भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( १२६ ) मार्त्तण्डप्रप्रद । पूर्वपक्ष- स्वरूपग्रहणम् प्रतियोगीकी अपेक्षा नही होती है । उत्तर ( इति चेन्नेति ) रूप भेद प्रथम घटादिवस्तु पटादिसे रूपभेद विलक्षण आकार गृहीत होता है अनन्तर पटभेवान् घट इत्यादि विशिष्ट व्यवहारके लिये प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है जिस प्रकार परी- माणगुणविशिष्ट वस्तुस्वरूपका ज्ञान प्रथम होता है पश्चात् किसी प्रतियोगी विशेषके प्रति ह्रस्वत्व दीर्घत्वादिरा ग्रहण होता है यहा प्रतियोगीकी अपेक्षा उत्तरकालमें होती ६ ॥ ५ ॥ तदुक्तं विष्णुत्तत्वनिर्णये-न च विशेषणविशेष्यतया भेदसिद्धि । विशेषणविशेष्यभावश्च भेदापेक्षधर्मिप्रतियोग्यपेक्षया भेद- सिद्धि भेदापेक्षश्च धर्मिप्रतियोगितामित्यन्योन्याश्रयतया भेद- स्यायमुक्ति , पदार्थस्वरूपत्वाद्भेदस्येत्यादिना । अतएव गवा- र्थिनो गवयदर्शनान्न प्रवर्त्तन्ते गोशब्दञ्च न स्मरन्ति ॥ ६ ॥ उक्त अर्थमें प्रमाण देते है ( तदुक्तमिति ) विशेष्य विशेषणभावसे भेद नहीं सिद्ध हो सकता कारण विशेषणविशेषणभावम भेदके लिये अपेक्षित धर्मी और प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है एव धर्मी ओर प्रतियोगीको भेदकी अपेक्षा होती है इसी प्रकारसे अन्योन्याश्रय होता हे अतः भेदसिद्धिमें युक्ति नही हे ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि भेदवस्तुका स्वरूपही हे भेद ओर वस्तुस्वरूप एक होनेपरभी घटादि शब्द कहनेपर प्रतियोगीकी अपेक्षा नहीं होती है भेद कहनेपर प्रतियोगीकी अपेक्षा होती है यह शब्द शक्ति स्वभाव है । भेदवस्तु स्वरूप होनेहीसे गवार्थी गवयजन्तुको देखकर न गोको लानेके लिये प्रवृत्त होता हे न अयगो. ऐसा स्मरणही करता हे ॥ ६॥ नच नीरक्षीरादौ स्वरूपे गृह्यमाणे भेदप्रतिभासोऽपि स्यादिति भण- नीयम्, समानाभिहारादिप्रतिबन्धकबलाद्भेदभानव्यवहाराभावोप- पत्ते.। तदुक्तम्-"अतिदूरात् सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनव- स्थानात् । सौक्ष्म्याद् व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च" इति । अतिदूरात् गिरिशिखरवर्त्तितर्त्वादौ अतिसामीप्याल्लोचना- ज्ञनादौ इन्द्रियघाताद्विद्युदादौ मनोऽनवस्थानात् कामाद्युप- प्लुतमनस्कस्य स्फीतालोकवर्त्तिनि घटादौ सौक्ष्म्यात् परमा- ण्वादौ व्यवधानात् कुड्याद्यन्तर्हिते अभिभवात् दिवा प्रदीपप्र- भादौ समानाभिहारात् नीरक्षीरादौ यथावद् ग्रहणं नास्तीत्यर्थ ॥७॥