भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( १२४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- आपातत अभेदार्थ वर्णन करते हैं । उसीको उपपादन करते हैं ( तथाहीति ) नील पीतादिमे परस्पर भेद प्रत्यक्ष सिद्ध हे । प्रत्यक्षसिद्ध वस्तुका अपलाप प्रमाणान्तरसे नहीं कर सकता अन्यथा अग्निमें प्रत्यक्ष सिद्ध उष्णत्वादिका अनुमानादिसे बाध होने लगेगा ॥ २ ॥ अथ मन्येथाः किं प्रत्यक्षं भेदमेवावगाहते किं वा धर्मिप्रतियो- गिघटितम् । न प्रथमं, धर्मिप्रतियोगिप्रतिपत्तिमन्तरेण तत्सा- पेक्षस्य भेदस्याशक्याध्यवसायत्वात् । द्वितीयोऽपि धर्मिप्रति- योगिग्रहणपुरस्सरं भेदग्रहणमथवा युगपत् तत्सर्वग्रहणम् । न पूर्वं बुद्धेर्विरम्य व्यापाराभावात् अन्योन्याश्रयप्रसङ्गाच्च । नापि चरमं कार्य्यकारणबुद्ध्यौर्यौगपद्याभावात् । धर्मिप्रतीतिर्हि भेदप्रत्ययस्य कारणं सन्निहितेऽपि धर्मिणि व्यवहितप्रतियोगि- ज्ञानमन्तरेण भेदस्याज्ञातत्वेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्य्यकार- णभावावगमात् ॥ तस्मान्न भेदप्रत्यक्षं सुप्रसरम् ॥ ३ ॥ भेदके प्रत्यक्ष होनेसे अभेद श्रुतिको अर्थान्तर परत्व जो कहा सो तभी होसकता है जब प्रत्यक्षसे भेदका ग्रहण होता हो परन्तु प्रत्यक्षसे भेदका ग्रहणही असम्भव हे क्योंकि प्रत्यक्ष केवल भेदको ग्रहण करता है, या धर्मी प्रतियोगीसहित भेदको ग्रहण करता हे ? जिसमें भेद लाना हो वह धर्मी है जिसका भेद कहना हो वह प्रतियोगी है। यथा 'घटो न पट' यहापर घटका भेद पटमें कहना है तो पट धर्मी और घट प्रतियोगी है घट प्रतियोगिक भेदविशिष्ट पट ऐसा वाक्यार्थ है । ( न प्रथम इति ) किसी वस्तुमें अन्यवस्तुका भेद कहा जाता है भेद अन्योन्याभाव हे अभावज्ञानमें प्रतियोगीज्ञान कारण है तथाच धर्मी ज्ञान और प्रतियोगी ज्ञानके विना भेदज्ञान नही होसकता । द्वितीय पक्षकोभी विकल्प करके दूषित करते हैं ( द्वितीयोपीति ) प्रत्यक्ष धर्मी और प्रतियोगीको ग्रहण करके भेदको ग्रहण करता है, या एकही कालमें तीनोको ग्रहण करेगा ? चक्षुरादिके संयोगानन्तर भेद या प्रतियोगी एकको ग्रहण करके बुद्धिके व्यापारकी निवृत्ति होनेपर व्यापारान्तर न होनेसे दूसरेको नही ग्रहण कर सकते बुद्धिकाठैर ठैर कर व्यापार नहीं होता है। भेदके ग्रहणमे धर्मी और प्रतियोगीका ग्रहण होगा धर्मी और प्रतियोगीके ग्रहणमे भेदका ग्रहण होगा इस प्रकार अन्योन्याश्रयभी है अत प्रथमकिक्लप नही हो सकता। कार्य कारण दोनो ज्ञान एक कालमें बाधित

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