सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ९९ ) म्बन्धी तयोः सामानाधिकरण्ये नैक्यमवगम्यते । तत्रैकस्य युगपद्विरुद्धदेशकालप्रतीतिर्न सम्भवतीति द्वयोरपि पदयोः स्व- रूपपरत्वे स्वरूपस्य चैक्यं प्रतिपत्तुं शक्यम् एवमत्रापि किञ्चि- ज्ञत्वसर्वज्ञत्वाादिविरुद्धांशप्रहाणेनाखण्डस्वरूपं लक्ष्यते ॥२०॥ ( ननुइति ) जिस प्रकार सोय देवदत्त. ( वह देवदत्त यह है ) जिसको मैंने मथुरामे देखाथा यहा स इति तच्छब्दसे देशान्तर और कालान्तर सम्बन्धी पुरुष प्रतीत होता है इद ( यह ) शब्दसे समीपवर्ती वर्तमानकालसम्बन्धी पुरुष प्रतीत होता है दोनोंका ऐक्य सामानाधिकरण्यसे प्रतीत होता है । एक ही वस्तुको एक कालमे देशद्वयसम्बन्ध बाधित होनेसे दोनों पदोंके अर्थमे देशकालको छोडकर चैतन्यस्वरूप ( देवदत्तांश ) मात्र लेकर अभेद होता है तिस प्रकार तत् त्वम् यहापर भी किञ्चित्ज्ञत्व सर्वज्ञत्वादि विरुद्ध धर्मको त्यागकर केवल चैतन्यांश लेकर अखण्डार्थरूप अभेद लक्षित होगा (इसीको अद्वैतवादी भागत्यागलक्षणा कहते है ) ॥ २० ॥ इति चेत् विषमोऽयमुपन्यासः॥ दृष्टान्तेऽपि विरोधवैधुर्य्येण लक्षणा- गन्धासम्भवादेकस्य तावद्भूतवर्त्तमानकालद्वयसम्बन्धो न विरुद्धः । देशान्तरस्थितिर्भूतासन्निहितदेशास्थितिर्वर्त्तत इति देशभेदसम्बन्धविरोधश्च कालभेदेन परिहरणीयः । लक्षणा- पक्षेऽप्येकस्यैव पदस्य लक्षकत्वाश्रयणेन विरोधपरिहारे पदद्वयस्य लाक्षणिकत्वस्वीकारो न सङ्गच्छते । इतरथा एकस्य वस्तुनस्तत्तन्ताविशिष्ट्यावगाहनेन प्रत्यभिज्ञायाः प्रामा- ण्यानङ्गीकारे स्थायित्वासिद्धौ क्षणभङ्गवादी बौद्धो विजयेत ॥ एवमत्रापि जीवपरमात्मनोः शरीरात्मभावेन तादात्म्य न विरु- द्धमिति प्रतिपादितम् ॥ २१ ॥ उक्त आशङ्काका समाधान-( इति चेत् विषमोऽयमुपन्यासइति ) दृष्टान्त और दार्ष्टा- न्तिक समान होने चाहिये दृष्टान्तभूत "सोयदेवदत्त " यहापर कोई विरोध न होनेसे लक्षणाका नाम भी नहीं क्योंकि एकही वस्तुको भूत ओर वर्तमान काल भेदसे देशद्वयका सम्बन्ध विरुद्ध नहीं है भूतकालमें मथुरादि देशान्तर सम्बन्ध है वर्तमा-
( १०० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज-
नकालमें एतद्देह सम्बन्ध हे । एकही कालम भिन्न भिन्न देशद्वय सम्बन्ध होता तो विरोध अवश्य होता सो नहीं हे अत देश भेदरूप विरोध कालभेदसे हटजाता हे यदि लक्षणा मान भी लियाजाय तो भी “ गगायागोप ” इत्यादिवत् एकही पदमें लक्षणा माननेसे काम चलजायगा दोनों पदोंमें लक्षणा मानना व्यर्थ हे । 'सोयन् वदत्तः' इत्यादि प्रत्यभिज्ञास्थलमें यदि तत्व जोर इद तत्वादि धर्मरहित केवल चैतन्याशमान मानोगे तो वोद्धमतम प्रवेश होगा क्योंकि चैतन्य स्वरूप बौद्धोंने भी माना हे । धर्मविशेषादिक न तुमने माना न वोद्धोंने माना जगन्मिथ्यात्व आपके मतमें और वोद्धोंके मतमें समान होनेसे बौद्धही विजयी होंगे । कहा भी है “वेदोऽनृतो बुद्धकृतागमोऽनृतः प्रामाण्यमेतस्य च तस्यचानृतम् । बौद्धावृता बुद्धिफले तयानृते यूयञ्च बोद्धाश्च समानसंसदः ॥” इत्यादि । इसी प्रकार यहापर भी शरीर शरीरी भावसे जीव ओर ईश्वरका तादात्म्य ( अभेद ) उपपन्न होता है ॥ २१ ॥
जीवात्मा हि ब्रह्मण शरीरतया प्रकारत्वात् ब्रह्मात्मकः ' य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तर यं आत्मा न वेद यस्यात्मा शरी- रम्' इति श्रुत्यन्तरादत्यल्पमिदमुच्यते सर्वे शब्दाः परमात्मन एव वाचकाः ॥ २२ ॥
उसीको उपपादन करते हे-( जीवात्मा हीत्यादि ) जीवात्मा ब्रह्मका शरीर और ब्रह्म शरीरी अर्थात् आत्मा है शरीर शरीरीका प्रकार ( विशेषण ) है शरीरवाचक- शब्द शरीरीपर्यन्त प्रतिपादक लोकमे प्रसिद्ध है । यथा देवदत्त, यज्ञदत्त, देव, मनुष्यादिशब्द देवदत्तादिशरीरखति आत्मापर्यन्तका बोध करता है देवशब्द देवशरीरखति आत्माका बोधक है शरीर शरीरी भाव द्वारा अभेद होनेसे ही एक मनुष्य इत्यादि एकत्वव्यवहार लोकमें होता है शरीरका लक्षण शास्त्रमें इस प्रकार कहा है “यस्य चेतनस्य यद्द्रव्य सर्वात्मना स्वार्थे नियन्तु धारयितु शक्य तच्छेषतैक- स्वरूप तत्तस्य शरीरम् ' इति । अर्थ-जो वस्तु जिस चेतनके स्वार्थके लिये नियमन करने योग्य हो और धारणकरने योग्य हो उस चेतनका सर्वदा शेषतन ( पारतन्त्र्य ) स्वरूप हो वह उस चेतनका शरीर है । तथाच चेतनाचेतनात्मकवस्तु ईश्वरका नियाम्य, ईश्वरका धार्य ओर ईश्वरका परतन्त्र होनेसे ईश्वरका शरीर है उक्त शरीर शरीरी भावमें अन्तर्यामीब्राह्मणश्रुति प्रमाण देते हैं ( यआत्मनि इत्यादि ) जो परमात्मा आत्मामें रहते हुए भी अन्तर्यामीरूपसे नियमन करते हैं जिसको आत्मा नहीं जानता है आत्मा जिसका शरीर है वही आत्मा है । इसमें दृष्टान्त देते हैं
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १०१) ( यःपृथिवीमन्वेदेत्यादि ) जिस प्रकार उस आत्माको अचेतनपृथिवी नहीं जानती है उसी प्रकार जीवात्मा भी अन्तर्यामी रूपसे अवस्थित परमात्माको नहीं जानता है इस प्रकार “ यस्यापःशरीरम् ’ यस्यमृत्युःशरीरम् ’ यस्यविज्ञान शरीरमित्यादि ” अनेक श्रुति प्रत्यक्ष शरीर शरीरी भावको कहती है यही घटकश्रुति भेद और अभेद दोनोंको अविरोधसे अर्थका वर्णन करती है ॥ २२ ॥ न च पर्यायत्वं द्वारभेदसम्भवात् । तथाहि जीवस्य शरीरत- या प्रकारभूतानि देवमनुष्यादिसंस्थानानीव सर्वाणि वस्तूनीति ब्रह्मात्मकानि तानि सर्वाणि ॥ अत –“देवो मनुष्यो यक्षो वा पिशाचोरगराक्षसा । पक्षी वृक्षो लता काष्ठं शिला तृण घट पटः॥” इत्यादयः सर्वे शब्दा प्रकृतिप्रत्यययोगेनाभिधायकतया प्रसिद्धा लोके तद्वाच्यतया प्रतीयमानतत्तत्संस्थानवद्वस्तुमुखेन तद- भिमानिजीवतदन्तर्यामिपरमात्मपर्य्यन्तसंस्थानस्य वाचकाः । देवादिश्ब्दानां परमात्मपर्य्यन्तत्वमुक्तं तत्त्वमुक्तावल्यां च- तुरन्तरे च ॥ २३ ॥ यदि समस्त शब्द शरीरशरीरी भावसे परमात्माके वाचक हो तो घट कलशके समान पर्यायता होगी ऐसी आशंका भी नहीं करसकते क्योंकि मनुष्यत्व, देवत्व, घटत्वादि द्वार ( प्रवृत्तिनिमित्त ) भेद होनेसे नीलघटके समान विशेष्य विशेषण भाव होनेसे पर्यायता नही होगी जीवके शरीरत्वरूपमे प्रसिद्ध देवमनुष्यादि अवयव- की नाई सब ही वस्तु ब्रह्मात्मक है इसी कारण, देव, मनुष्य, यक्ष, पिशाच, उरग, राक्षस, पक्षी, वृक्ष, काष्ठ, शिला, तृण, घट और पट इत्यादि जो सब शब्द प्रकृति प्रत्ययके योगमें अभिधायक कहकर लोकमें प्रसिद्ध है, सो सब ही उसकी वाच्यतामें प्रतीयमान तत्तत्संस्थान विशिष्ट वस्तु सहायसे तदभिमानी जीव और उसका अन्त- र्यामी परमात्मा पर्य्यन्त संस्थानका वाचक होता है । तत्त्वमुक्तावली और चतुरन्तर नामक ग्रन्थमे देवादि शब्दोंका परमात्मा पर्य्यन्तत्व कहा है ॥ २३ ॥ “जीव देवादिश्ब्दो वदति तदपृथक् सिद्धभावाभिधानं निष्कर्षाभावयुक्तो बहुरिह च दृढो लोकवेदप्रयोग ॥ आत्मा सवन्धकाले स्थितिरनवगता देवमर्त्यादिमूर्त्तेर्जीवात्मानुप्रवे- शाज्जगति विभुरपि व्याकरोन्नामरूपे ॥” इत्यनेन देवादिश्ब्दानां
( १०२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ गमानुज- शरीरपर्य्यन्तत्वं प्रतिपाद्य संस्थानेकसाध्यभाव इत्यादिना- शरीरलक्षणं दर्शयित्वा शब्दैस्तन्वंशरूपप्रभृतिभिरित्या- दिना विश्वेश्वरादपृथक्सिद्धत्वमुपपाद्य निष्कर्षोक्तेत्यादिना पद्येन सर्वेषां शब्दानां परमात्मपर्य्यन्तत्वं प्रतिपादितं । तत् सर्वं तत एवावधार्य्यम् । अयमेवार्थः समर्थितो वेदार्थसंग्रहे नामरू- पश्रुतिव्याकरणसमये रामानुजेन ॥ २४ ॥ देवादि शब्द जीवका वाचक है । और निष्कर्ष अभिप्राययुक्त सब लौकिक और वैदिक प्रयोग, जीवसे अभिन्न सिद्ध मागाभिधान अर्थात् परमात्माका वाचक होता है ॥ आत्मसम्बन्ध कालमे देव और मनुष्यादि मूर्तिविशिष्ट होकर जो अवस्थिति करता है, सो नहीं जानाजाता । वही जीवात्माही ससार्ग अनुप्रवेशकर, नाम और रूपव्यक्त करता है । यहां देवादि शब्दोंका शरीर पर्य्यन्तत्व प्रतिपादन कर, 'संस्थानैकसाध्यभाव' इत्यादिसे शरीरलक्षणकहकर " शब्दैस्तन्वंशरूपप्रभृतिभिरखिलं स्थाप्यते विश्वमूर्तेस्त्वन्मात्र प्रपञ्चस्तदनवगमतस्तत्प्रयुक्तसिद्धिमोहः । श्रोत्राद्यैराश्रयेभ्यः स्फुरति खलु पृथक्शब्द- गंधादिधर्मो जीवात्मन्यप्यदृश्ये वपुषि हि दृशा गृह्यतेऽनन्यदृष्टिम् ॥ " शब्दैस्तन्व शैरिति । " यस्यात्मा शरीरम् " " तत्सर्वं वै हरेस्तनु " " ममैवांशो जीवलोके ' इत्यादि तनु अंश और क्षेत्रादिशब्दोंद्वारा चेतनाचेतनात्मक समस्त प्रपञ्चको परमात्माका प्रकार अर्थात् अपृथक्सिद्ध विशेषणख्यापित किया है परन्तु तादृश ईश्वरापृथक्सि द्धत्वको जाननेसे देवादिंशब्दको लोकप्रसिद्ध केवल तत्तत्पिण्डविशेष अर्थोंमें पृथक्सिद्धिरूप मोह होता है यथा आकाशका प्रत्यक्ष न होने पर भी श्रोत्रादि इन्द्रियों द्वारा आश्रय आकाशसे पृथक् होकर शब्द, रस और गन्धादि प्रतीत होते हैं तथा जीवात्मा अदृश्य होनेपरभी ज्ञानद्वारा शरीरका ग्रहण होसकता है इस श्लोकसे परमात्मासे अपृथक्सिद्धत्व प्रतिपादन करके-"निष्कर्षोक्तेर्हानौ निमतपदपदान्य न्तरात्मानमेकं तन्मूर्तेर्वाचकत्वादभिदधति यया रामकृष्ण दिशब्दा । सर्वेषामात्म- मुख्यैरगणि च वचसा शाश्वतेऽस्मिन् प्रतिष्ठा पाकेस्तस्याप्रतीतेर्जगति तदितरे स्याच्च भक्त्या प्रयोग ॥ " निष्कर्षोक्तेरिति । पृथक्बोधतात्पर्य्यसे उच्चरित शब्द निष्कर्षोक्तशब्द है यथा देवदत्तके शरीर यहापर शरीरशब्दचेतनविशिष्टका बोधक नही किन्तु केवल शरीरका बोधक है यथावा गोशब्द गोत्वविशिष्टका बोधकहै परन्तु गोत्वानिष्कर्परूपसे गोत्वजातिमात्रका बोधक है तथा निष्कर्ष बोधनतात्पर्यके जहाँ हानि हो तहाँ शरीरवाचक शब्द शरीरीपर्यन्तका बोधक है
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १०३ ) जिस प्रकार रामकृष्णदिशब्दरामकृष्णादिशरीरबोध होते हुए भी परमात्मपर्य- न्तबोधक हैं इसीमें किसीको विप्रतिपत्ति नहीं है. क्योंकि “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति सर्वे वेदा यत्रैकीभवन्ति' । आपलोग समस्तशब्दोंकी शाश्वतपरमात्मामे विश्रान्ति अर्थात् तत्पर्यन्तबोधक माने हैं जिस प्रकार घटादिकोंके रूपाकादिकसे रूपान्तर- नामान्तरादिक होते हैं तथा प्रतीति न होनेसे केवल लक्षणाहीसे एकदेशका बोध होता है इस श्लोकसे समस्तशब्दोके परमात्मपर्यन्तबोधकत्व प्रतिपादन किया है । यह सब विषय वेदार्थसग्रहमें विस्ताररूपसे प्रतिपादित हैं ॥ २४ ॥ किञ्च सर्वप्रमाणस्य सविशेषविषयतया निर्विशेषवस्तुनि न किमपि प्रमाणं समस्ति निर्विकल्पकप्रत्यक्षेऽपि सविशेषमेव वस्तु प्रतीयते । अन्यथा सविकल्पके सोयमिति पूर्वप्रतिपन्न- प्रकारविशिष्टप्रतीत्यनुपपत्तेः ॥ २५ ॥ निर्विशेष वस्तुप्रतिपादक प्रमाणके अभावको कहते हैं-( किञ्चेति ) सिद्धान्तके मतमें प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द तीन प्रमाण हैं यह तीनों सविशेष विषय हैं तथाहि सविकल्पक ओर निर्विकल्पक भेदसे प्रत्यक्ष दो प्रकार है जाति, गुण, अवयव सन्निवेशादि अनेक पदार्थ विशिष्ट विषयग्रहण सविकल्पक प्रत्यक्ष है अत. यह सविशेष विषय है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष भी संस्थानरूप जात्यादि विशिष्ट ही रहता है अत एव सविकल्पक दशामें वही यह है. ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती हे अन्यथा निर्विकल्पमें यावत् विशेष शून्य हो तो उसीको सविकल्पक दशामें 'सोऽयम्' ऐसी प्रत्यभिज्ञा कदापि न हो सकेगी परन्तु निर्विकल्पक और सविकल्पकमें भेद इतना ही है कि सविकल्पकमें गोत्वादि अनेक व्यक्तिमें अनुवृत्ताकार प्रतीत होता हे नि- र्विकल्पकमें केवल एकही व्यक्तिमें प्रतीत होता है. शब्दभी सविशेष विषय है क्योंकि पदरूप अथवा वाक्यरूप शब्द है प्रकृतिप्रत्यय योगसे पद होता है प्रकृत्यर्थ अन्य हे और प्रत्ययार्थ अन्य है उन दोनोंका सम्बन्ध विशेष्य विशेषणभावादि होता है यथा-पाचक इस पदमें पाच प्रकृति अक प्रत्यय है प्रकृतिका अर्थ पाक क्रिया है प्रत्ययका अर्थ कर्ता हे विशिष्टका अर्थ पाककर्त्ता है अनेक पदार्थोंका संसर्ग होनेसे यह सविशेष हे वाक्य पदसमूह होनेसे सुतरा सविशेष रहेगा । अनुमान भी सविशेष विषय हे तथाहि अनुमानमें व्याप्ति पक्षधर्मतादि ज्ञान कारण है व्याप्ति प्रत्यक्ष दृष्टमें होती है प्रत्यक्ष सविशेष विषय होनेसे तन्मूलक अनुमानभी सविशेष विषय हे स्वानुभव मी "मैं अमुक वस्तु जानता हू" इत्यादि यत्किञ्चित् प्रकार विशिष्ट ही रहता है अतः निर्विशेष वस्तुमें कोई प्रमाणही नहीं है ॥ २५ ॥
( १०४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- किञ्च तत्त्वमस्यादिवाक्यं न प्रपञ्चस्य बाधकं भ्रान्तिमूल- त्वात् । भ्रान्तिप्रयुक्तरज्जुसर्पवाक्यवत् नापि ब्रह्मात्मैक्यज्ञानं निवर्त्तकं तत्र प्रमाणाभावस्य प्रागेवोपपादनात् ॥ २६ ॥ ( किञ्चेति ) तत्त्वमसि अयमात्मा ब्रह्म, इत्यादि वाक्यभी प्रपञ्चके बाधक नहीं हो सकते क्योंकि वह भी ब्रह्मव्यतिरिक्त होनेसे रज्जुसर्पादिवत् भ्रान्ति परिकल्पित है जिस प्रकार रज्जुमें सर्पभ्रान्तिके समय कोई भ्रान्त पुरुष आकर यदि कहे यह सर्प नहीं रज्जु हे ऐसे कहनेपरभी उसका भय नहीं छूटता क्योंकि वह जानता है कि यह स्वयं पागल हे तिसी प्रकार तत्त्वमसि भी ब्रह्मभिन्न होनेसे भ्रान्तवाक्य है ब्रह्म और आत्माका अभेद ज्ञानभी प्रपञ्चनिवर्तक नहीं हो सकता है तादृश ज्ञानका अप्रामाणिकत्व पूर्वही कह चुका हूं. तात्पर्य यह है कि, मायावादियोंकी अविद्याविषयमें सात प्रकारकी अनुपपत्ति है अविद्याके आश्रयकी अनुपपत्ति १ तिरोधानानुप- पत्ति २ अनिर्वचनीयत्वानुपपत्ति ३ स्वरूपानुपपत्ति ४ प्रमाणानुपपत्ति ५ निवर्तक त्वानुपपत्ति ६ निवृत्तिकी अनुपपत्ति ७ प्रमाणकी अनुपपत्ति विशदरूपसे पूर्वही कह चुका हूं अविद्याके आश्रय जीव नहीं हो सकता कारण कि अविद्या कल्पित जीव है जीवके बिना अविद्या नहीं हो सकेगी अविद्याके बिना जीव नहीं होसकेगा इस प्रकार अन्योन्याश्रय होगा ब्रह्मभी स्वयंप्रकाश ज्ञानरूप होनेके कारण स्वविरोधी अज्ञानका आश्रय नहीं होसकेगा । अद्वैतियोंके मतमें निर्विशेष चिन्मात्र अनुभूतिमें अविद्याका मूलभूत पारमार्थिक दोष न होनेसे अविद्यास्वरूप उत्पन्न नहीं हो सकेगा । अपर मार्थ दोष माने तो दोषके लिये पुन. दोषान्तर उसमें पुन' भी दोषान्तर इस प्रकार अनवस्था होगी । यदि ब्रह्महीका दोषरूप माने तो ब्रह्म नित्य होनेके कारण अविद्याकी निवृत्ति न होनेसे मोक्ष भी नहीं होगा अनिर्वचनीयत्वभी अनुपपन्न है क्योंकि अनि- र्वचनीयत्वको सत् और असत् इन दोनोसे विलक्षणत्व कहोगे तो ऐसी वस्तुमें कोई प्रमाणही नहीं है प्रतीतिसे वस्तुकी व्यवस्था होती है कोई प्रतीति सत्त्विषयक है ओर कोई प्रतीति असद्विषयक है अत एव संवित्सिद्धिमें कहा है "नासत्प्रतीतेर्वा- धाच्च न सदित्यपि यन्न तत् । प्रतीतेरेव सत्किं न बाधात्रासत् कुतो जगत् ॥" निर्विशेषवस्तुप्रतिपादक वाक्य तथा तादृशज्ञान दोनोंके न होनेसे निवर्तकत्वभी अनुपपन्न है निवृत्तिकी भी अनुपपत्ति है अनिर्वचनीय विरोधीको निवृत्ति कहेंगे तो अनिर्वचनीयका विरोधी निर्वचनीय है वह सत् है या असत् है या सदसद्रूप हे । किञ्च निवृत्तिको ब्रह्मस्वरूपसे अतिरिक्त मानोगे तो भेददर्शनरूप अविद्याकी निवृत्ति तो नहीं होगी । ब्रह्मस्वरूपहीको निवृत्ति मानो तो स्वरूप नित्य
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १०५ )
होनेके कारण ऐक्यज्ञानसे पूर्वभी स्वरूप विद्यमान है ऐक्यज्ञानसे अविद्याकी निवृत्ति ओर तदभावमें संसार होता है इत्यादि सिद्धान्तकाभी भंग होगा । किञ्च निवर्त्तकज्ञान भी ब्रह्मसे व्यतिरिक्त है अतस्त उसकी निवृत्ति किससे होगी ? ज्ञानान्तर कहो तो उसमें भी यही क्रम होगा अन्तत' एक ज्ञान ब्रह्मव्यतिरिक्त रहजायगा । तथा ब्रह्मव्य- तिरिक्त समस्त वस्तुओंका निषेध विषयज्ञानका ज्ञाता अध्यासस्वरूपको नहीं कह सकते क्योंकि वह निषेध्य है अतः निवर्त्तक ज्ञान कर्म होनेसे उसके कर्तृत्व नहीं हो सकेगा ब्रह्मस्वरूपहीको ज्ञाता मानोगे तो अद्वैतपक्ष छोड़कर विशिष्टाद्वैतमतमें प्रवेश होगा ॥ २६ ॥ न च प्रपञ्चस्य सत्यत्वप्रतिष्ठापनपक्षे एकविज्ञानेन सर्वविज्ञा- नप्रतिज्ञाव्याकोपः प्रकृतिपुरुषमहदहङ्कारतन्मात्रभूतेन्द्रियचतु- र्दशभुवनात्मकब्रह्माण्डतदन्तर्वर्त्तिदेवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरादि- सर्वप्रकारसंस्थानसंस्थितं कार्यमपि सर्व ब्रह्मैवेति कारणभूत- ब्रह्मात्मज्ञानादेव सर्वविज्ञानं भवतीत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञान- स्योपपन्नतरत्वात् ॥ अपिच ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य सर्वस्य मिथ्या- त्वे सर्वस्यासत्त्वादेवैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं बाध्येत ॥ २७ ॥ ( नचेति ) चेतन अचेतनात्मक प्रपञ्चका सत्यत्व स्वीकार करोगे तो उद्दालक ऋषिके स्वपुत्र श्वेतकेतुके प्रति एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानप्रतिज्ञाकी हानि होगी घटज्ञानसे पट जिस प्रकार ज्ञात नहीं होता है उसी प्रकार ब्रह्मविज्ञानसे प्रपञ्चकाभी ज्ञात नहीं होगा अद्वैत मतमें एक ब्रह्मही सत्य अन्य मिथ्या होनेसे ब्रह्मविज्ञानसे सर्वविज्ञान उपपन्न होता है यहभी अयुक्त है क्योंकि प्रकृति पुरुष महत् अहङ्कारादि मनुष्य स्थावरपर्यन्त अनेक संस्थान संस्थित समस्त कार्य ब्रह्मरूप है कारणभी ब्रह्म है अतः कारण विज्ञानसे कार्य विज्ञान होता है यही एक विज्ञानसे सर्व विज्ञानप्रतिज्ञाका तात्पर्य है । प्रत्युत अद्वैत पक्षमें ही एकविज्ञानप्रतिज्ञाको अनुपपन्नत्व कहते हैं ब्रह्म- व्यतिरिक्त समस्त मिथ्या है तो ज्ञातव्य सर्व पदार्थ कुछभी न होनेसे सर्व विज्ञ- प्रतिज्ञा सर्वथा अनुपपन्न होगी । यदि सर्व पदको सर्वाभावमें लक्षणा करोगे तो लक्ष- णाही दोष होगा । यदि एक पदार्थ और सर्व पदार्थको तादात्म्य कहोगे तो सर्वपदवाच्य प्रपञ्च मिथ्या होनेसे उसके साथ तादात्म्यापन्न ब्रह्मभी मिथ्या होगा अथवा ब्रह्मातादात्म्य होनेसे जगत्कोभी सत्यत्व होगा इत्यादि अनेक दूषण है ॥ २७ ॥
( १०६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज-
नामरूपविभागेनेदृक्सूक्ष्मदशावत् प्रकृतिपुरुषशरीरं ब्रह्मकार- णावस्थं जगतस्तदापत्तिरेव प्रलय नामरूपविभागविभक्तस्थू- लचिदचिद्वस्तुशरीरं ब्रह्मकार्यावस्थं ब्रह्मणस्तथाविधस्थूल भावश्च सृष्टिरित्यभिधीयते ॥ एवञ्च कार्यकारणयोरनन्यत्व- मप्यारम्भणाधिकरणे प्रतिपादितमुपपन्नतरं भवति ॥ २८ ॥ कार्यकारणका उपपादन-( नामरूपेत्यादि ) स्थूलचिदचित् विशिष्ट ब्रह्म कार्य है सूक्ष्मचिदाचिद्विशिष्ट कारण है चेतनाचेतनमें सूक्ष्मत्व नामरूपविभागका अनर्हत्व है और स्थूलत्व नामरूपविभागका अर्हत्व है । चेतनाचेतन दोनों ब्रह्ममें विशेष और ब्रह्म विशेष्य है एवञ्च चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्मही कारण और तादृश ब्रह्मही कार्य होनेसे कारणविज्ञानसे कार्य विज्ञान उपपन्न होता है । विशिष्ट कारण होनेपरभी विकारादि दोष विशेषणांशमें होते हैं विशेष्यांशमें नहीं होते । जिस प्रकार " शिखी- ध्वस्त " " स्वर्गी ध्वस्त " इत्यादि ध्वंसप्रतियोगित्व विशेषणभूत स्वर्गशिखादिमें रहता है । नामरूपविभागानर्ह प्रकृतिपुरुष शरीरापन्न कारणावस्थाका नाम प्रलय है नामरूपविभागार्ह स्थूलरूपापत्ति सृष्टि है । कार्यकारणका अभेद आरम्भणाधिकर णमें सुस्पष्ट प्रतिपादन किया है " उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवा- दोपपत्तिश्च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये ' ॥ इत्युक्त तात्पर्यनिर्णायक षड्विध लिङ्ग इसी पक्षमें उपपन्न होते हैं। तथाहि उपक्रममें ( सदेव सौम्येत्यादि ) वाक्य ब्रह्मको निमि- त्तोपादानत्व तथा तदुपयोगी सर्वज्ञत्व सत्यसङ्कल्पत्वादिक प्रतिपादन किया है वह सविशेष विषय है । तत्त्वमसि इति उपसंहारमें सामानाधिकरण्यभी प्रवृत्तिनिमित्त भेद होनेसे सविशेष विषय है विशिष्टका एकत्व वृक्ष नदी समुद्रादि दृष्टान्तद्वारा नौ वार आवृत्त होनेसे अभ्यास भी है समस्त प्रपञ्चको ब्रह्म विशेषणत्वप्रमाणान्तरसे अप्रतीत होनेसे अपूर्वताभी है एतादृश ज्ञानवान्को तस्य तावदेव चिरमित्यादिसे मोक्षप्रतिपादन होनेसे फलभी है पितापुत्रसंवाद होनेसे अर्थवादभी है मृत्कार्य दृष्टान्त प्रतिपादनसे उपपत्तिभी है । एतादृश लिङ्ग अद्वैत मतमें उपपन्न नहीं होस- कते क्योंकि यह सब सविशेष विषयक हैं ॥ २८ ॥ निर्गुणवादाश्च प्राकृतहेयगुणनिषेधविषयतया व्यवस्थिता नानात्वनिषेधवादाश्च एकस्यैव ब्रह्मण शरीरतया प्रकारभूतं सर्वं चेतनाचेतनात्मकं वस्त्विति सर्वस्यात्मतया सर्वप्रकार
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १०७ ) ब्रह्मैवावस्थितमिति सर्वात्मकब्रह्मपृथग्भूतवस्तु सद्भावनिषे- धपरत्वाभ्युपगमेन प्रतिपादिताः ॥ २९ ॥ "निष्कल निरञ्जनम्" इत्यादि गुणनिषेधक वचन हेयगुणका निषेध करते हैं. सत्यकामादि वाक्य समस्त कल्याण गुणोंको प्रतिपादन करते हैं। कहाभी है- "यद्ब्रह्मणोगुणशरीरविकारभेदकर्मादिगोचरविधिप्रतिषेधवाचः । अन्योन्यभिन्नविष- यानविरोधगन्धमर्हन्ति तन्नविधय प्रतिषेधबाध्य ॥ इति ॥ " "नेह नानास्ति" इत्यादि नानात्वनिषेधक वाक्यभी समस्त चेतनाचेतनात्मक वस्तु ब्रह्मके शरीर और ब्रह्म आत्मा होनेसे अब्रह्मात्मक नानात्वका निषेध करते हैं। ब्रह्मका शरीरभूत चेतनाचेतनात्मक प्रपञ्चका निषेधक नही है अत निर्विशेषाद्वैतवोधक नही है अत एव "न द्वैत प्रतिपादपन्त्युपनिषद्वाच प्रसिद्धं हितात्किन्त्वैद्वतमनन्यगोचरतया तद्धेयमास्थीयताम् । अप्राप्ते खलु शास्त्रमर्थवदितिव्यर्थप्रयासो यत प्रख्यातादपरस्तु शास्त्रविषयो भेदस्त्वदद्वैतवत् ॥" इत्यादि आचार्यों ने कहा है ॥ २९ ॥ किमत्र तत्त्वं भेदः अभेद उभयात्मक वा सर्वशरीरतया सर्वप्रकारं ब्रह्मैवावस्थितमित्यभेदोऽभ्युपेयते एकमेव ब्रह्म नानाभूतचिद्- चित्प्रकारं नानात्वेनावस्थितमिति भेदाभेदौ चिदचिदीश्वरा- णां स्वरूपस्वभाववैलक्षण्यादसंकराच्च भेदः ॥ ३० ॥ भेदाभेदादि तीन प्रकारके तत्त्व श्रुतिमें प्रतिपादित होनेसे मतान्तरमें एकको मुख्यत्व अन्यको बाधितत्व अर्थात् औपचारिकत्व कहते हैं। परन्तु विशिष्टाद्वैतमें श्रुतिप्रतिपादित होनेसे एककाभी बाध नही। इसी बातको प्रश्नपूर्वक कहते हैं (किमत्र तत्त्वमित्यादि) समस्त वस्तु ब्रह्मके शरीर है अत एव ब्रह्ममें प्रकार होनेसे तादृश प्रकारविशिष्ट प्रकारी ब्रह्म एक होनेसे एकमेवाद्वितीयमित्यादि अभेद श्रुति उपपन्न होती है। एकही ब्रह्मके प्रकारभूत चेतनाचेतनात्मक शरीर नानात्वेन अव- स्थित होनेसे विशेषणांश लेकर भेद और विशिष्ट रूपसे अभेद दोनों उपपन्न होते हैं चित् अचित् और ईश्वरके स्वरूप और स्वभाव विलक्षण होनेसे परस्पर असांकर्यके लिये भेदभी उपपन्न होगया ॥ ३० ॥ तत्र चिद्रूपाणा जीवात्मनामसङ्कुचितापरिच्छिन्ननिर्मलज्ञानरू- पाणामनादिकर्मरूपाविद्यावेष्टितानां तत्तत्कर्मानुरूपज्ञानस- ङ्कोचविकासा भोग्यभूता चित् भोक्ता संसर्गः तदनुगुणसुखदु -
( १०८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- सोपभोगद्वयवत् कृता भगवत्प्रतिपत्तिः भगवत्पदप्राप्तिरित्या- दयः स्वभावा । अचिद्वस्तूनान्तु भोग्यभूतानामचेतनत्वमपुरु- षार्थत्वं विकारास्पदत्वमित्यादयः परस्येश्वरस्य भोक्तृभोग्ययो- रुभयोरन्तर्यामिरूपेणावस्थानमपरिच्छेद्यज्ञानैश्वर्यवीर्यशक्ति तेज प्रभृत्यनवस्थितातिशयासंख्येयकल्याणगुणगणता स्व- सङ्कल्पप्रवृत्तस्वेतरसमस्तचिदचिद्वस्तुजातता स्वाभिमतस्वा- नुरूपैकरूपदिव्यरूपनिरतिशयविविधानन्तभूषणतेत्यादय ॥३१ स्वत्र असंकुचित अपरिच्छिन्न निर्मल ज्ञानस्वरूप होनेपरभी अनादि कर्मरूप अवि द्यामे वेष्टितस्वरूप चेतन जी वात्माकातत्तत्कर्मानुसार ज्ञानका संकोचविकास एव भोग्य भूत अचित्संसर्गजनित सुखदुःखोपभोग-भगवत्प्रपत्ति भगवत्प्राप्तिकत्वादि स्वभाव है । भोग्यभूत अचिद्वस्तुके अचेतनत्व अपुरुषार्थत्व और विकारित्वादि स्वभाव हैं । भोक्ता भोग्य दोनोंके अन्तर्यामीरूपसे अवस्थान, अपरिच्छिन्न, ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज प्रभृति अनवधिक और अनतिशय असंख्येय कल्याण गुणवत्त्व स्वसङ्कल्पमें प्राप्त हे सत्ता जिसको ऐसे स्वेतर समस्त चेतनाचेतनात्मक वस्तु समु दायरूप स्वानुरूप स्वाभिमत दिव्यभूषत्त्वादिमत्त्व परमात्माका स्वभाव हे ॥ ३१ ॥ वेङ्कटनाथेन त्वित्थं निराटङ्कि पदार्थविभाग - "द्रव्याद्रव्यप्रभे- दायितमुभयविधं तद्विद तत्समाहु द्रव्यं द्वेधा विभक्त जडमज- डमिति प्राच्यमव्यक्तकालौ । अन्त्यं प्रत्यक् पराक् च प्रथममु- भयथा तत्र जीनेशभेदात् नित्या भूतिर्मतिश्चेत्यपरमिह जडा- मादिमा केचिदाहु "॥ तत्र- "द्रव्यं नाना दशावत् प्रकृतिरिह गुणै सत्त्वपूर्वेरुपेता कालोऽब्दाद्याकृति स्यादणुरवगतिमान् जीव ईशोऽन्य आत्मा । संप्रोक्ता नित्यभूतिस्त्रिगुणमपि परा सत्त्वयुक्ता तथैव ज्ञातुर्नेया प्रभासा मतिरिनि कथित मग्रहाद्व- व्यलक्ष्म्" ॥ इत्यादिना ॥ ३२ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १०९ ) प्रथम ( जडमी ) अव्यक्त कालभेदसे द्विविध हैं । अन्त्य ( अजड ) प्रत्यक् और पराक् भेदसे दो प्रकार है । प्रत्यक्भी जीव और ईश्वरभेदसे दो प्रकार हैं । नित्य विभूति और मतिभेदसे पराक्भी द्विविध है नित्य विभूतिको कोई २ जड कहते हैं। द्रव्य अनेक अवस्थाश्रय है सत्वरज तमोगुणयुक्त प्रकृति है । वर्षमासा- दिरूप काल है । अणुपरिमाण ज्ञानाश्रय जीव है । जन्य अर्थात् विभु ज्ञानाश्रय ईश्वर है । त्रिगुणातीत शुद्ध सत्त्वगुणयुक्त नित्य विभूति और ज्ञाताको ज्ञेय (विषय) का अवभास ( प्रकाश ) जिससे हो वह मति है । इस प्रकार सग्रहसे लक्षण कहाहै ॥ ३२ ॥ ' तत्र चिच्छब्दवाच्या जीवात्मानः परमात्मनः सकाशाद् भिन्नाः नित्याश्च । तथाच श्रुतिः “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” इत्या- दिका ॥ ३३ ॥ ( तत्रेति ) चित्पदप्रतिपाद्य जीव परमात्मासे भिन्न और नित्य है ( द्वासुपर्णेति ) सुपर्णके समान सर्वदा सहवर्तमान जीवात्मा और परमात्मा दोनों एकही वृक्षरूपी शरीरमें रहते हैं उनमेंसे एक(जीव ) कर्मके फलको भोगता है परमात्मा स्वकर्मफलको न भोगते हुए जीवको भोगाकर अत्यन्त प्रकाशित होते हैं ॥ ३३ ॥ अतएवोक्तं नानात्मानो व्यवस्थात इति । तन्नित्यत्वमपि श्रुति- प्रसिद्धम् । “ न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥” इति ॥ अन्यथा कृतप्रणाशाकृताभ्या- गमप्रसङ्गः । अतएवोक्तं वीतरागजन्मादर्शनादिति । तद- णुत्वमपि श्रुतिप्रसिद्धम् । “वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पि- तस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ” इति ॥ “आराग्रमात्रः पुरुष एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः” इति च ॥ ३४ ॥ अतएव सुख दुःख तथा बन्ध मोक्षादि व्यवस्थाके बलसे आत्माका नानात्व सांख्योंने भी माने हैं । “ नित्यो नित्यानाम् ” इत्यादि श्रुतिभी आत्मबहुत्वमे प्रमाण है । नित्यत्वभी श्रुति प्रसिद्ध है । विपश्चित् जीव ( विविधप्रकार-अर्थात् विशेष रूपसे देखनेवाले ) न उत्पन्न होता है और न मरता है न उत्पन्न हुआ और न
( ११० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज-
होगा अतएव उत्पत्ति विनाशरहित होनेसे अज और नित्य प्रकृतिवत् परिणामशील न होनेसे शाश्वत एव पुरातन हैं । इस कारण शरीरका नाश होनेपरभी आत्माका नाश नहीं होता है । यदि एतादृश नित्यत्व न माना जाय तो कृतप्रणाश अकृतका आगम ( प्राप्ति ) असङ्ग होगा अतएव रागद्वेषादि शून्यको जन्माभाव न्यायसूत्रका- रनेभी कहा है । अणुत्वभी श्रुतिसिद्ध है केशके अग्र भागके प्रथम सौ १०० टुकडे करके पश्चात् एक एकके सौ सौ टुकडे करनेसे एक भागका जो परिमाण हो वह जीवका परिमाण है वह जीव अनन्त ( असंख्य ) हैं । और जीवरूप पुरुष आरेकी अग्रके समान सूक्ष्म है । आत्मा ( जीव ) अणुपरिमाण चक्षुरादि इन्द्रियोंके अग्राह्य केवल मनसे जानने योग्य है ॥ ३४ ॥ अचिच्छब्दवाच्यं दृश्यं जडं जगत् त्रिविधं भोग्यभोगोपकर- णभोगायतनभेदात् । तस्य जगतः कर्त्तोपादानं चेश्वरपदार्थः पुरुषोत्तमो वासुदेवादिपदवेदनीयः । तदप्युक्तम्—"वासुदेवः परं ब्रह्म कल्याणगुणसंयुतः । भुवनानामुपादानं कर्त्ता जीवनि- यामक ॥" इति ॥ ३५ ॥ अचित्पदबोध्य दृश्य जडरूप जगत् तीन प्रकार हैं । भोग्य ( घटादि ) भोगोप करण ( इन्द्रियादि ) भोगस्थान ( शरीरादि ) भेद हैं एतादृश जगत्का कर्त्ता और उपादान ( समवाय ) कारण दोनों ईश्वर है । वह पुरुषोत्तम वासुदेव नारायणादि शब्दवाच्य है । सत्यकामत्वादि कल्याणगुणयुक्त वासुदेवही परब्रह्म हे वह जगत्का उपादान और कर्त्ता तथा जीवोंके अन्तर्यामी होकर नियमन करते हैं । इत्यादि पञ्च रात्रमें प्रसिद्ध है ॥ ३५ ॥ स एव वासुदेवः परमकारुणिको भक्तवत्सलः परमपुरुषस्तदुपा- सversionकानुगुणतत्तत्फलप्रदानाय स्वलीलावशादर्चाविभवव्यूहसू- क्ष्मान्तर्यामिभेदेन पञ्चधाऽवतिष्ठते । तत्रार्चा नाम प्रतिमादयः । रामाद्यवतारा विभव । व्यूहश्चतुर्विधः वासुदेवसङ्कर्षणप्रद्युम्ना- निरूद्धसंज्ञक । सूक्ष्मं सम्पूर्णं षड्गुणं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म । गुणा अपहतपाप्मत्वादयः । 'सोऽपहतपाप्मा विरजो विमृत्यु- र्विशोको विजिघत्सः सत्यकामः सत्यसङ्कल्प ' इति श्रुते ।
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १११ ) अन्तर्यामी सकलजीवनियामकः 'य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानम- न्तरोयमयति' इति श्रुतेः । तत्र पूर्वपूर्वमूर्त्युपासनया पुरुषार्थपरि- पन्थिदुरितनिचयक्षये सत्युत्तरोत्तरमूर्त्युपास्त्यधिकारः ॥ ३६ ॥ वही वासुदेव परम दयालु और भक्तवत्सल परमात्मा अपने उपासक भक्तोंकी उपासनाके अनुकूल फल देनेके लिये स्वकीय लीलासे पर, व्यूह, विभव, अर्चा और अन्तर्यामी इन पांच भेदोंसे अवस्थित है । अर्चा-दिव्यदेशादि मन्दिरोंकी प्रतिमा है, रामकृष्णादि अवतार विभव हैं, वासुदेव संकर्षण प्रद्युम्न और अनिरुद्ध इन भेदोंसे चतुर्विध व्यूह है । सूक्ष्म सम्पूर्ण षड ऐश्वर्य और षडगुणादि सम्पन्न वासुदेव परब्रह्म है । अपहत पाप्मा ( निष्पाप ) विरज विमृत्युत्वादि तथा सत्यकाम्त्वादि कल्याणगुण एवम् ज्ञान शक्ति बल ऐश्वर्य वीर्य्यतेजप्रभृति गुण हैं । सम्पूर्ण जीवोंके नियामक परमात्मा अन्तर्यामी है “जो परमात्मा आत्मामें रहकर आत्माको अन्त- र्यामी होकर नियमन करता है" इत्यादि श्रुति भी है पूर्वपूर्व मूर्त्तिकी उपासनासे परमपुरुषार्थ लक्षण मोक्ष विरोधी पापका क्षय होकर उत्तर उत्तर मूर्त्तिकी उपासनामें अधिकार होता है ॥ ३६ ॥ तदुक्तम्- “वासुदेवः स्वभक्तेषु वात्सल्यात् तत्तदीहितम् । अधिकार्यानुगुण्येन प्रयच्छति फलं बहु ॥ तदर्थं लीलया स्वीया पञ्च मूर्तीः करोति वै । प्रतिमादिकमर्चा स्यादवता- रास्तु वैभवाः ॥ सङ्कर्षणो वासुदेव प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः । व्यूहश्चतुर्विधो ज्ञेयः सूक्ष्मं सम्पूर्णषड्गुणम् ॥ तदेव वासुदेवा- ख्यं परं ब्रह्म निगद्यते ॥ अन्तर्यामी जीवसंस्थो जीवप्रेरकईरि- त ॥ य आत्मानीतिवेदा-तवाक्यजालैर्निरूपित ॥ अर्चापासनया क्षिप्ते कल्मषेऽधिकृतो भवेत् ॥ विभवोपासने पश्चाद्व्यूहोपास्तौ तत परम् । सूक्ष्मे तदनु शक्त स्यादन्त- र्यामिणमाश्रितुम् ॥" इति ॥ ३७ ॥ कहाभी है-वासुदेव भगवान् भक्तविषयक वात्सल्यसे अधिकारीके अनुगुण भक्तोंको अभिमत बहुविध फलको देते हैं ( इसीके लिये लीलापूर्वक अर्चादि पञ्चरूपसे स्वयं अवस्थित रहते हैं ) प्रतिमादि अर्चा अवतार विभव, संकर्षणादि व्यूह सम्पूर्ण छहों गुणोंसे युक्त परवासुदेव सूक्ष्म, जीवात्मामें स्थित और जीवोंको प्रेरक अन्तर्यामी है
( ११२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- यह सब "आत्मनि तिष्ठन् " इत्यादि वेदान्त वचनोंसे प्रतिपादित है। अर्चाकी उपासनासे पाप क्षीण होनेपर विभवकी उपासनाके अधिकारी होते हैं अनन्तर व्यूहोपासनाके, तदनन्तर सूक्ष्मोपासनाके, तदनन्तर अन्तर्यामीके साक्षात्कार करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ३७ ॥ तदुपासनञ्च पञ्चविधम्, अभिगमनमुपादानमिज्या स्वाध्यायो योग इति श्रीपञ्चरात्रेऽभिहितम् । तत्राभिगमन नाम देवता- स्थानमार्गस्य संमार्जनोपलेपनादि । उपादानं गन्धपुष्पादि- पूजासाधनसम्पादनम् । इज्या नाम देवतापूजनम् । स्वाध्या योनाम अर्थानुसन्धानपूर्वकं मन्त्रजपो वैष्णवसूक्तस्तोत्रपाठो नामसङ्कीर्तनं तत्त्वप्रतिपादकशास्त्राभ्यासश्च । योगो नाम देवतानुसन्धानम् । एवमुपासनाकर्मसमुचितेन विज्ञानेन द्रष्टृ दर्शने नष्टे भगवद्भक्तस्य तन्निष्ठस्य भक्तवत्सलः परमकारुणिकः पुरुषोत्तमः स्वयाथात्म्यानुभवानुगुणनिरवधिकानन्दरूपं पुनरावृत्तिरहितं स्वपदं प्रयच्छति । तथाच स्मृति -मामुपेत्य पुर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मान संसिद्धि परमां गता " इति॥ स्वभक्तं वासुदेवोऽपि संप्राप्यानन्दमक्षयम् । पुनरावृत्तिरहितं स्वीयं धाम प्रयच्छति॥" इति च ॥ ३८ ॥ उपासनाभी अभिगमन, उपादान, इज्या, स्वाध्याय और योग इन भेदोंसे पाँच प्रकार पाञ्चरात्रमें वर्णित है । मन्दिरोंमें तथा मन्दिरोंके मागोंमे मार्जन और लेप- नादि अभिगमन है। गन्ध पुष्पादि पूजासामग्री प्राप्त करना उपादान है। भगवत्पूजन इज्या है अर्थानुसन्धानपूर्वक अष्टाक्षर और द्वय मन्त्रादिका जप पुरुषसूक्त श्रीसूक्तादि स्तोत्रपाठ, भगवन्नामकीर्तन और तत्त्वप्रतिपादक वेदान्तादि शास्त्रोंका अभ्यास स्वाध्याय है और भगवत् स्वरूपका अनुसन्धान योग है उपासना रूप कर्मसहित ज्ञानसे द्रष्टृ दर्शनादि नष्ट होनेपर भगवद्विषयमें तैलधाराकी समान अविरत भक्तियुक्तको परम कारुणिक पुरुषोत्तम भगवान् स्वकीय स्वरूप और स्वभावको यथावत् अनु- भवके योग्य और निरवधिक आनन्दरूप पुनरावृत्तिरहित परमपद ( वैकुण्ठ ) प्राप्ति- रूप मोक्षको देते हैं ( भगवद्गीतामेंभी कहा है ।) भगवत् प्राप्तिरूप परम सिद्धि
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ११३ ) (मोक्ष) को प्राप्त पुरुष दुःखका आलयरूप नश्वर संसारको नहीं पाते । वासुदेव भगवान् स्वभक्तोंके परमानन्द युक्त अक्षय पुनरावृत्ति रहित स्वकीय लोकको देते हैं । इत्यादि ॥ ३८ ॥ तदेतत् सर्वं हृदि निधाय महोपनिषन्मतावलम्बनेन भगवद्बो- धायनाचार्यकृतां ब्रह्मसूत्रवृत्तिं विस्तीर्णामालक्ष्य रामानुजः शारीरकमीमांसाभाष्यमकार्षीत् । तत्र 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इति प्रथमसूत्रस्यायमर्थ । अत्र अथशब्द पूर्वप्रवृत्तकर्माधिगमना- नन्तर्यार्थ । तदुक्तं वृत्तिकारेण-वृत्तात् कर्माधिगमादनन्तरं ब्रह्म विविदिषता " इति । अत शब्दो हेत्वर्थ. अधीतसा- ङ्गवेदस्याधिगततदर्थस्य विनश्वरफलात् कर्मणो विरक्तत्वाद्धेतोः स्थिरमोक्षाभिलाषुकस्य तदुपायभूतब्रह्मजिज्ञासा भवति । ब्रह्मशब्देन स्वभावतो निरस्तसमस्तदोषानवधिकातिशया- संख्येयकल्याणगुणगण· पुरुषोत्तमोऽभिधीयते ॥ ३९ ॥ यह सब हृदयमें रखकर सम्पूर्ण उपनिषद्का अवलम्बन करके भगवद् बोधायनमहर्षिनिर्मित अतिविस्तृत ब्रह्मसूत्रवृत्तिको आधुनिक मनुष्योंको दुर्बोध जानकर भगवान् श्रीरामानुजाचार्यजीने शारीरकमीमांसाभाष्य निर्माण किया “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” यह प्रथम सूत्र है इसमें अथशब्द आनन्तर्य अर्थक है आनन्तर्य पूर्व अतीतकी अपेक्षा होता है अतीत कर्मज्ञान हे अत कर्मज्ञानके अन- न्तर यह अर्थ होता हे । वृत्तिकारनेभी कर्मज्ञानके अनन्तर ब्रह्मविचार कहा हे अतः शब्दका अर्थ हेतु हे अधीतसाङ्ग समस्त वेदवेदान्त पुरुषको कर्ममें अल्प ओर नश्वर- फलवत्त्व निश्चित होनेसे तद्विपरीत अनन्त और स्थिरफलक ब्रह्मजिज्ञासा उत्तर का- लमें होती हे ब्रह्मशब्दसे समस्तदोषरहित और अनवधिक असंख्यात कल्याणगुणों का सागर पुरुषोत्तम बोधित हे यद्यपि ब्रह्मशब्द सामान्यवाची हे तथापि पशुशब्द चतुष्पाद जन्तुवाचक होनेपरभी “पशुना यजेत” यहापर “छागो वा मन्त्रवर्णात्” इस न्यायसे जिस प्रकार छागरूप पशुका ग्रहण होता है तिसी प्रकार “सदेव” आत्मावेत्यादिमें प्रतिपादित सत्,ब्रह्म, आत्मादि शब्द भी ‘एको ह वै नारायण (अग्र) आसीत् न ब्रह्मा नेशान' इत्यादि नारायणानुवाकके बलसे नारायणरूप विशेषार्थका निर्णायक ब्रह्मशब्द है ॥ ३९ ॥
४ ११४) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- एवञ्च कर्मज्ञानस्य तदनुष्ठानस्य च वैराग्योत्पादनद्वारा चित्त- कल्मषापनयनद्वारा च ब्रह्मज्ञानं प्रति साधनत्वेन तयोः कार्य्य- कारणत्वेन पूर्वोत्तरमीमांसयोरेकशास्त्रत्वम् । अतएव वृत्तिका- रा एकमेवेदं शास्त्रं जैमिनीयेन षोडशलक्षणेनेत्याहुः ॥ ४० ॥ (एवञ्चेति) कर्म ज्ञान ओर उसका अनुष्ठान यह दोना वैराग्य और कल्मषनिरसन द्वारा ब्रह्मज्ञानके साधन होनेसे कर्मज्ञान ओर ब्रह्मज्ञानके परस्पर कार्यकारणभाव हे अतः तत्प्रतिपादक पूर्वोत्तर मीमांसा दोनोंका एक शास्त्रत्व हे । अतएव वृत्तिकारनेभी षोडशलक्षणात्मक जैमानीय शास्त्रके साथ एक शास्त्रत्व वेदान्तको कहा है। यद्यपि जैमिनिकृत मीमासा द्वादशाध्यायात्मक है तथापि सङ्कर्षण प्रोक्त चतुर्ध्यायात्मक मिलाकर षोडशाध्याय होते हैं ॥ ४० ॥ कर्मफलस्य क्षयित्वं ब्रह्मज्ञानफलस्य चाक्षयित्वं 'परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन' इत्यादि- श्रुतिभिरनुमानार्थापत्त्युपबृंहिताभिः प्रत्यपादि । एकैकनिन्दया कर्मविशिष्टस्य ज्ञानस्य मोक्षसाधनत्वं दर्शयति श्रुतिः 'अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः । विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते" इत्यादि ॥ ४१ ॥ कर्म फलका क्षयित्व और ब्रह्मज्ञानका अनन्त अक्षय फलत्व श्रुति अनुमान अर्थापत्त्यादि प्रमाण सिद्ध है 'कृष्यादि कर्मसे सम्पादित सस्यादि फलके समान यागादि कर्मसे सम्पादित स्वर्गादि फलको भी नाशवान् जानकर त्रैवर्णिक वैराग्य प्राप्त करे क्योंकि कृत अनित्य कर्मसे अकृत (नित्य) मोक्ष नहीं होता है। अध्रुव (क्षणिक) कर्मसे ध्रुव (नित्य) मोक्ष नहीं मिलता इत्यादि श्रुति हे। जो कृतक हे वह अनित्य है इत्यादि अनुमान हे । केवल कर्म और केवल ज्ञानको निन्दित करके कर्म समुचित ज्ञानको मोक्षसाधनता श्रुति कहती है जो केवल कर्मका अनुष्ठान करते हैं वे घोर तमोगुण प्रधान प्रकृति (संसार) को प्राप्त होते हैं। एव जो केवल ज्ञाननिष्ठ हैं वे उसमेभी अधिक तमोगुणको प्राप्त होते हैं। जो कर्म जोग ज्ञानको युगपत अनुष्ठान करते हैं वे कर्मसे ज्ञानके विरोधी प्राचीन कर्मको विनाश कर्क विद्यासे (ज्ञान से) ब्रह्मस्वरूपको पाते हैं (कोई २ "अविद्यया मृत्यु तीत्वो" यहापर
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ११६ ) “ समार प्राप्य ” ऐसा अर्थ करते हैं वह पाण्डित्यकी पराकाष्ठा वैदिक और लौकिक किसी कोशमें अथवा व्यवहारमें कहींभी प्राप्ति अर्थमें तृधातुका प्रयोग नहीं दृष्टि आता ॥ ४१ ॥ तदुक्तं पाञ्चरात्ररहस्ये-“स एव करुणासिन्धुर्भगवान् भक्तव- त्सलः । उपासकानुरोधेन भजते मूर्तिपञ्चकम् ॥ तदर्चाविभ- वव्यूहसूक्ष्मान्तर्यामिसंज्ञकम् । यदाश्रित्यैव चिद्वर्गस्तत्तज्ज्ञेयं प्रपद्यते ॥ पूर्वपूर्वोदितोपास्तिविशेषक्षीणकल्मषः । उत्तरोत्तर- मूर्तीनामुपास्त्याधिकृतो भवेत् ॥ एवं ह्यहरहः श्रौतस्मार्त्तध- र्म्मानुसारतः । उक्तोपासनया पुंसां वासुदेवः प्रसीदति ॥ प्रस- न्नात्मा हरिर्भक्त्या निदिध्यासनरूपया । अविद्यां कर्मसङ्घात- रूपां सद्यो निवर्त्तयेत् ॥ ततः स्वाभाविकाः पुंसां ते संसारा- त्तिरोहिता । आविर्भवन्ति कल्याणाः सर्वज्ञत्वादयो गुणाः ॥ ४२ ॥ अत एव पञ्चरात्रमें कहा है । भक्तप्रिय दयासागर भगवान् उपासकोंके अनु- रोधसे पाँच प्रकारके विग्रहको धारण करते हैं । जिन मूर्तियोंकी उपासना करके चेतनवर्ग तत्तत्प्राप्य वस्तुको प्राप्त करते हैं । पूर्व पूर्व मूर्तियोंकी उपासनासे क्षीण पाप पुरुष उत्तरोत्तर मूर्तिकी उपासनाके अधिकारी होते हैं इसीप्रकार प्रतिदिन श्रौतस्मार्त्तकर्मानुष्ठानयुक्तपूर्वोक्त उपासनासे वासुदेव भगवान् प्रसन्न होते हैं । निदिध्यासनरूप भक्तिसे प्रसन्न भगवान् कर्मसङ्गतक अविद्याको शीघ्र दूर करते हैं । तदनन्तर चेतनको संसारदशामे तिरोहित स्वाभाविक सर्वज्ञत्वादि कल्याणगु- णजात आविर्भूत होते हैं ॥ ४२ ॥ एवं गुणा समाना स्युर्मुक्तानामीश्वरस्य च । सर्वकर्तृत्वमेवैकं तेभ्यो देवे विशिष्यते ॥ मुक्तास्तु शेषिणि ब्रह्मण्यशेषे शेपरू- पिण । सर्वानश्नुवते कामान् सह तेन विपश्चिता”इति ॥ ४३ ॥ इस प्रकार अपहतपाप्मत्व, सर्वज्ञत्व, सत्यकामत्वादि कल्याण गुण यह सब मुक्त और ईश्वर दोनोंमें समान हैं केवल ईश्वरमें सृष्टिकर्तृत्व अधिक है सर्वशेषी ( स्वामी ) ब्रह्ममें शेषरूपयुक्त चेतन सम्पूर्ण कल्याण गुणको ब्रह्मके साथही अनुभव करते हैं ॥ ४३ ॥
(११६) सर्वदर्शनसंग्रह । [रामानुज- तस्मात्तापत्रयातुरैरमृतत्वाय पुरुषोत्तमादिपदवेदनीयं ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तं भवति । प्रकृतिप्रत्ययैः प्रत्ययार्थ प्राधा- न्येन सह ब्रूत इत स नोऽन्यत्रेति वचनबलादिच्छाया इष्यमा- णप्रधानत्त्वादिष्यमाणं ज्ञानमिह विधेयम् ॥ ४४ ॥ अतः आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिकादि दुःखत्रयसे पीडित चेतनोंको अमृत (मोक्ष) प्राप्तिके लिये पुरुषोत्तमादि शब्दवाच्य परब्रह्मविषयक जिज्ञासा करनी चाहिये । ब्रह्मजिज्ञासापद सन्प्रत्ययान्त है सन्प्रत्ययका अर्थ इच्छा और प्रकृतिका अर्थज्ञान है प्रकृति प्रत्ययार्थके मध्यमे प्रत्ययार्थ प्रधान होता है एवञ्च प्रत्ययार्थ इच्छाप्रधान होनेपरभी इच्छा पुरुषाधीन न होनेसे उसका विधान अस म्भव है धात्वर्थज्ञान इच्छामें विशेषणीभूत होनेसे उसकाभी विधान सम्भव है । इसी अभिप्रायसे कहते हैं प्रकृति प्रत्यय इत्यादि न्याय सन् प्रत्ययसे अन्यत्र लगता है । इसमें युक्ति यह है कि इच्छा विषयके परतन्त्र होती है । एवञ्च ज्ञानकी इच्छा ज्ञानके परतन्त्र होनेसे इच्छाका कर्मभूतज्ञान प्रधान होत इष्यमाण ज्ञानही विधेय है यही प्रकृति प्रत्यय इत्यादि विधेय पर्यन्त ग्रन्थका तात्पर्य है ॥ ४४ ॥ तच्च ध्यानोपासनादिशब्दवाच्यं वेदनम्, न तु वाक्यजन्यमापात- ज्ञानम् । पदसन्दर्भश्राविणो व्युत्पन्नस्य विधानमन्तरेणापि प्राप्त- त्वात् 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्य श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्या- सितव्यः । आत्मेत्येवोपासीत विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत अनुविद्य विजानाति" इत्यादिश्रुतिभ्य । अत्र श्रोतव्य इत्यनुवाद । अध्य- यनविधिना साङ्गस्य ग्रहणे अधीतवेदस्य पुरुषस्य प्रयोजनव- दर्थदर्शनात्तन्निर्णयाय स्वरसत एव श्रवणे प्रवर्त्तमानतया तस्य प्राप्तत्वात् । मन्तव्य इति चानुवाद श्रवणप्रतिष्ठार्थत्वेन मनन- स्यापि प्राप्तत्वादप्राप्ते शास्त्रमर्थवदिति न्यायात् । ध्यानञ्च तैल धारावदविच्छिन्नस्मृतिसन्तानरूपा ध्रुवा स्मृति स्मृतिप्रतिल- म्भेसर्वग्रन्थीना विप्रमोक्ष इति ध्रुवायाः स्मृतेरेव मोक्षोपायत्व- श्रवणात् । सा च स्मृतिर्दर्शनसमानाकारा ॥ ४५ ॥
६. नकुलीश पाशुपत व शैव दर्शन
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ११७ ) वह ज्ञान ध्यान और उपासनादि रूप है वाक्यमे जायमान आपात प्रतीत वाक्यार्थ ज्ञानरूप नहीं है क्योंकि व्याकरण काव्यकोशादि ज्ञानवान् व्युत्पन्न पुरुषको पदसमू- हरूप वाक्य श्रवणके अनन्तर विधिवाक्यके बिनाभी वाक्यार्थ ज्ञान होनेसे विधान व्यर्थ है । अतः वाक्यार्थज्ञानसे विलक्षण ध्यान ओर उपासनादिरूप ज्ञानही वेदान्तवाक्योंसे विधीयमान है क्योंकि 'आत्मा वाअरे द्रष्टव्य' इत्यादि वाक्य श्रवण मननादि पूर्वक निदिध्यासनका विधान करते हैं 'आत्मेत्येव उपासीत' यह वाक्यभी उपासनाका विधान करता है । विज्ञाय यहापरभी प्रज्ञापदसे उपासनाहीका ग्रहण है अत एव विज्ञाय ओर प्रज्ञा दोनो पद चरितार्थ होते हैं अन्यथा दोनों ज्ञान सामान्य वाची हो तो एकपद व्यर्थ होजायगा “अनुविद्यविजानाति” ध्यान ओर उपासनाही- का बोधक है तात्पर्य यह है वेदान्तवाक्योंमें वेदन ज्ञान उपासना ध्यानादि शब्द सब पर्याय है अत एव “ मनो ब्रह्मेत्युपासीत ” यहा उपासनासे उपक्रम करके “ य एव वेद ” यहा विदसे उपसहार किया है । न स वेद यहा वेदनसे उपक्रम करके “ आत्मेत्येवोपासीत ” इति उपासनासे उपसहार किया है । श्रीशंकरा- चार्यनेभी “ आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ” इस सूत्रके भाष्यमें इन बातोंको स्पष्ट किया है “ आत्मावाअरे द्रष्टव्य ” इत्यादिमें श्रवणका विधान नहीं हो सकता क्योकि “स्वाध्यायोऽध्येतव्य ” इति अध्ययन विधि साङ्ग समस्त वेदोंके अध्ययनका विधान करता है वह केवल शब्द पाठमात्रको नहीं बोध करता किन्तु अर्थज्ञान- पर्यन्तका बोधक है अतः अधीतवेदपुरुष प्रयोजनरूप अर्थके निर्णयके लिये स्वय प्रवृत्त होगा एवञ्च श्रवण स्वतः प्राप्त होनेसे उसका विधान नहीं होसकता । मन- नकाभी विधान नहीं होसकता क्योंकि श्रवणकी प्रतिष्ठाके लिये मनन होता है मन्तव्य यहभी अनुवाद है अत ध्यानमात्रका विधान होता है अप्राप्त अर्थके विधानमे शास्त्र सार्थक होता है तादृश ज्ञान “आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ” इत्यादि सूत्रसे प्रतिपादित विजातीयज्ञानरहित तैलधाराकी समान विच्छेद ( विराम ) शून्य स्मृतिपरम्परा है ध्रुव ( निश्चल ) स्मृति है स्मृति स्थिर होनेसे हृदयके रागादि समस्त ग्रन्थियाका विनाश होता है अत मोक्षका उपाय केवल स्मृति है वह स्मृति प्रत्यक्षकी समानाकार होती है ॥ ४५ ॥ “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे” इत्यनेनैकत्वात् । तथाच आत्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यानेनास्यादर्शनरूपता विधीयते । भवति च भावनाप्रकर्षात् स्मृतेर्दर्शनरूपत्वम् । वाक्यकारेणै- तत् सर्वं प्रपञ्चितं वेदनमुपासनं स्यात् इत्यादिना । तदेव ध्यानं
( ११८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- विशिनष्टि श्रुति -'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृ- णुते तनूं स्वाम्” इति । प्रियतम एव हि वरणीयो भवति यथायं प्रियतममात्मानं प्राप्नोति तथा स्वयमेव भगवान् प्रियतम इति भगवतैवाभिहितम् “तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥” इति । 'पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया' इति च ॥ ४६ ॥ (भिद्यते इति) परावर परमात्माके दर्शन (निरवच्छिन्न) स्मृतिसे हृदय मनके ग्रन्थि (रागादि) नष्ट होते हैं अथवा हृदयप्रदेशमें विद्यमान जीवकी प्रकृति सम्बन्ध रूप ग्रन्थिए नष्ट होती हैं और समस्त देहात्माभिमानादि अविद्यारूप संशय नष्ट होता है पुण्यपापरूप मोक्षविरोधी समस्त कर्म क्षीण होते हैं । इस श्रुतिके साथ एकवाक्यता होनेसे पूर्वोक्त ज्ञान वेदनादि सब प्रत्यक्षतापन्न स्मृतिपरक है । श्रीबोधायन महर्षिनेभी वेदनको उपासना कहा है “आत्मावाअरेद्रष्टव्य” यह वाक्यभी स्मृतिको दर्शनरूप प्रतिपादन करता है निरतिशय भावना वश स्मृतिभी प्रत्यक्ष समानाकार होती है । तादृश स्मृतिका विशेषण कहते हैं ( नायमा त्मेति ) प्रवचनशब्दकी मनन अर्थमें लक्षणा है क्योंकि प्रवचनका फलभी मनन है मेधाशब्दका अर्थ निदिध्यासन है तथाच केवल श्रवण मनन और निदिध्यासन मोक्षके लिये उपाय नहीं है इसका तात्पर्य यह नहीं कि श्रवणादिक उपायही नहीं किन्तु जैसे “न पृथिव्यामग्निश्चेतव्य” यहाँपर हिरण्यरहित पृथिवीका निषेध करता है तैसेही केवल श्रवणादिका निषेध करता है ( यमेवेति ) वह आत्मा जिसको स्वीकार करता है उन्हींको प्राप्त होता है जो अत्यन्त प्रिय हो वही स्वीकार योग्य होता है जिसको आत्मा ( ईश्वर ) निरतिशय प्रिय हो वही ईश्वरकाभी प्रिय होता है जिस प्रकार जीव प्रियतम ईश्वरको प्राप्त होता है उसको गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है । ( तेषामिति ) जो निरन्तर योगको कथन करनेवाले अनन्य भक्त हैं उनको मैं उस शुद्ध ज्ञानको प्रीतिपूर्वक देता हूं जिस ज्ञानसे वह मुझको प्राप्त होते हैं (पुरुष स परोति) परम पुरुष परमात्मा अनन्य भक्तिसे प्राप्त होते हैं ॥ ४६ ॥ भक्तिस्तु निरतिशयानन्दप्रियानन्यप्रयोजनसकलेतरवैतृष्ण्यव- ज्ज्ञानविशेष एव । तत्सिद्धिश्च विवेकादिभ्यो भवतीति वाक्य-