सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ९९ ) म्बन्धी तयोः सामानाधिकरण्ये नैक्यमवगम्यते । तत्रैकस्य युगपद्विरुद्धदेशकालप्रतीतिर्न सम्भवतीति द्वयोरपि पदयोः स्व- रूपपरत्वे स्वरूपस्य चैक्यं प्रतिपत्तुं शक्यम् एवमत्रापि किञ्चि- ज्ञत्वसर्वज्ञत्वाादिविरुद्धांशप्रहाणेनाखण्डस्वरूपं लक्ष्यते ॥२०॥ ( ननुइति ) जिस प्रकार सोय देवदत्त. ( वह देवदत्त यह है ) जिसको मैंने मथुरामे देखाथा यहा स इति तच्छब्दसे देशान्तर और कालान्तर सम्बन्धी पुरुष प्रतीत होता है इद ( यह ) शब्दसे समीपवर्ती वर्तमानकालसम्बन्धी पुरुष प्रतीत होता है दोनोंका ऐक्य सामानाधिकरण्यसे प्रतीत होता है । एक ही वस्तुको एक कालमे देशद्वयसम्बन्ध बाधित होनेसे दोनों पदोंके अर्थमे देशकालको छोडकर चैतन्यस्वरूप ( देवदत्तांश ) मात्र लेकर अभेद होता है तिस प्रकार तत् त्वम् यहापर भी किञ्चित्ज्ञत्व सर्वज्ञत्वादि विरुद्ध धर्मको त्यागकर केवल चैतन्यांश लेकर अखण्डार्थरूप अभेद लक्षित होगा (इसीको अद्वैतवादी भागत्यागलक्षणा कहते है ) ॥ २० ॥ इति चेत् विषमोऽयमुपन्यासः॥ दृष्टान्तेऽपि विरोधवैधुर्य्येण लक्षणा- गन्धासम्भवादेकस्य तावद्भूतवर्त्तमानकालद्वयसम्बन्धो न विरुद्धः । देशान्तरस्थितिर्भूतासन्निहितदेशास्थितिर्वर्त्तत इति देशभेदसम्बन्धविरोधश्च कालभेदेन परिहरणीयः । लक्षणा- पक्षेऽप्येकस्यैव पदस्य लक्षकत्वाश्रयणेन विरोधपरिहारे पदद्वयस्य लाक्षणिकत्वस्वीकारो न सङ्गच्छते । इतरथा एकस्य वस्तुनस्तत्तन्ताविशिष्ट्यावगाहनेन प्रत्यभिज्ञायाः प्रामा- ण्यानङ्गीकारे स्थायित्वासिद्धौ क्षणभङ्गवादी बौद्धो विजयेत ॥ एवमत्रापि जीवपरमात्मनोः शरीरात्मभावेन तादात्म्य न विरु- द्धमिति प्रतिपादितम् ॥ २१ ॥ उक्त आशङ्काका समाधान-( इति चेत् विषमोऽयमुपन्यासइति ) दृष्टान्त और दार्ष्टा- न्तिक समान होने चाहिये दृष्टान्तभूत "सोयदेवदत्त " यहापर कोई विरोध न होनेसे लक्षणाका नाम भी नहीं क्योंकि एकही वस्तुको भूत ओर वर्तमान काल भेदसे देशद्वयका सम्बन्ध विरुद्ध नहीं है भूतकालमें मथुरादि देशान्तर सम्बन्ध है वर्तमा-