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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

कारेणोक्तं 'तल्लब्धिर्विवेकविमोकाभ्यासक्रियाकल्याणानवसादा- नुद्धर्षेभ्यः सम्भवान्निर्वचनाच्च' इति । तत्र विवेको नामादुष्टान्नात् सत्त्वशुद्धिः, अत्र निर्वचनम्-आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति" इति । विमोकः कामानभिष्वङ्ग शान्त उपासी- तेति निर्वचनम् । पुनः पुनः संशीलनमभ्यासः । निर्वचनञ्च स्मार्त्तमुदाहृतं भाष्यकारेण-'सदा तद्भावभावितः' इति । श्रौत- स्मार्त्तकर्मानुष्ठानं शक्तितः क्रिया क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठ इति निर्वचनम् । सत्यार्जवदयादानादीनि कल्याणानि सत्येन लभ्य इत्यादि निर्वचनम् दैन्यविपर्ययोऽनवसाद नायमात्मा बलहीनेन लभ्यत इति निर्वचनम् । तद्विपर्ययजा तुष्टिरनुद्धर्षः शान्तो दान्त इति निर्वचनम् । तदेवमेवंविध नियमविशेषसमा- सादितपुरुषोत्तमप्रसादविध्वस्ततमःस्वान्तस्य अनन्यप्रयोजनान- वरतनिरतिशयप्रियवदात्मप्रत्ययावभासतापन्नध्यानरूपया भ- क्त्या पुरुषोत्तमपदं लभ्यत इति सिद्धम् ॥ ४७ ॥ (भक्तिस्तु इति) निरतिशय आनन्द प्रिय और अनन्यप्रयोजन तथा इतर समस्त विषयोंसे वैराग्यरूप ज्ञानविशेषा भक्ति है तादृश ध्रुवानुस्मृतिरूप भक्तिकी सिद्धि विवेकादिसे होती है विवेक, विमोक, अभ्यास, क्रिया, कल्याण, अनवसाद, अनुद्धर्ष, यही विवेकादिक हैं जातिदुष्ट कलञ्जादि और आश्रयदुष्ट गणिकान्नादिमें ओर उच्छिष्ट या केशादिनिमित्तदुष्ट इन तीनों प्रकारके अन्नोंको छोडकर शुद्ध अन्नसे शरीरकी शुद्धिको विवेक कहते हैं क्योंकि आहारशुद्धिसे चित्तकी शुद्धि होती है ओर चित्तकी शुद्धिसे ध्रुव स्मृति होती है । कामादिमें आसक्तिके त्यागको विमोक कहते हैं क्योंकि शान्त अर्थात् रागद्वेषरहित होकर उपासना करें ऐसी श्रुति कहती है बारबार परिशीलनका नाम अभ्यास है । सदा परमात्मानुसन्धान करें इस प्रकार स्मृति कहती हे शक्तिके अनुसार पञ्चमहायज्ञादिका अनुष्ठान क्रिया है क्योंकि जो क्रियावान् है वह ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हे ऐसे श्रुति कहती है सत्य आर्जव दया ओर दानका नाम कल्याण हे सत्यसे ब्रह्मप्राप्ति होती है ऐसी श्रुति हे चित्तके अदेन्यको अनवसाद कहते हैं (नायमात्मेत्यादि) श्रुति इसका निर्वचन है चित्तके जो दैन्य है

( १२० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- उससे जायमान तेज हे उससे विपरीत तद्विपर्ययज सन्तोषको उद्धर्ष कहते हैं इससे विपरीत अनुद्धर्ष हे अत्यन्त सन्तोषभी विरोधी होता हे शान्तोदान्त इत्यादि श्रुति हे एतादृश नियमविशेषोंसे आराधित परमात्माके प्रसादसे जिनके चित्तके रागादिक नष्ट हो गये हो उनको निरतिशय प्रिय ओर प्रयोजनान्तर शून्य प्रत्यक्ष तापन्न भक्तिद्वारा परम पुरुष परमात्मा प्राप्त होते हैं ॥ ४७ ॥ तदुक्तं यामुनेन-“उभयपरिकर्मितस्वान्तस्यैकान्तिकात्यन्तिकभ- क्तियोगलभ्यः” इति।ज्ञानकर्मयोगसंस्कृतान्त करणस्येत्यर्थ ॥४८॥ श्रीयामुनाचार्यजीने कहा हे-ज्ञानयोग तथा कर्मयोगसे परिशुद्धान्त.करण पुरुषको अनन्य और निरतिशय भक्तिसे परमात्मा प्राप्त होते हैं ॥ ४८ ॥ किं पुनस्तद्ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्यपेक्षायां लक्षणमुक्तं 'जन्माद्यस्य यतः'इति' जन्मादीति सृष्टिस्थितिप्रलयं तद्गुणसंविज्ञानो बहु- व्रीहि अस्याचिन्त्यविचित्ररचनारच्यस्य नियतदेशकालभोग- ब्रह्मादिस्तम्बपर्य्यन्तक्षेत्रज्ञमिश्रस्य जगत यतो यस्मात् सर्व्वे- श्वरात् निखिलहेयप्रत्यनीकस्वरूपात् सत्यसङ्कल्पाद्यनवधिका- तिशयासंख्येयकल्याणगुणात् सर्व्वज्ञात् सर्व्वशक्त पुंस सृष्टिस्थि- तिप्रलया प्रवर्त्तन्त इति सूत्रार्थ ॥ ४९ ॥ ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिये ऐसा कहा है वह ब्रह्म किंरूप हे इस आशङ्कासे ब्रह्मस्व- रूप कहते हैं ( जन्माद्यस्येति ) जन्म है आदि जिसमें ऐसे तद्गुणसविज्ञान बहुव्रीहि- समाससे जन्म, स्थिति, लय गृहीत होते हैं अभिप्राय यह है कि बहुव्रीहि दो प्रकार है एक तद्गुणसंविज्ञान दूसरा अतद्गुणसविज्ञान । प्रथममें विग्रहवाक्यगत पदके अर्थ सहित अन्य पदार्थका ग्रहण होता है यथा लम्बकर्णको लाओ दूसरेमें विग्रह वाक्य- गत पदार्थका ग्रहण नही यथा समुद्रको जिसने देखा हो उसको लाओ। तद्वत् यहापर भी जन्मसहित अन्यपदार्थका ग्रहण होता है तथा च विचित्र रचनासे रचित देश, काल, भोगसे नियत ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्य्यन्त क्षेत्रज्ञयुक्त जिस सकल हेयगु- णरहित कल्याणगुणयुक्त सर्व्वेश्वर सर्व्वज्ञ सर्व्वशक्तिमान् पुरुषसे जगत्की सृष्टि स्थिति और प्रलय हो वही ब्रह्म है । यह सूत्रार्थ है ॥ ४९ ॥ इत्थम्भूते ब्रह्मणि किं प्रमाणमिति जिज्ञासायां शास्त्रमेव प्रमा- णमित्युक्तं 'शास्त्रयोनित्वात् इति' । शास्त्रं योनि कारणं प्रमाणं

[Header] दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १२१ )

यस्य तच्छास्त्रयोनि तस्य भावस्तत्त्वं तस्माद् ब्रह्मज्ञानकारणा- त्मज्ञानकारणत्वात् शास्त्रस्य तद्योनित्वं ब्रह्मण इत्यर्थः । न च ब्रह्मणःप्रमाणान्तरगम्यत्वं शङ्कितुं शक्यमतीन्द्रियत्वेन प्रत्यक्ष- स्य तत्र प्रवृत्त्यनुपपत्ते नापि महार्णवादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत् इत्यनुमानस्य पूतिकूष्माण्डायमानत्वात् । तल्लक्षणं ब्रह्म, यतो वा इमानि भूतानीत्यादिवाक्यं प्रतिपादयतीति स्थितम् ॥ ५० ॥ एतादृश ब्रह्ममें प्रमाण क्या है ? ऐसी आशङ्का करके शास्त्रैक प्रमाण कहते हैं । ' शास्त्रही योनि ( कारण ) अर्थात् प्रमाण हो जिसमें वह शास्त्र योनि है ब्रह्मज्ञानका आत्मज्ञान कारण होनेसे ब्रह्मभी शास्त्र योनि हुआ वस्तुतः शास्त्रैक प्रमाण ब्रह्म है मनु आदि धर्मशास्त्रकारोंने प्रत्यक्ष अनुमान आगम ( शास्त्र ) तीन प्रमाण माने हैं ब्रह्ममे केवल शास्त्रही प्रमाण क्यों है? ऐसी शंकाका खण्डन करते हैं ब्रह्म अतीन्द्रिय होनेसे प्रत्यक्षका विषय नही, पृथिवी समुद्रादि कार्य होनेसे सकर्तृक है । अत जो कर्त्ता हो वह ब्रह्म है इत्यादि अनुमान भी सडी हुई कूष्मांडकी समान है । तात्पर्य- लोकमें जितने गृहमन्दिरादि महान् कार्य हैं उन सबको अनेक पुरुष मिलके करते हैं जब मही महार्णवादि कार्यभी अनेक पुरुष मिलके कृत सिद्ध होगा तो अभिमत ब्रह्मसिद्ध नही होगी 'यतोवा' इत्यादिश्रुतिसे एंव द्वितीय सूत्रसे ब्रह्मका लक्षण ओर तृतीय सूत्रसे ब्रह्ममें प्रमाण प्रतिपादन किया ॥ ५० ॥ यद्यपि ब्रह्म प्रमाणान्तरगोचरतां नावतरति तथापि प्रवृत्तिनि- वृत्तिपरत्वाभावासिद्धरूपं ब्रह्म न शास्त्रं प्रतिपादयितुं प्रभवतीति एतत्पर्यनुयोगपरिहारायोक्तं 'ततु समन्वयात्' डति । तुशब्दः प्रसक्ताशङ्काव्यावृत्त्यर्थः । तच्छास्त्रप्रमाणकत्वं ब्रह्मण सम्भ- वत्येवे कुत समन्वयात् परमपुरुषार्थभूतस्यैव ब्रह्मणोऽभिधेय- तयान्वयादित्यर्थः । न च प्रवृत्तिनिवृत्त्योरन्यतरविरहिणः प्रयो- जनशून्यत्वं स्वरूपपरेष्वपि पुत्रस्ते जातः नायं सर्प इत्यादिषु हर्षभयनिवृत्तिरूपप्रयोजनत्वं दृष्टमेवेति न किञ्चिदनुपपन्नम् ।

( १२२ ) सर्वदर्शनसंग्रह । / [ पूर्णप्रज्ञ- दिङ्मात्रमत्र प्रदर्शितं विस्तरस्तनाकरादेवानगन्तव्य इति विस्तरभीरुणोदास्यत इति सर्वमनाकुलम् ॥ ५१ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे रामानुजदर्शनं समाप्तम् ॥ ४ ॥ शंका-जैसे प्रत्यक्ष और अनुमानका विषय ब्रह्म नहीं वैसेही शास्त्रकाभी विषय नहीं हो सकता क्योंकि मीमांसक कहते हैं "आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमत- दर्थानाम् " विधिप्रत्यययुक्त क्रियापरक जो वेदवाक्य है वही प्रमाण है इससे विपरीत अनर्थक है अतः प्रवृत्ति निवृत्ति अन्यतर बोधकसे रहितवाक्य सिद्ध ब्रह्म- को शास्त्रप्रतिपादन नहीं कर सकता, ऐसी शंकाके परिहारार्थ चतुर्थ सूत्रका अवतार कहते हैं 'तुशब्द' प्रकृत शंकारनिरासक है ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक हो सकता है कारण परम पुरुषार्थ बोधनद्वारा ब्रह्म बोधक होनेसे वाचकतासम्बन्धसे अन्वित है यदि कहो प्रवृत्ति और निवृत्ति बोधनशून्य वाक्य निष्प्रयोजन होनेसे अनर्थक होगा यह नहीं 'तुम्हारे पुत्र हुआ यह सर्प नहीं है' इत्यादि सिद्धवस्तुबोधक वाक्यसे भी हर्ष तथा भयनिवृत्तिरूप प्रयोजन देख पड़ता है अतः सिद्धवस्तुबोधनमें कोई अनुपपत्ति नहीं है यह केवल दिक्दर्शन मैने किया अधिक जिज्ञासु श्रीभाष्यादि प्रबन्धसे जानलें ॥ ५१ ॥ सर्वदर्शनसंग्रहम श्रीरामानुज दर्शन समाप्त । अथ पूर्णप्रज्ञदर्शनम् ॥ ५ ॥ तदेतद्रामानुजमतं जीवाणुत्वदासत्ववेदापौरुषेयत्वसिद्धार्थबो- धकत्वस्वतःप्रमाणत्वप्रमाणत्रित्वपाञ्चरात्रोपजीव्यत्वप्रपञ्चभेद- सत्यतादिसाम्येऽपि परस्परविरुद्धभेदादिपक्षत्रयकक्षीकारेण क्षपणकपक्षनिक्षिप्तमित्युपेक्षमाणः स आत्मा तत्त्वमसीत्यादिवे- दान्तवाक्यजातस्य भङ्ग्यन्तरेणार्थान्तरपरत्वमुपपाद्य ब्रह्ममी- मांसाविवरणव्याजेनानन्दतीर्थः प्रस्थानान्तरमास्थितः। तन्मते हि द्विविधंतत्त्वं स्वतन्त्रास्वतन्त्रभेदात् । तदुक्तं तत्त्वविवेके । "स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्त्वमिष्यते । स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुर्निर्दोषोऽशेषसद्गुणः ॥" इति ॥ १ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । , ( १२३ )

पूर्णप्रज्ञ ( मध्व ) सिद्धान्त ।

यद्यपि रामानुजीय मतमें कहे हुए जीवका अणुपरिमाणत्व वेदापौरुषेयत्व उपनि- दको सिद्ध ब्रह्म बोधकत्व प्रमाणका स्वतः प्रामाण्य "प्रत्यक्षमनुमानञ्च शास्त्र च त्रिवि- धागमम् " इत्यादि स्मृतिबलसे प्रत्यक्षादि प्रमाणत्रयत्व "पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् " इत्युक्त प्रकार पंचरात्रागमका प्राधान्यादि और प्रपंचसत्यत्वादि सिद्धान्त सम्मत है तथापि भेदश्रुति अभेदश्रुति घटकश्रुतिरूप त्रिविध श्रुति प्रतिपादित होनेपरभी शरीर शरीरीभावमे भेद अभेद और विशिष्टत्वादि पक्षत्रय मानना पूर्वोक्त जैनसिद्धान्तके समान है। अतः तत्त्वमस्यादिवेदान्तवाक्योंका प्रकारान्तरसे व्याख्यानके लिये ब्रह्मसूत्रविवरणव्याजसे प्रस्थानान्तर करते है ॥ माध्वमतमे संक्षेपतः स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र रूप दो तत्त्व हैं समस्तकल्याणगुणाकर हेयगुणरहित भगवान् विष्णु स्वतन्त्र तत्त्व है ॥ १ ॥ ननु सजातीयविजातीयस्वगतनानात्वशून्यं ब्रह्म तत्त्वमि- तिप्रतिपादकेषु वेदान्तेषु जागरूकेषु कथमशेषसद्गुणत्वं तस्य कथ्यत इति चेन्मैवम्, भेदप्रमापकबहुप्रमाणविरोधेन तेषां तत्र प्रामाण्यानुपपत्तेः । तथाहि प्रत्यक्षं तावदिदमस्माद्भिन्नमिति नीलपीतादेर्भेदध्यक्षयति ॥ २ ॥ प्रत्यक्ष श्रुतिविरुद्ध होनेसे उक्त विभागके असंगतत्वकी आशंका करते है(ननुज्ञेति) "सदेवसोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् " इस श्रुतिमें सत् पदसे असत्रूपकी व्या- वृत्ति है एवपदसे विजातीय अचेतन व्यावृत्ति और एकपदसे सजातीय जीवादि व्यावृत्ति है अद्वितीयपदसे स्वगत भेदकी व्यावृत्ति होती है। एवंच समस्त भेदशून्य निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्मस्वरूप बोधक वेदान्तके रहते विविध भेद सत्यत्व मानना सर्वथा अप्रामाणिक है। परिहार करते है ( मैवमित्यादि)"पृथगात्मानं प्रेरितारञ्च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति " " नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विद- धाति कामान् " इत्यादि भेदप्रतिपादक अनेक श्रुतियोंके विरोध होनेसे सदेवेत्यादि श्रुतियोको वास्तवमें अभेदबोधकत्व नही हो सकता पूर्वापरवाक्यको बिना विचारे


१ तात्पर्य यह हे " यस्यात्मा शरीरम् " इत्यादि अन्तर्यामी ब्राह्मणसे शरीर शरीरिभाव सिद्ध है शरीर शरीरीका भेदाभेदभी लोकव्यवहारसिद्ध है अत उस मतमें तीनों प्रकारकी श्रुतियों की संगति होती है । केवल भेदवादीके मतमें अभेद श्रुति एव केवल अभेदवादीके मतमें भेद श्रुति तथा दोनोंके मतमें घटक श्रुति सर्वथा बाधितार्थ रहेगी यही विशेष है।

( १२४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- आपातत अभेदार्थ वर्णन करते हैं । उसीको उपपादन करते हैं ( तथाहीति ) नील पीतादिमे परस्पर भेद प्रत्यक्ष सिद्ध हे । प्रत्यक्षसिद्ध वस्तुका अपलाप प्रमाणान्तरसे नहीं कर सकता अन्यथा अग्निमें प्रत्यक्ष सिद्ध उष्णत्वादिका अनुमानादिसे बाध होने लगेगा ॥ २ ॥ अथ मन्येथाः किं प्रत्यक्षं भेदमेवावगाहते किं वा धर्मिप्रतियो- गिघटितम् । न प्रथमं, धर्मिप्रतियोगिप्रतिपत्तिमन्तरेण तत्सा- पेक्षस्य भेदस्याशक्याध्यवसायत्वात् । द्वितीयोऽपि धर्मिप्रति- योगिग्रहणपुरस्सरं भेदग्रहणमथवा युगपत् तत्सर्वग्रहणम् । न पूर्वं बुद्धेर्विरम्य व्यापाराभावात् अन्योन्याश्रयप्रसङ्गाच्च । नापि चरमं कार्य्यकारणबुद्ध्यौर्यौगपद्याभावात् । धर्मिप्रतीतिर्हि भेदप्रत्ययस्य कारणं सन्निहितेऽपि धर्मिणि व्यवहितप्रतियोगि- ज्ञानमन्तरेण भेदस्याज्ञातत्वेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्य्यकार- णभावावगमात् ॥ तस्मान्न भेदप्रत्यक्षं सुप्रसरम् ॥ ३ ॥ भेदके प्रत्यक्ष होनेसे अभेद श्रुतिको अर्थान्तर परत्व जो कहा सो तभी होसकता है जब प्रत्यक्षसे भेदका ग्रहण होता हो परन्तु प्रत्यक्षसे भेदका ग्रहणही असम्भव हे क्योंकि प्रत्यक्ष केवल भेदको ग्रहण करता है, या धर्मी प्रतियोगीसहित भेदको ग्रहण करता हे ? जिसमें भेद लाना हो वह धर्मी है जिसका भेद कहना हो वह प्रतियोगी है। यथा 'घटो न पट' यहापर घटका भेद पटमें कहना है तो पट धर्मी और घट प्रतियोगी है घट प्रतियोगिक भेदविशिष्ट पट ऐसा वाक्यार्थ है । ( न प्रथम इति ) किसी वस्तुमें अन्यवस्तुका भेद कहा जाता है भेद अन्योन्याभाव हे अभावज्ञानमें प्रतियोगीज्ञान कारण है तथाच धर्मी ज्ञान और प्रतियोगी ज्ञानके विना भेदज्ञान नही होसकता । द्वितीय पक्षकोभी विकल्प करके दूषित करते हैं ( द्वितीयोपीति ) प्रत्यक्ष धर्मी और प्रतियोगीको ग्रहण करके भेदको ग्रहण करता है, या एकही कालमें तीनोको ग्रहण करेगा ? चक्षुरादिके संयोगानन्तर भेद या प्रतियोगी एकको ग्रहण करके बुद्धिके व्यापारकी निवृत्ति होनेपर व्यापारान्तर न होनेसे दूसरेको नही ग्रहण कर सकते बुद्धिकाठैर ठैर कर व्यापार नहीं होता है। भेदके ग्रहणमे धर्मी और प्रतियोगीका ग्रहण होगा धर्मी और प्रतियोगीके ग्रहणमे भेदका ग्रहण होगा इस प्रकार अन्योन्याश्रयभी है अत प्रथमकिक्लप नही हो सकता। कार्य कारण दोनो ज्ञान एक कालमें बाधित

दर्शनम् ] भाषार्टीकासमेत । ( १२५ ) होनेसे द्वितीय पक्षभी नहीं होसकता । धर्मीज्ञान और प्रतियोगीज्ञान दोनों भेद- ज्ञानके कारण हैं क्योंकि पटादि धर्मी समीप दृष्ट होनेपरभी दूरवर्ती प्रतियोगीके ज्ञानके विना भेदज्ञान नहीं होता है अतः अन्वय व्यतिरेकसे दोनोंमें परस्पर कार्य कारणभाव निश्चित होता है । इस कारण भेद प्रत्यक्ष किसी प्रकारमे नहीं हो सकता ॥ ३ ॥ इतिचेत् किं वस्तुस्वरूपभेदवादिनं प्रति इमानि दूषणान्यु- दुष्यन्ते किं धर्मिभेदवादिनं प्रति। प्रथमे चोरापराधान्माण्डव्य- निग्रह न्यायापात भवदभिधीयमानदूषणानां तद्विषयत्वात् ॥४॥ खण्डन-क्या स्वरूप भेदवादीके प्रति यह दोष देते हो, किंवा धर्मी भेदवादीके मत- में ? यदि स्वरूप भेदवादीके मतमें कहो तो सर्वथा विपरीत है ( चोरापराधेनेति ) यह क्या महाभारतकी है एक समय कोई चोरके भ्रमसे माण्डव्य ऋषिको पकड कर राजाके पास ले गये राजाने शूलीकी सजा दी शूलीमें चढनेके अनन्तर यम- लोकमें जाकर धर्मराजसे पूछा मैंने क्या अपराध किया जिससे मुझको शूलीपर चढना पडा धर्मराजने कहा आप बाल्यावस्थामें छोटे छोटे कीडोंको पकडकर कण्ट- कसे छेदा करते थे उस पापके फलसे आज आपको शूलीपर चढना पडा । इस बातको सुनकर माण्डव्य ऋषिने रुष्ट होकर धर्मराजको शाप दिया मैने अज्ञानसे बाल्यावस्थामें ऐसा कर्म किया था अज्ञानमें किये कर्मका पाप नही होता परन्तु तुमने इतना कडा दण्ड दिया इसलिये मर्त्यलोकमे शूद्रयोनिमे जन्म लोगे वही विदुर हुए उस दिनस बालकको कोई प्रकार पाप नही लगता पूर्वोक्त दूषण एकभी स्वरूप भेदके विषयमें नहीं लगता हे ॥ ४ ॥ ननु वस्तुस्वरूपस्यैव भेदत्वे प्रतियोगिसापेक्षत्वं न घटते घट- वत् प्रतियोगिसापेक्ष एव सर्वत्रभेद प्रथत इति चेन्न, प्रथमं सर्वतोविलक्षणतया वस्तुस्वरूपे ज्ञायमाने प्रतियोग्यपेक्षया विशिष्टव्यवहारोपपत्ते । तथाहि परिमाणघटितं वस्तुस्वरूपं प्रथममवगम्यते पश्चात् प्रतियोगिविशेषापेक्षया ह्रस्वं दीर्घमिति तदेव विशिष्य व्यवहारभाजनं भवति ॥ ५ ॥ शंका-यदि वस्तुके स्वरूपको ही भेद कहो तो प्रतियोगीके ग्रहणद्वारा ही भेदका ग्रहण होता है इस प्रकार भेदका प्रतियोगिसापेक्षत्व नियम है सो नहीं रहेगा यथा घट

( १२६ ) मार्त्तण्डप्रप्रद । पूर्वपक्ष- स्वरूपग्रहणम् प्रतियोगीकी अपेक्षा नही होती है । उत्तर ( इति चेन्नेति ) रूप भेद प्रथम घटादिवस्तु पटादिसे रूपभेद विलक्षण आकार गृहीत होता है अनन्तर पटभेवान् घट इत्यादि विशिष्ट व्यवहारके लिये प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है जिस प्रकार परी- माणगुणविशिष्ट वस्तुस्वरूपका ज्ञान प्रथम होता है पश्चात् किसी प्रतियोगी विशेषके प्रति ह्रस्वत्व दीर्घत्वादिरा ग्रहण होता है यहा प्रतियोगीकी अपेक्षा उत्तरकालमें होती ६ ॥ ५ ॥ तदुक्तं विष्णुत्तत्वनिर्णये-न च विशेषणविशेष्यतया भेदसिद्धि । विशेषणविशेष्यभावश्च भेदापेक्षधर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेद- सिद्धि भेदापेक्षश्च धर्मिप्रतियोगितामित्यन्योन्याश्रयतया भेद- स्यायमुक्ति , पदार्थस्वरूपत्वाद्भेदस्येत्यादिना । अतएव गवा- र्थिनो गवयदर्शनान्न प्रवर्त्तन्ते गोशब्दञ्च न स्मरन्ति ॥ ६ ॥ उक्त अर्थमें प्रमाण देते है ( तदुक्तमिति ) विशेष्य विशेषणभावसे भेद नहीं सिद्ध हो सकता कारण विशेषणविशेषणभावम भेदके लिये अपेक्षित धर्मी और प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है एव धर्मी ओर प्रतियोगीको भेदकी अपेक्षा होती है इसी प्रकारसे अन्योन्याश्रय होता हे अतः भेदसिद्धिमें युक्ति नही हे ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि भेदवस्तुका स्वरूपही हे भेद ओर वस्तुस्वरूप एक होनेपरभी घटादि शब्द कहनेपर प्रतियोगीकी अपेक्षा नहीं होती है भेद कहनेपर प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है यह शब्द शक्ति स्वभाव है । भेदवस्तु स्वरूप होनेहीसे गवार्थी गवयजन्तुको देखकर न गोको लानेके लिये प्रवृत्त होता हे न अयगो. ऐसा स्मरणही करता हे ॥ ६॥ नच नीरक्षीरादौ स्वरूपे गृह्यमाणे भेदप्रतिभासोऽपि स्यादिति भण- नीयम्, समानाभिहारादिप्रतिबन्धकबलाद्भेदभानव्यवहाराभावोप- पत्ते.। तदुक्तम्-"अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनव- स्थानात् । सौक्ष्म्याद् व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च" इति । अतिदूरात् गिरिशिखरवर्त्तितर्त्वादौ अतिसामीप्याल्लोचना- ज्ञनादौ इन्द्रियघाताद्विद्युदादौ मनोऽनवस्थानात् कामाद्युप- प्लुतमनस्कस्य स्फीतालोकवर्त्तिनि घटादौ सौक्ष्म्यात् परमा- ण्वादौ व्यवधानात् कुड्याद्यन्तर्हिते अभिभवात् दिवा प्रदीपप्र- भादौ समानाभिहारात् नीरक्षीरादौ यथावद् ग्रहणं नास्तीत्यर्थ ॥७॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १२७ ) यदि कहो भेद वस्तुका स्वरूप है तो जलमिश्रित दूधमें परस्पर जल और दूधका भेदग्रहण होने लगेगा सोभी नहीं समान वस्तन्तरसे अभिभूत होनेसे परस्पर भेद- ग्रहण नही होता है । अत एव सांख्यतत्त्वकौमुदीमें कहा है ( अतिदूरादित्यादि ) अक्षरार्थ अत्यन्तदूर अत्यन्त समीप, इन्द्रियनाश, अत्यन्तसूक्ष्म, व्यवधान, प्रबल वस्तुसे पराभव होनेसे तथा सजातीयवस्तुमें मिल जानेसे उस वस्तुका ग्रहण नहीं होता है उसीको प्रत्येकके उदाहरणपूर्वक दिखाते हैं । अत्यन्त दूर होनेसे पर्वत शिखरवर्ति वृक्षादिका ग्रहण नहीं होता है अति समीप होनेसे नेत्रोंमें लगे हुए अञ्जनका ग्रहण नहीं होता है इन्द्रिय नष्ट होनेसे बिजली आदिका कामक्रोधादि वश विषयान्तरमें आसक्त चित्तको स्फुरत्प्रकाशमें वर्तमानघटका अतिसूक्ष्म होनेसे परमाणुका व्यवधान होनेसे घरके भीतरकी वस्तुका तथा अपनेसे अधिक तेजस्वीसे परिभूत होनेसे दिनमें दीपककी प्रभाका और सजातीय वस्तुमें सम्मिलित होनेसे जलमिश्रित दूधमे जल और दूधके यथार्थ स्वरूपका ग्रहण नहीं होता है ॥ ७ ॥ भवतु वा धर्मभेदवादस्तथापि न कश्चिद्दोषः धर्मिप्रतियो- गिग्रहणे धर्मभेदमानसम्भवात् । न च धर्मभेदवादे तस्य तस्य भेदस्य भेदान्तरभेद्यत्वेनानवस्था दुरवस्था स्यादित्या- स्थेयं भेदान्तरप्रसक्तौ मूलाभावात् भेदभेदिनौ भिन्नाविति व्यव- हारादर्शनात् ॥ ८ ॥ धर्मभेदपक्षमेंभी पूर्वोक्त आक्षेपका समाधान-(भवतु वेत्यादि) 'घटो न पट' यहा पर धर्मी भेदाश्रय पट और प्रतियोगी घटका ग्रहण होनेपर भेदका मानसग्रहण अवश्य होगा ( नचेति ) धर्म भेदपक्षमें भेदरूप धर्म स्वरूपसे भिन्न है तो उसमेंभी पुनः भेद मानना होगा उसमें भेदान्तर एव क्रमसे भेदपर भेद होजायगा अन्यथा प्रथम भेदभी व्यर्थ होगा तथाच अनवस्था दुष्परिहर होगी । उत्तर-( भेदान्तरेति ) घट पटका परस्पर भेदव्यवहार सिद्ध होनेसे धर्मरूपभेद व्यवहारमूलक है परन्तु भेदके ऊपर भेदान्तर माननेमे कोई युक्ति नहीं घट पट परस्पर भिन्न हे इस प्रकार भेद और भेदी परस्पर भिन्न हैं ऐसा व्यवहार नहीं होता है ॥ ८ ॥ न चैकभेदबलेनान्यभेदानुमानं दृष्टान्तभेदाविघातेनोत्थान- दोषाभावात् । सोऽयं पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारिकातै- लदातृत्वाभ्युपगम इव । दृष्टान्तभेदाविमर्द्दे त्वानुत्थानमेव । न

( १२८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पूर्णप्रज्ञ-

हि वरविघाताय कन्योद्वाह । तस्मान्मूलक्षयाभावानदनवस्था न दोषाय ॥ ९ ॥ यदि कहो 'घट पटाद्भिन्न कपालसमवेतत्वात्' इस प्रकार भेदकाभी पटादिमे भेदानुमान हो जायगा उस भेदकाभी पुनः भेदानुमान होगा यहभी नहीं घटभेदानु मानमें दृष्टान्त होनेपरभी भेदको भेदानुमान दृष्टान्त न होनेसे एतादृश अनुमानका उत्थानही नहीं हो सकता है अत एतादृश अनुमान पिण्याक (खरी) मांगनेवालेको पसेरीभर तेल मिलनेकी समान अतीव अभ्युदय है दृष्टान्तमें भेद न स्वीकार करेंगे तो भी उत्थान न होगा कोईभी वरविनाशके लिये कन्याका विवाह नहीं करताहै ॥९॥ अनुमानेनापि भेदोऽवसीयते । परमेश्वरो जीवाद्भिन्न , तं प्रति सेव्यत्वात् यो यं प्रति सेव्य स तस्माद्भिन्न यथा भृत्याद्राजा । न हि सुख मे स्याद् दुःख मे न मनागपि इति पुरुषार्थमर्थय- माना पुरुषाः स्वपतिपदं कामयमानाः सत्कारभाजो भवेयु प्रत्युत सर्वानर्थभाजन भवन्ति । यः स्वस्यात्मनो हीनत्वं परस्य गुणोत्कर्षञ्च कथयति स स्तुत्यः प्रीतः तावकस्य तस्मा अभीष्टं प्रयच्छति। तदाह-"घातयन्ति हि राजानो राजाहमिति वादिनः । ददत्यखिलमिष्टञ्च स्वगुणोत्कर्षवादिनाम्" इति ॥ १०॥ जीव और ईश्वरका परस्परभेदसाधक अनुमान कहते है-(परमेश्वरेति) 'परमेश्वर' पक्ष है "जीव भेद" साध्य है सेव्यत्व हेतु है जो जिसके सेव्य हो वह उससे भिन्न है यह व्याप्ति है यथा भृत्य ओर राजा (ओरभी) मुझे सुख प्राप्त हो किञ्चिदपि दुःख न हो इस प्रकार सुखरूप पुरुषार्थको चाहनेवाले मनुष्य यदि स्वामीके पदकी कामना करेंगे तो उनका सत्कार क्या होगा ? विपरीत अतीव दुःख (कारागारादि) के पात्र बनेंगे जो स्वामीके सन्निधिमे अपनेको हीनत्वका अनुसन्धान कर स्वामीके गुणकी स्तुति करते हैं उनपर स्वामी प्रसन्न होकर उनका मनोरथ सफल करते हैं नीतिकारोने कहाभी है अपनेको स्वय राजा कहनेवालोको राजालोग शूली आदि दण्डसे दंडित करते हैं ओर राजा अपने गुणके गान करने वालोंको अभिमत वस्तु देते हैं ॥ १० ॥ एवञ्च परमेश्वराभेदतृष्णाया विष्णोर्गुणोत्कर्षस्य मृगतृष्णिका समत्वाभिधानं विपुलकदलीफललिप्सया जिह्वाच्छेदन इवेति

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १२९ ) एतादृशविष्णुविद्वेषणान्धतमसप्रवेशप्रसङ्गात् । तत्तत्प्रति- पादितं मध्यमन्दिरेण महाभारततात्पर्यनिर्णये-“ अनादि- द्वेषिणोदैत्या विष्णोर्द्वेषो विवर्द्धितः । तमस्यन्धे पातयति दैत्यानन्धे विनिश्चयात् ” ॥ इति ॥ ११ ॥ (एवञ्चेति) परमेश्वरके साथ स्वरूपकी ऐक्यरूप मुक्तिकी लालसासे जिन्होंने विष्णुके गुणोत्कर्षको मृगतृष्णाके समान कहा सो कदलीफलकी इच्छासे जिह्वाके काटनेके समान हैं इस प्रकार भगवद्वेषसे घोर नरकमें प्रवेश होता है इस बातको मध्यमन्दिर ( आनन्दतीर्थ ) जी ने प्रतिपादन किया है अनादि कालसे द्वेषस्वभाववाले दैत्योंने विष्णुके विषय द्वेषको बढाया अतः तादृश अज्ञानियोंको घोर नरकमें गिराते हैं ॥ ११ ॥ सा च सेवा अङ्कननामकरणभजनभेदात्त्रिविधा । तत्राङ्कनं नासयणायुधादीनां तद्रूपस्मरणार्थमपेक्षितार्थसिद्धार्थं च । तथाच शाकल्यसंहितापरिशिष्टम्-“चक्रं बिभर्त्ति पुरुषोभि- तप्तं बलंदेवानाममृतस्य विष्णो । स याति नाकं दुरिता विधूय विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ॥ १२ ॥ (सा च सेवेति) तप्तमुद्रा ( शंखचक्र ) धारण, नाम करण और भजन भेदसे तीन प्रकार हैं, शंखचक्ररूप भगवदायुधधारण अभीष्ट सिद्धिके लिये और भगवत्के रूपका सदा स्मरणके लियेभी है उक्त विषयमे श्रुतिप्रमाणभी देते हैं (चक्रं बिभर्तीति)देवानां देवतोंका, बलम् रक्षक, अभितस्य विष्णो'-व्यापक परमात्मा विष्णुका, अभितप्तम् चक्रम् अग्निसे सन्तप्त किये हुए श्रीसुदर्शनचक्रको, वपुषा-बाहुमूलमे, यो बिभर्ति-जो धारण करता है अर्थात् ( अङ्कित करता है ) स -तादृश चक्रधारी पुरुष, दुरिताः पुण्यपापको, विधूय-नष्ट करके, “ तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय ” इत्यादि श्रुति- स्वारस्यसे बन्धहेतुक पुण्य पाप दोनों दुरित पदार्थ हैं । नाकम् परमपदको ( श्रीवै- कुण्ठ ) को, याति-जाता है, यत्-जिस परमपदको वीतरागाः-भगवत्प्राप्तिव्यति- रिक्ताविषयमें इच्छा रहित, यतयः-यतिलोग, विशन्ति-जाते हैं ॥ १२ ॥ देवाश्च येन विधृतेन बाहुना सुदर्शनेन प्रयातास्तमायन् येनाङ्किता मनवो लोकसृष्टिं वितन्वन्ति ब्राह्मणास्तद्वहन्ति ॥

(२६०) सर्वदर्शनसंग्रहः। [पूर्णप्रज्ञ- तद्विष्णोः परमं पदं येन गच्छन्ति लाञ्छिताः। उरुक्रमस्य चिह्नै- रङ्किता लोके सुभगा भवन्ति" इति॥ १३॥ 'अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समासत' इति तैत्तिरीय- कोपनिषद्य् ॥ १४॥ (देवाश्च येनेति) जिस सुदर्शन चक्रसे अङ्कित भुजयुक्त देवगण शरीरत्यागके अनन्तर उस परमात्माको प्राप्त होते हैं। जिससे अङ्कित होनेसे मन्वादि लोकसृष्टिको करते हैं। जिस सुदर्शनसे अंकित अर्थात् तप्तमुद्रा धारण करनेवाले ब्राह्मणलोग परमपदको प्राप्त होते हैं। ऋग्वेदीय मन्त्र (पवित्रमित्यादि) ब्रह्मणः पते ! चतुर्मुख ब्रह्माके स्वामिन् (नियामक) विष्णो, विभु चेष्टानुकूलसङ्कल्पाश्रय आप, विश्वत गात्राणि पर्येषि-स्वा- श्रित समस्त चेतनोंके शरीरमें अन्तर्यामी रूपसे व्याप्त होते । पवित्रं ते विततमिति आपका आत्मिक जन शरीरमें अग्निसन्तापसे जायमान चिह्नद्वारा व्याप्त सुदर्शन हे तादृश सुदर्शनसे जिनका भुजमूल तप्त न हो वह आम अर्थात् अतप्त पाप है मोक्षहे- तुभूत उपासनादिका प्रतिबन्धक पाप नष्ट नहीं है अतः तत् ब्रह्मको "ओम् तत् सत् इति ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः" इति स्मृतिके प्रमाणसे तत् शब्द ब्रह्मका वाचक है। नाश्नुते नहीं प्राप्त होते हैं। ( इत् वहन्त.) यह तप्त सुदर्शनको धारण करनेवाले शृतासः विनष्टपाप हैं अतः तत् समश्नुते ब्रह्मको प्राप्त होते हैं अर्थात् मोक्षके अधिकारी होते हैं। "सुदर्शने च दर्भे च पवित्रं चरणस्रुचके "। "सुदर्शनं सहस्रारं पवित्रं चरणं पवि " इत्यादि वेदनिघण्टु वचनोंसे तथा "पवित्रं चरणं नेमि रथचक्रं सुदर्शनम् " इत्यादि पद्मपुराण वचनात्से पवित्र शब्द सुदर्शनचक्रमें रूढ है (उरुक्रमस्येति) वामनभगवान्के चिह्नोंसे अङ्कित होनेसे लोकमें पुण्यशाली होते हैं॥ १३॥ १४॥ स्थानविशेषश्चाग्नेयपुराणे दर्शितः।"दक्षिणे तु करे विप्रो बिभृ- याच्च सुदर्शनम्। सव्येन शंखं च बिभृयादिति ब्रह्मविदो विदुः ॥" इति । अन्यत्र चक्रधारणे मन्त्रविशेषश्च दर्शितः।"सुदर्शन महा- ज्वाल कोटिसूर्य्यसमप्रभ । अज्ञानान्धस्य मे नित्यं विष्णोर्मार्गं प्रदर्शय ॥ त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे ॥ नमितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते"॥ इति ॥ १५॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( १३१ )

ब्राह्मणादि दाहिनी भुजामें सुदर्शन और बाईं भुजामें शंखको धारण करे ऐसा वेदवेत्ता लोग कहते हैं। चक्रधारणमन्त्र-सुदर्शनेत्यादि । शंखधारण मन्त्र-त्वं पुरेत्यादि ॥ १५ ॥ नामकरणम्-पुत्रादीनां केशवादिनाम्ना व्यवहारः सर्वदा तन्नामा- नुस्मरणार्थम् । भजनं दशविधं वाचा सत्यं हितं प्रियं स्वाध्या- यः कायेन दानं परित्राणं परिरक्षणं मनसा दया स्पृहा श्रद्धा चेति । अत्रैकैकं निष्पाद्य नारायणे समर्पणं भजनम् । तदुक्तम्- "अङ्कनं नामकरणं भजनं दशधा च तत् " इति ॥ १६ ॥ पुत्रादिकोंको केशवादि नाम करना नाम करण है। यह सदा भगवन्नामके स्मरणके लिये है. वचनसे सत्य हितकर और प्रिय बोलना, वेदाध्ययन करना, शरीरसे दानदेना, भयसे मुक्तकरना, रक्षाकरना, मनसे दयाकरना, भगवद्विषयमें श्रद्धा भक्ति करना यह दशविध है इनमेंसे एक एकको सम्पादनकरकर श्रीमन्नारायणके चरणोंमें अर्पण करना भजन है जङ्कनमित्यादि पद्यका पूर्वोक्त अर्थ है ॥ १६ ॥ एवं ज्ञेयत्वादिनापि भेदोऽनुमातव्य , तथा श्रुत्यापि भेदोऽव- गन्तव्य । "सत्यमेतमनुविश्वे मदन्तिराति देवक्य गृणतो मघोनः सत्यासो अस्य महिमागृणे शको यज्ञेषु विप्रराज्ये सत्य आत्मा सत्यो जीव सत्यं भिदा सत्यं भिदा मयि वारुण्यो मयि वारुण्यो मयि वारुण्यः " इति मोक्षानन्दभेदप्रतिपादकश्रुतिभ्यः "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥" ' जगद्व्यापारवर्जप्रकरणादसन्निहित- त्वाच्च' इत्यादिभ्यश्च ॥ १७ ॥ उपास्य उपासक ज्ञेय ज्ञातृभाव होनेसे भी ईश्वर और जीवके अत्यन्त भेदका अनुमान किया जाता है अर्थात् ईश्वर उपास्य और जीव उपासक है एव श्रुतिसे भी यह प्रतिपादित होता है (सत्यमेतमित्यादि) ऋग्वेदका मन्त्र है । इसमें सत्य आत्मा सत्योजीव इत्यादिसे भेद स्पष्टही प्रतिपादित है । भगवद्गीतामे भी पूर्वोक्त क्षेत्र क्षेत्रज्ञ और ईश्वरके स्वरूपका ज्ञानपूर्वक भगवत्की उपासनासे भगवत्के समान धर्म ( स्वरूपका अभेद ) को प्राप्त जीवको पुनः सृष्टिकालमें उत्पत्ति और प्रलय

(१३२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पूर्णप्रज्ञ- कालमें लयाभाव कहा है इद ज्ञानेत्यादिमे । अतएव 'तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जन परम साम्यमुपैति" इत्यादि श्रुति'भोगमात्र साम्यलिङ्गात्' इत्यादि ब्रह्मसूत्र संगत होते है। सूत्रान्तरमे भी मुक्तात्माको जगत् सृष्टि आदि व्यापारको छोडकर ब्रह्मके समस्त गुण कहे है अतो वेत्यादि वाक्यमें सन्निहित ब्रह्म है जीव नही अत प्रकरणवश और सन्निहित न होनेके कारण तदतिरिक्त आनन्दादि गुणही मुक्तात्माका है ॥ १७ ॥ न च 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इति श्रुतिबलाज्जीवस्य पारमै- श्वर्य्यं शक्यशङ्कं 'सम्पूज्य ब्राह्मणं भक्त्या शूद्रोऽपि ब्राह्मणो भवेत्' इतिवत् सहितो भवतीत्यर्थपरत्वात् । ननु “प्रपञ्चो यदि वर्त्तेत निवर्त्तेत न संशय । मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥” इति वचनात् द्वैतस्य कल्पितत्वमवगम्यत इति चेत् ॥ १८ ॥ अद्वैतिकी आशङ्का-नचेत्यादि । ब्रह्मको जाननेवाले ब्रह्मरूप होते है ऐसे श्रुति भगवती कहती है अत जीव और ब्रह्मका अभेद सिद्ध होता है । समाधान- ब्राह्मणोंकी सेवा और शुश्रूषाआदि करनेसे शूद्रभी ब्राह्मण हो जाता है इत्यादि वत् सन्निहित अथवा सादृश्य उसकाभी अर्थ है (ननुइति) यदि प्रपञ्च है तो घटादि वत् अवश्य नष्टभी होगा क्योंकि यह समस्त वस्तु मायासे कल्पित मात्र है वास्तवमे अद्वैतही है ॥ १८ ॥ सत्यं भावमनभिसन्धायभिधानात् । तथाहि यद्ययमुत्पद्येत तर्हि निवर्त्तेत न संशय । तस्मादनादिरेवाय प्रकृष्ट पञ्चविधो भेदप्रपञ्च । न चायमविद्यमानो मायामात्रत्वान्मायोति भगव- दिच्छोच्यते ॥ १९ ॥ यहभी वास्तविक भावका अनुसंधान नही करते है क्योकि यदि घटादिवत् आत्मा उत्पन्न होना हो तो अवश्यही विनष्ट भी होता परन्तु ऐसा उत्पन्न नही होता है निम्नलिखित पाँच प्रकारके भेद अनादि है अत यह प्रपञ्च अविद्यमान नही मायामात्रमित्थम् पदार्थ भी मायाशब्द सदसदनिर्वचनीयत्व नही किन्तु, भगवत्स्वरूपरा वाची माया शब्द है महामाया, अविद्या, नियति, मोहिनी, प्रकृति वासना यह सब भगवद्रूपी इच्छाको कहते है ॥ १९ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १३३ ) 'महामायेत्यविद्येति नियतिर्मोहिनीति च । प्रकृतिर्वासनेत्येव तवेच्छानन्त कथ्यते॥ प्रकृति प्रकृष्टकरणाद्वासना वासयेद्यतः । अ इत्युक्ते हरिस्तस्य मायाऽविद्येति संज्ञिता ॥ मायेत्युक्ता प्रकृष्टत्वात् प्रकृष्टे हि मया भिदा । विष्णोः प्रज्ञप्तिरेवैका शब्दै- रेतैरुदीर्य्यते ॥ प्रज्ञप्तिरूपो हि हरि सा च स्वानन्दलक्षणा ॥ इत्यादिवचननिचयप्रामाण्यबलात् ॥ २० ॥ प्रकृत्यादि संज्ञाके हेतुको कहते हैं प्रकर्षरूपसे अर्थात् असम्भावितकोभी समा- वित करनेसे प्रकृति और वासित करनेसे वासना हे । अशब्द हरिका वाचक है उन्हीं हरिकी माया ( इच्छा ) को अविद्या कहते हैं । अस्य विद्या अविद्या ऐसा विग्रह होता है प्रकृष्ट कार्य करनेसे प्रकृति और माया इत्यादि शब्द विष्णुके ज्ञानविशेषको कहते हैं वह ज्ञानस्वरूप भगवान्‌का आनन्दलक्षण हे ॥ २० ॥ सैव प्रज्ञा मानत्राणकर्त्री च यस्य तन्मायामात्रं ततश्च परमेश्व- रेण ज्ञातत्वाद्रक्षितत्वाच्च न द्वैतं भ्रान्तिकल्पितं, न हीश्वरे सर्वस्य भ्रान्ति सम्भवति विशेषादर्शननिबन्धनत्वाद्भ्रान्तेः । तर्हि तद्व्यपदेश कथमित्यत्रोत्तरम् 'अद्वैतं परमार्थतः' इति पर- मार्थापेक्षया तेन सर्वस्मादुत्तमस्य विष्णुत्तत्तस्य समाभ्यधि- कशून्यत्वमुक्तं भवति ॥ २१ ॥ वही प्रज्ञा मान ओर रक्षा करनेवालीभी हे जिनके मतम द्वेत मायामात्र हे उनके मतमें परमेश्वरसे ज्ञात ओर रक्षित होनेसे द्वेत कदापि कल्पित नहीं होसकता । सर्वज्ञ परमात्मामें भ्रान्ति हो नहीं सकती क्योंकि भ्रान्ति विशेष दर्शन न होनेसे होती ह यथा रज्जुम सर्पका भ्रम केवल दण्डाकारता मात्र देखकर होता हे ईश्वर सर्वज्ञ होनेसे सर्वदा विशेष दर्शन बना रहेगा । यदि ईश्वरमे भ्रम नही हो सकता है तो पुन अद्वैत व्यवहार श्रुतिने केसे किया? इसका उत्तर देते हैं--कि ( परमार्थतः इति ) परमार्थपक्ष लेकर अद्वैत हे अभिप्राय यह है 'न तत्समश्चाभ्यधिकः कुतोऽन्यः' इत्यादि श्रुतियोंसे भगवान् विष्णुके सम ओर अधिक कोईभी न होनेसे अद्वैत ( अद्वितीय ) कहे जाते हैं । अतएव श्रीयामुनाचार्यनेभी कहा हे “यथा चोलनृपः सम्राडद्वितीयोऽत्रभूतले । इति तत्तुल्यनृपतिनिवारणपरं वचः । नतु तत्पुत्रपौत्रादिनि- वारणपरं भवेत् ॥ " इत्यादि ॥ २१ ॥

( १३४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- तथाच परमा श्रुति - "जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा । जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ॥ मिथश्च जडभेदो यं प्रपञ्चो भेदपञ्चकः । सोऽयं सत्योऽप्यनादिश्च सादिश्चेन्नाशमा- प्नुयात् ॥ न च नाशं प्रयात्येप न चासौ भ्रान्तिकल्पित । कल्पितश्चेन्निवर्त्तेत न चासौ विनिवर्त्तते ॥ २२ ॥ भेदपञ्चक-जीवका ईश्वरके साथ भेद १ जड और ईश्वरका भेद २ जीवोंके परस्पर भेद ३ जड और जीवका भेद ४ जडका परस्पर भेद ५ यह पाँच भेदात्मक प्रपञ्च है यह सभी भेद सत्य और अनादि हैं यदि सादि होते तो अवश्य नष्ट होते परन्तु एतादृश भेदका कदापि नाश नहीं होता है एव यह प्रपञ्च भ्रान्तिकल्पि- तभी नहीं क्योंकि कल्पित होता तो अवश्य निवृत्तभी होता परन्तु प्रपञ्चकी निवृत त्तिभी नहीं होती है ॥ २२ ॥ द्वैतं न विद्यत इति तस्मादज्ञानिना मतम् । मतं हि ज्ञानिना- मेतन्मितं त्रातं हि विष्णुना ॥ तस्मान्मात्रमिति प्रोक्तं परमो हरिरेव तु ॥" इत्यादि । तस्माद्विष्णो सर्वोत्कर्ष एव तात्पर्य्यं सर्वागमानाम् ॥ २३ ॥ यह अज्ञानियोंका कहना है कि द्वैतरूप प्रपञ्च हेही नहीं विष्णुसे ज्ञात और रक्षित होनेसे द्वैत सत्य है । यह तत्त्वज्ञानियोंका मत है-अत यह सब मात्र अर्थात् अल्प है सर्वोत्कृष्ट भगवान् विष्णु है । अत विष्णुको सर्वोत्कर्ष बोधनमें सम्पूर्ण आगमका तात्पर्य है ॥ २३ ॥ एतदेवाभिसन्धायाभिहितं भगवता - 'द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षर- श्चाक्षर एव च । क्षर सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ उत्तम- पुरुषस्त्वन्य परमात्मेत्युदाहृत । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्त्यव्यय ईश्वर ॥ यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित पुरुषोत्तम ॥ २४ ॥ जगत्में क्षर और अक्षर भेदसे दो प्रकारके पुरुष प्रसिद्ध हैं । संपूर्ण संसारी चेतन ब्रह्मादि स्तंभपर्यन्त क्षरण स्वभाव प्रकृति सम्बन्ध उपाधिके वश क्षर कहाते हैं प्रकृतिसम्बन्धविनिर्मुक्त मुक्तात्मा अक्षर है । वह अचित् परिणाम ब्रह्मादि देहस

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १३५ ) मान न होनेसे कूटस्थ कहे जाते हैं । क्षर और अक्षर शब्दनिर्दिष्ट बद्ध और मुक्त जीवसे अन्य उत्तम पुरुष है जिसको परमात्मा कहते हैं । जो परमात्मा अचित् और बद्धमुक्तरूप लोकत्रयमे आत्मरूपसे प्रवेश करके भरणकरता है अतः वह अविनाशी और ईश्वर है उक्त स्वभाव होनेसे क्षरपदवाच्य पुरुष और अक्षर शब्दवाच्य मुक्तको भी मैंने अतिक्रमण किया इसीलिये लोक और वेदमें मैं पुरुषोत्तम शब्दसे प्रसिद्ध हूँ ॥ २४ ॥ यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥” इति ॥ २५ ॥ जो मुझे उक्त प्रकारसे पुरुषोत्तम हे भारत ! जानता है यह भगवत् प्राप्तिके सम्पूर्ण उपायोंको जाननेवाला सब प्रकार मेरी भक्ति करता है । हे निष्पाप ! इस प्रकार पर- मपुरुषोत्तमतत्त्व प्रतिपादक अतिगुह्यतम शास्त्र मैंने तुमसे कहा इसको जानकर जीव ज्ञानी और कृतकृत्य होते हैं ॥ २५ ॥ महावराहेऽपि- “मुख्यञ्च सर्ववेदानां तात्पर्य्यं श्रीपतौ परे । उत्कर्षे तु तदन्यत्र तात्पर्य्यं स्यादवान्तरम् ॥” इति ॥ २६ ॥ वाराहपुराणमेंभी कहा है सम्पूर्ण वेदोंका श्रीहरिके परम उत्कर्षबोधनमें मुख्य तात्पर्य है और अन्यत्र गौण तात्पर्य है ॥ २६ ॥ युक्तं च विष्णोः सर्वोत्कर्षे महातात्पर्य्यम् । मोक्षो हि सर्वपुरुषा- र्थोत्तमः धर्मार्थकामास्त्वनित्याः । मोक्ष एव नित्यः । ' तस्मा- न्नित्यं तदर्थाय यतेत मतिमान्नरः' इति भाल्लवेयश्रुते । मोक्षश्च विष्णुप्रसादमन्तरेण न लभ्यते । 'यस्य प्रसादात् परमा यत्स्व- रूपात् संसारान्मुच्यते नावरेसुरा नाराधयन्तोऽसौ परमो विचि- न्त्यो मुमुक्षुभिः कर्मपाशादमुष्मात् ' इति नारायणश्रुते । “तस्मिन् प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं सर्वार्थकामैरलमल्पकारते । समाश्रिताद्ब्रह्मतरोरनन्तान्निःसंशयं मुक्तिफलं प्रयाति ॥” इति विष्णुपुराणोक्तेश्च ॥ २७ ॥ विष्णुके विषयमें सर्वोत्कर्षबोधन युक्तभी है क्योंकि सम्पूर्ण पुरुषार्थोंमें मोक्षही उत्तम पुरुषार्थ है धर्म अर्थ काम अनित्य हैं केवल मोक्षही नित्य है इस मोक्षके-

( १३६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ-

इसलिये बुद्धिमान् पुरुष नित्य यत्न करे ऐसी श्रुति है मोक्ष श्रीविष्णुकी प्रसन्नता बिना नहीं होता है जिनके प्रसादसे परम ( मोक्ष ) होना है अन्य देवताओके आ- राधन करनेवाले मुमुक्षु कर्मबन्धनसे परमपदके चिन्तन करने योग्यभी नहीं होते हैं इत्यादि श्रुति तथा हरि प्रसन्न होनेसे दुर्लभ कुछभी नहीं अर्थ कामकी बात ही क्या है वह अतीव तुच्छ है अनन्त ब्रह्मरूपी वृक्षके आश्रयण करनेसे अवश्य मोक्ष- फलको प्राप्त होते हैं इत्यादि विष्णुपुराणवचनभी हैं ॥ २७ ॥ प्रसादश्च गुणोत्कर्षज्ञानादेव नाभेदज्ञानादित्युक्तम् । न च तत्त्व- मस्यादितादात्म्यव्याकोप श्रुतितात्पर्यापरिज्ञानविजृम्भ- णात् । “आह नित्यपरोक्षं तु तच्छब्दो ह्यविशेषित । त्वंशब्द श्चापरोक्षार्थं तयोरैक्यं कथं भवेत् ॥ आदित्यो यूप इतिवत् सा दृश्यार्था तु सा श्रुति ॥” इति ॥ २८ ॥ प्रसन्नता गुणका उत्कर्षके ज्ञानसे होती है अभेद ज्ञानसे नहीं होती यदि कहो तत्त्वमस्यादि श्रुतिका विरोध होगा यहभी तात्पर्यका अज्ञानमूलक है नित्य ओर परोक्ष वस्तुको तत् शब्द बोधन करता है त्वंपद प्रत्यक्षवस्तुको बोधन करता है अत अत्यन्त विरुद्ध होनेसे दोनोंका अभेद कैस होसकता है ? अत यूप ओर आदित्यके अभेद बोधक वाक्यकी समान मोक्षदशामें कल्याणगुणादि समान होनेसे सादृश्यार्थक है ॥ २८ ॥ तथाच परमा श्रुतिः-“जीवस्य परमैक्यं च बुद्धिसारूप्यमेव वा। एकस्थानानिवेशो वा व्यक्तिस्थानमपेक्ष्य वा ॥ न स्वरूपैकता तस्य मुक्तस्यापि विरूपतः । स्वातन्त्र्यपूर्णतेऽल्पत्वपारतन्त्र्ये विरूपता ॥” इति ॥ २९ ॥ श्रुतिभी कहती है-जीवको परमात्माके साथ ऐक्य बोधकवाक्य सर्वज्ञत्वादि ज्ञानके समान होनेसे ओर शरीरादिरूप एक स्थानवृत्ति होनेसे संगत होती है स्वरू- पको एक मानकर नहीं होता है कारण मुक्तोंकेभी स्वरूपभेद “सदा पश्यन्ति सूरय ” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित है । स्वतन्त्रत्व, और व्यापकत्वादि ईश्वरका स्वरूप और अणुत्व परतन्त्रत्वादि जीवका स्वरूप है ॥ २९ ॥ अथवा तत्त्वमसीत्यत्र स एवात्मा स्वातन्त्र्यादिगुणोपेतत्वात् अतत्त्वमसि त्वं तन्न भवसि तद्रहितत्वादित्येकत्वमतिशयेन

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( १३७ ) निराकृतम् । तदाह-‘अतत्त्वमिति वा छेदस्तैनैक्यं सुनिराकृ- तम् ॥' इति ॥ ३० ॥ अथवा अतत्त्वमसि ऐसा पदच्छेद कर ईश्वर स्वतन्त्रत्वादिरूप होनेसे तुम ईश्वर नहीं हो सकते एवञ्च अभेदका अत्यन्त निराकरण होता है ऐसाभी अर्थ वर्णन करते हैं अतएव कहा है अतत्त्व ऐसा पदच्छेद करनेसे अभेदका निरास होता है ॥ ३० ॥ तत्तस्मात् दृष्टान्तनवकेऽपि स यथा शकुनि सूत्रेण बद्ध इत्यादिना भेद एव दृष्टान्ताभिधानाय अयमभेदोपदेश इति तत्त्ववादरह- स्यम् । तथाच महोपनिषत्-“यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्ष- रसा यथा । यथा नद्य समुद्राश्च शुद्धोदलवणौ यथा ॥ चौराप- हार्यौ च यथा यथा पुंविषयावपि । तथा जीवेश्वरौ भिन्नौ सर्वदैव विलक्षणौ ॥ ३१ ॥ नवों दृष्टान्तोंमे भेदहीका प्रतिपादन होता है यह सब दृष्टान्त छान्दोग्योपनिषदके षष्ठप्रपाठकमे हैं जिस प्रकार पक्षी और उसका बन्धन सूत्र परस्पर भिन्न हैं नाना- प्रकार वृक्षोंका रस परस्पर भिन्न है नदी और समुद्र शुद्ध जल और खार जल भिन्न हैं चोर और चोरीकी वस्तु एव पुरुष और विषय भिन्न होते हैं तिसी प्रकार जीव और ईश्वर परस्पर विलक्षण स्वरूप और स्वभाव होनेमे सदा भिन्न हैं ॥ ३१ ॥ तथाप सूक्ष्मरूपत्वान्न जीवात् परमो हरि । भेदेन मन्ददृ- ष्टीनां दृश्यते प्रेरकोऽपि सन् ॥ वैलक्षण्यं तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते बध्यतेऽन्यथा ॥” इति ॥ ३२ ॥ ऐसे होनेपरभी सूक्ष्म होनेसे मन्दगतियोंको सर्व प्रेरक परमात्मा जीवसे भिन्न होकर गृहीत नहीं होते दोनोंका वैलक्षण्य ज्ञानसे मुक्त होता है अन्यथा बद्ध होता है ॥ ३२ ॥ “ब्रह्मा शिव सुराद्याश्च शरीरक्षरणात् क्षराः । लक्ष्मीरक्षरदेह- त्वादक्षरात् परो हरि ॥ ३३ ॥ ब्रह्मा, शिव, सुर, सब शरीरका क्षरण होनेसे क्षर कहाते हैं नित्य शरीर होनेमे लक्ष्मी अक्षर हैं और हरि इनमेंभी परे हैं ॥ ३३ ॥

( १३८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- स्वातन्त्र्यशक्तिविज्ञानसुखाद्यैरखिलैर्गुणै ॥ नि सीमत्वेन ते सर्वे तद्वशा सर्वदेवता ॥” इति ॥ “विष्णुं सर्वगुणैः पूर्ण ज्ञात्वा संसा- र्व्वर्जित । निर्दुःखानन्दभुङ्नित्यं तत्समीपे स मोदते ॥ मुक्ता- नां चाश्रयो विष्णुरधिकाधिपतिस्तथा । तद्वशा एव ते सर्वे सर्व- दैव स ईश्वर ॥” इति च ॥ ३४ ॥ स्वातन्त्र्य, ज्ञान, शक्ति, सुखादि अनेक गुणो करके निस्सीम होनेसे सम्पूर्ण देवता श्रीहरिके आधीन है सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त विष्णुकी उपासनाद्वारा जो संसारसे मुक्त हो गया है वह दु खशून्य परमानन्दसे युक्त होकर भगवत्समीपमें आनन्दको प्राप्त होता है विष्णु मुक्ताक आश्रय और अधिक ( ब्रह्मादिक ) के भी आधिपति है अतः सम्पूर्ण देवता उनके आधीन हैं, सदा एक विष्णुही ईश्वर है ॥ ३४ ॥ एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानञ्च प्रधानत्वकारणत्वादिना युज्यते न तु सर्वमिथ्यात्वेन । न हि सत्यज्ञानेन मिथ्याज्ञानं सम्भवति । यथा प्रधानपुरुषाणां ज्ञानाज्ञानाभ्यां ग्रामो ज्ञात अज्ञात इत्ये- वमादिव्यपदेशो दृष्ट एव। यथा च कारणे पितरि ज्ञाते जाना- ॰ त्यस्य पुत्रमिति । अन्यथा 'यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातम्' इत्यत्र एकपिण्डशब्दौ वृथा प्रसज्येयाता मृदा विज्ञातयेत्येतावतैव वाक्यस्य पूर्णत्वात् ॥ ३५ ॥ एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान प्रतिज्ञाभी प्रधानत्व कारणत्वादि धर्मयुक्त होनेसे सङ्गत होती है सर्वमिथ्यात्वमें नहीं होती एक वस्तुके सत्यज्ञानसे अन्यका मिथ्याज्ञान सम्भव नहीं है प्रधानके ज्ञानसे अप्रधान ग्रामादि ज्ञान दृष्ट है जैसे कारणज्ञानसे कार्यज्ञान दृष्ट है तैसे ब्रह्म जगत्का कारण है अतः ब्रह्मज्ञानसे कार्यभूत जगत्का ज्ञान होता है । यदि सर्वका मिथ्यात्व माने तो एक मृत्तिकाके ज्ञानसे कार्यभूत घटशरावादि सब ज्ञात होते हैं इस दृष्टान्तमें एक शब्द और मृत्पिण्डपद व्यर्थ होंगे मृत्तिकाज्ञानसे सब ज्ञात होते हैं इतनेहीसे वाक्य पर्याप्त होता है एव लक्षणादि दोष पूर्व [???] ॥ ३५ ॥ न च वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमित्येतत् कार्यस्य मिथ्यात्वमाचष्टे इत्येष्टव्य वाचारम्भणं विकारो यस्य