भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १२८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पूर्णप्रज्ञ-

हि वरविघाताय कन्योद्वाह । तस्मान्मूलक्षयाभावानदनवस्था न दोषाय ॥ ९ ॥ यदि कहो 'घट पटाद्भिन्न कपालसमवेतत्वात्' इस प्रकार भेदकाभी पटादिमे भेदानुमान हो जायगा उस भेदकाभी पुनः भेदानुमान होगा यहभी नहीं घटभेदानु मानमें दृष्टान्त होनेपरभी भेदको भेदानुमान दृष्टान्त न होनेसे एतादृश अनुमानका उत्थानही नहीं हो सकता है अत एतादृश अनुमान पिण्याक (खरी) मांगनेवालेको पसेरीभर तेल मिलनेकी समान अतीव अभ्युदय है दृष्टान्तमें भेद न स्वीकार करेंगे तो भी उत्थान न होगा कोईभी वरविनाशके लिये कन्याका विवाह नहीं करताहै ॥९॥ अनुमानेनापि भेदोऽवसीयते । परमेश्वरो जीवाद्भिन्न , तं प्रति सेव्यत्वात् यो यं प्रति सेव्य स तस्माद्भिन्न यथा भृत्याद्राजा । न हि सुख मे स्याद् दुःख मे न मनागपि इति पुरुषार्थमर्थय- माना पुरुषाः स्वपतिपदं कामयमानाः सत्कारभाजो भवेयु प्रत्युत सर्वानर्थभाजन भवन्ति । यः स्वस्यात्मनो हीनत्वं परस्य गुणोत्कर्षञ्च कथयति स स्तुत्यः प्रीतः तावकस्य तस्मा अभीष्टं प्रयच्छति। तदाह-"घातयन्ति हि राजानो राजाहमिति वादिनः । ददत्यखिलमिष्टञ्च स्वगुणोत्कर्षवादिनाम्" इति ॥ १०॥ जीव और ईश्वरका परस्परभेदसाधक अनुमान कहते है-(परमेश्वरेति) 'परमेश्वर' पक्ष है "जीव भेद" साध्य है सेव्यत्व हेतु है जो जिसके सेव्य हो वह उससे भिन्न है यह व्याप्ति है यथा भृत्य ओर राजा (ओरभी) मुझे सुख प्राप्त हो किञ्चिदपि दुःख न हो इस प्रकार सुखरूप पुरुषार्थको चाहनेवाले मनुष्य यदि स्वामीके पदकी कामना करेंगे तो उनका सत्कार क्या होगा ? विपरीत अतीव दुःख (कारागारादि) के पात्र बनेंगे जो स्वामीके सन्निधिमे अपनेको हीनत्वका अनुसन्धान कर स्वामीके गुणकी स्तुति करते हैं उनपर स्वामी प्रसन्न होकर उनका मनोरथ सफल करते हैं नीतिकारोने कहाभी है अपनेको स्वय राजा कहनेवालोको राजालोग शूली आदि दण्डसे दंडित करते हैं ओर राजा अपने गुणके गान करने वालोंको अभिमत वस्तु देते हैं ॥ १० ॥ एवञ्च परमेश्वराभेदतृष्णाया विष्णोर्गुणोत्कर्षस्य मृगतृष्णिका समत्वाभिधानं विपुलकदलीफललिप्सया जिह्वाच्छेदन इवेति