थान विशिष्ट वस्तु सहायसे तदभिमानी जीव और उसका अन्त- र्यामी परमात्मा पर्य्यन्त संस्थानका वाचक होता है । तत्त्वमुक्तावली और चतुरन्तर नामक ग्रन्थमे देवादि शब्दोंका परमात्मा पर्य्यन्तत्व कहा है ॥ २३ ॥ “जीव देवादिश्ब्दो वदति तदपृथक् सिद्धभावाभिधानं निष्कर्षाभावयुक्तो बहुरिह च दृढो लोकवेदप्रयोग ॥ आत्मा सवन्धकाले स्थितिरनवगता देवमर्त्यादिमूर्त्तेर्जीवात्मानुप्रवे- शाज्जगति विभुरपि व्याकरोन्नामरूपे ॥” इत्यनेन देवादिश्ब्दानां