सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषार्टीकासमेत । ( १२५ ) होनेसे द्वितीय पक्षभी नहीं होसकता । धर्मीज्ञान और प्रतियोगीज्ञान दोनों भेद- ज्ञानके कारण हैं क्योंकि पटादि धर्मी समीप दृष्ट होनेपरभी दूरवर्ती प्रतियोगीके ज्ञानके विना भेदज्ञान नहीं होता है अतः अन्वय व्यतिरेकसे दोनोंमें परस्पर कार्य कारणभाव निश्चित होता है । इस कारण भेद प्रत्यक्ष किसी प्रकारमे नहीं हो सकता ॥ ३ ॥ इतिचेत् किं वस्तुस्वरूपभेदवादिनं प्रति इमानि दूषणान्यु- दुष्यन्ते किं धर्मिभेदवादिनं प्रति। प्रथमे चोरापराधान्माण्डव्य- निग्रह न्यायापात भवदभिधीयमानदूषणानां तद्विषयत्वात् ॥४॥ खण्डन-क्या स्वरूप भेदवादीके प्रति यह दोष देते हो, किंवा धर्मी भेदवादीके मत- में ? यदि स्वरूप भेदवादीके मतमें कहो तो सर्वथा विपरीत है ( चोरापराधेनेति ) यह क्या महाभारतकी है एक समय कोई चोरके भ्रमसे माण्डव्य ऋषिको पकड कर राजाके पास ले गये राजाने शूलीकी सजा दी शूलीमें चढनेके अनन्तर यम- लोकमें जाकर धर्मराजसे पूछा मैंने क्या अपराध किया जिससे मुझको शूलीपर चढना पडा धर्मराजने कहा आप बाल्यावस्थामें छोटे छोटे कीडोंको पकडकर कण्ट- कसे छेदा करते थे उस पापके फलसे आज आपको शूलीपर चढना पडा । इस बातको सुनकर माण्डव्य ऋषिने रुष्ट होकर धर्मराजको शाप दिया मैने अज्ञानसे बाल्यावस्थामें ऐसा कर्म किया था अज्ञानमें किये कर्मका पाप नही होता परन्तु तुमने इतना कडा दण्ड दिया इसलिये मर्त्यलोकमे शूद्रयोनिमे जन्म लोगे वही विदुर हुए उस दिनस बालकको कोई प्रकार पाप नही लगता पूर्वोक्त दूषण एकभी स्वरूप भेदके विषयमें नहीं लगता हे ॥ ४ ॥ ननु वस्तुस्वरूपस्यैव भेदत्वे प्रतियोगिसापेक्षत्वं न घटते घट- वत् प्रतियोगिसापेक्ष एव सर्वत्रभेद प्रथत इति चेन्न, प्रथमं सर्वतोविलक्षणतया वस्तुस्वरूपे ज्ञायमाने प्रतियोग्यपेक्षया विशिष्टव्यवहारोपपत्ते । तथाहि परिमाणघटितं वस्तुस्वरूपं प्रथममवगम्यते पश्चात् प्रतियोगिविशेषापेक्षया ह्रस्वं दीर्घमिति तदेव विशिष्य व्यवहारभाजनं भवति ॥ ५ ॥ शंका-यदि वस्तुके स्वरूपको ही भेद कहो तो प्रतियोगीके ग्रहणद्वारा ही भेदका ग्रहण होता है इस प्रकार भेदका प्रतियोगिसापेक्षत्व नियम है सो नहीं रहेगा यथा घट