भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

( १०० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज-

नकालमें एतद्देह सम्बन्ध हे । एकही कालम भिन्न भिन्न देशद्वय सम्बन्ध होता तो विरोध अवश्य होता सो नहीं हे अत देश भेदरूप विरोध कालभेदसे हटजाता हे यदि लक्षणा मान भी लियाजाय तो भी “ गगायागोप ” इत्यादिवत् एकही पदमें लक्षणा माननेसे काम चलजायगा दोनों पदोंमें लक्षणा मानना व्यर्थ हे । 'सोयन् वदत्तः' इत्यादि प्रत्यभिज्ञास्थलमें यदि तत्व जोर इद तत्वादि धर्मरहित केवल चैतन्याशमान मानोगे तो वोद्धमतम प्रवेश होगा क्योंकि चैतन्य स्वरूप बौद्धोंने भी माना हे । धर्मविशेषादिक न तुमने माना न वोद्धोंने माना जगन्मिथ्यात्व आपके मतमें और वोद्धोंके मतमें समान होनेसे बौद्धही विजयी होंगे । कहा भी है “वेदोऽनृतो बुद्धकृतागमोऽनृतः प्रामाण्यमेतस्य च तस्यचानृतम् । बौद्धावृता बुद्धिफले तयानृते यूयञ्च बोद्धाश्च समानसंसदः ॥” इत्यादि । इसी प्रकार यहापर भी शरीर शरीरी भावसे जीव ओर ईश्वरका तादात्म्य ( अभेद ) उपपन्न होता है ॥ २१ ॥

जीवात्मा हि ब्रह्मण शरीरतया प्रकारत्वात् ब्रह्मात्मकः ' य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तर यं आत्मा न वेद यस्यात्मा शरी- रम्' इति श्रुत्यन्तरादत्यल्पमिदमुच्यते सर्वे शब्दाः परमात्मन एव वाचकाः ॥ २२ ॥

उसीको उपपादन करते हे-( जीवात्मा हीत्यादि ) जीवात्मा ब्रह्मका शरीर और ब्रह्म शरीरी अर्थात् आत्मा है शरीर शरीरीका प्रकार ( विशेषण ) है शरीरवाचक- शब्द शरीरीपर्यन्त प्रतिपादक लोकमे प्रसिद्ध है । यथा देवदत्त, यज्ञदत्त, देव, मनुष्यादिशब्द देवदत्तादिशरीरखति आत्मापर्यन्तका बोध करता है देवशब्द देवशरीरखति आत्माका बोधक है शरीर शरीरी भाव द्वारा अभेद होनेसे ही एक मनुष्य इत्यादि एकत्वव्यवहार लोकमें होता है शरीरका लक्षण शास्त्रमें इस प्रकार कहा है “यस्य चेतनस्य यद्द्रव्य सर्वात्मना स्वार्थे नियन्तु धारयितु शक्य तच्छेषतैक- स्वरूप तत्तस्य शरीरम् ' इति । अर्थ-जो वस्तु जिस चेतनके स्वार्थके लिये नियमन करने योग्य हो और धारणकरने योग्य हो उस चेतनका सर्वदा शेषतन ( पारतन्त्र्य ) स्वरूप हो वह उस चेतनका शरीर है । तथाच चेतनाचेतनात्मकवस्तु ईश्वरका नियाम्य, ईश्वरका धार्य ओर ईश्वरका परतन्त्र होनेसे ईश्वरका शरीर है उक्त शरीर शरीरी भावमें अन्तर्यामीब्राह्मणश्रुति प्रमाण देते हैं ( यआत्मनि इत्यादि ) जो परमात्मा आत्मामें रहते हुए भी अन्तर्यामीरूपसे नियमन करते हैं जिसको आत्मा नहीं जानता है आत्मा जिसका शरीर है वही आत्मा है । इसमें दृष्टान्त देते हैं