सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १२७ ) यदि कहो भेद वस्तुका स्वरूप है तो जलमिश्रित दूधमें परस्पर जल और दूधका भेदग्रहण होने लगेगा सोभी नहीं समान वस्तन्तरसे अभिभूत होनेसे परस्पर भेद- ग्रहण नही होता है । अत एव सांख्यतत्त्वकौमुदीमें कहा है ( अतिदूरादित्यादि ) अक्षरार्थ अत्यन्तदूर अत्यन्त समीप, इन्द्रियनाश, अत्यन्तसूक्ष्म, व्यवधान, प्रबल वस्तुसे पराभव होनेसे तथा सजातीयवस्तुमें मिल जानेसे उस वस्तुका ग्रहण नहीं होता है उसीको प्रत्येकके उदाहरणपूर्वक दिखाते हैं । अत्यन्त दूर होनेसे पर्वत शिखरवर्ति वृक्षादिका ग्रहण नहीं होता है अति समीप होनेसे नेत्रोंमें लगे हुए अञ्जनका ग्रहण नहीं होता है इन्द्रिय नष्ट होनेसे बिजली आदिका कामक्रोधादि वश विषयान्तरमें आसक्त चित्तको स्फुरत्प्रकाशमें वर्तमानघटका अतिसूक्ष्म होनेसे परमाणुका व्यवधान होनेसे घरके भीतरकी वस्तुका तथा अपनेसे अधिक तेजस्वीसे परिभूत होनेसे दिनमें दीपककी प्रभाका और सजातीय वस्तुमें सम्मिलित होनेसे जलमिश्रित दूधमे जल और दूधके यथार्थ स्वरूपका ग्रहण नहीं होता है ॥ ७ ॥ भवतु वा धर्मभेदवादस्तथापि न कश्चिद्दोषः धर्मिप्रतियो- गिग्रहणे धर्मभेदमानसम्भवात् । न च धर्मभेदवादे तस्य तस्य भेदस्य भेदान्तरभेद्यत्वेनानवस्था दुरवस्था स्यादित्या- स्थेयं भेदान्तरप्रसक्तौ मूलाभावात् भेदभेदिनौ भिन्नाविति व्यव- हारादर्शनात् ॥ ८ ॥ धर्मभेदपक्षमेंभी पूर्वोक्त आक्षेपका समाधान-(भवतु वेत्यादि) 'घटो न पट' यहा पर धर्मी भेदाश्रय पट और प्रतियोगी घटका ग्रहण होनेपर भेदका मानसग्रहण अवश्य होगा ( नचेति ) धर्म भेदपक्षमें भेदरूप धर्म स्वरूपसे भिन्न है तो उसमेंभी पुनः भेद मानना होगा उसमें भेदान्तर एव क्रमसे भेदपर भेद होजायगा अन्यथा प्रथम भेदभी व्यर्थ होगा तथाच अनवस्था दुष्परिहर होगी । उत्तर-( भेदान्तरेति ) घट पटका परस्पर भेदव्यवहार सिद्ध होनेसे धर्मरूपभेद व्यवहारमूलक है परन्तु भेदके ऊपर भेदान्तर माननेमे कोई युक्ति नहीं घट पट परस्पर भिन्न हे इस प्रकार भेद और भेदी परस्पर भिन्न हैं ऐसा व्यवहार नहीं होता है ॥ ८ ॥ न चैकभेदबलेनान्यभेदानुमानं दृष्टान्तभेदाविघातेनोत्थान- दोषाभावात् । सोऽयं पिण्याकयाचनार्थं गतस्य खारिकातै- लदातृत्वाभ्युपगम इव । दृष्टान्तभेदाविमर्द्दे त्वानुत्थानमेव । न