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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

( १२८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पूर्णप्रज्ञ-

हि वरविघाताय कन्योद्वाह । तस्मान्मूलक्षयाभावानदनवस्था न दोषाय ॥ ९ ॥ यदि कहो 'घट पटाद्भिन्न कपालसमवेतत्वात्' इस प्रकार भेदकाभी पटादिमे भेदानुमान हो जायगा उस भेदकाभी पुनः भेदानुमान होगा यहभी नहीं घटभेदानु मानमें दृष्टान्त होनेपरभी भेदको भेदानुमान दृष्टान्त न होनेसे एतादृश अनुमानका उत्थानही नहीं हो सकता है अत एतादृश अनुमान पिण्याक (खरी) मांगनेवालेको पसेरीभर तेल मिलनेकी समान अतीव अभ्युदय है दृष्टान्तमें भेद न स्वीकार करेंगे तो भी उत्थान न होगा कोईभी वरविनाशके लिये कन्याका विवाह नहीं करताहै ॥९॥ अनुमानेनापि भेदोऽवसीयते । परमेश्वरो जीवाद्भिन्न , तं प्रति सेव्यत्वात् यो यं प्रति सेव्य स तस्माद्भिन्न यथा भृत्याद्राजा । न हि सुख मे स्याद् दुःख मे न मनागपि इति पुरुषार्थमर्थय- माना पुरुषाः स्वपतिपदं कामयमानाः सत्कारभाजो भवेयु प्रत्युत सर्वानर्थभाजन भवन्ति । यः स्वस्यात्मनो हीनत्वं परस्य गुणोत्कर्षञ्च कथयति स स्तुत्यः प्रीतः तावकस्य तस्मा अभीष्टं प्रयच्छति। तदाह-"घातयन्ति हि राजानो राजाहमिति वादिनः । ददत्यखिलमिष्टञ्च स्वगुणोत्कर्षवादिनाम्" इति ॥ १०॥ जीव और ईश्वरका परस्परभेदसाधक अनुमान कहते है-(परमेश्वरेति) 'परमेश्वर' पक्ष है "जीव भेद" साध्य है सेव्यत्व हेतु है जो जिसके सेव्य हो वह उससे भिन्न है यह व्याप्ति है यथा भृत्य ओर राजा (ओरभी) मुझे सुख प्राप्त हो किञ्चिदपि दुःख न हो इस प्रकार सुखरूप पुरुषार्थको चाहनेवाले मनुष्य यदि स्वामीके पदकी कामना करेंगे तो उनका सत्कार क्या होगा ? विपरीत अतीव दुःख (कारागारादि) के पात्र बनेंगे जो स्वामीके सन्निधिमे अपनेको हीनत्वका अनुसन्धान कर स्वामीके गुणकी स्तुति करते हैं उनपर स्वामी प्रसन्न होकर उनका मनोरथ सफल करते हैं नीतिकारोने कहाभी है अपनेको स्वय राजा कहनेवालोको राजालोग शूली आदि दण्डसे दंडित करते हैं ओर राजा अपने गुणके गान करने वालोंको अभिमत वस्तु देते हैं ॥ १० ॥ एवञ्च परमेश्वराभेदतृष्णाया विष्णोर्गुणोत्कर्षस्य मृगतृष्णिका समत्वाभिधानं विपुलकदलीफललिप्सया जिह्वाच्छेदन इवेति

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १२९ ) एतादृशविष्णुविद्वेषणान्धतमसप्रवेशप्रसङ्गात् । तत्तत्प्रति- पादितं मध्यमन्दिरेण महाभारततात्पर्यनिर्णये-“ अनादि- द्वेषिणोदैत्या विष्णोर्द्वेषो विवर्द्धितः । तमस्यन्धे पातयति दैत्यानन्धे विनिश्चयात् ” ॥ इति ॥ ११ ॥ (एवञ्चेति) परमेश्वरके साथ स्वरूपकी ऐक्यरूप मुक्तिकी लालसासे जिन्होंने विष्णुके गुणोत्कर्षको मृगतृष्णाके समान कहा सो कदलीफलकी इच्छासे जिह्वाके काटनेके समान हैं इस प्रकार भगवद्वेषसे घोर नरकमें प्रवेश होता है इस बातको मध्यमन्दिर ( आनन्दतीर्थ ) जी ने प्रतिपादन किया है अनादि कालसे द्वेषस्वभाववाले दैत्योंने विष्णुके विषय द्वेषको बढाया अतः तादृश अज्ञानियोंको घोर नरकमें गिराते हैं ॥ ११ ॥ सा च सेवा अङ्कननामकरणभजनभेदात्त्रिविधा । तत्राङ्कनं नासयणायुधादीनां तद्रूपस्मरणार्थमपेक्षितार्थसिद्धार्थं च । तथाच शाकल्यसंहितापरिशिष्टम्-“चक्रं बिभर्त्ति पुरुषोभि- तप्तं बलंदेवानाममृतस्य विष्णो । स याति नाकं दुरिता विधूय विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ॥ १२ ॥ (सा च सेवेति) तप्तमुद्रा ( शंखचक्र ) धारण, नाम करण और भजन भेदसे तीन प्रकार हैं, शंखचक्ररूप भगवदायुधधारण अभीष्ट सिद्धिके लिये और भगवत्के रूपका सदा स्मरणके लियेभी है उक्त विषयमे श्रुतिप्रमाणभी देते हैं (चक्रं बिभर्तीति)देवानां देवतोंका, बलम् रक्षक, अभितस्य विष्णो'-व्यापक परमात्मा विष्णुका, अभितप्तम् चक्रम् अग्निसे सन्तप्त किये हुए श्रीसुदर्शनचक्रको, वपुषा-बाहुमूलमे, यो बिभर्ति-जो धारण करता है अर्थात् ( अङ्कित करता है ) स -तादृश चक्रधारी पुरुष, दुरिताः पुण्यपापको, विधूय-नष्ट करके, “ तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय ” इत्यादि श्रुति- स्वारस्यसे बन्धहेतुक पुण्य पाप दोनों दुरित पदार्थ हैं । नाकम् परमपदको ( श्रीवै- कुण्ठ ) को, याति-जाता है, यत्-जिस परमपदको वीतरागाः-भगवत्प्राप्तिव्यति- रिक्ताविषयमें इच्छा रहित, यतयः-यतिलोग, विशन्ति-जाते हैं ॥ १२ ॥ देवाश्च येन विधृतेन बाहुना सुदर्शनेन प्रयातास्तमायन् येनाङ्किता मनवो लोकसृष्टिं वितन्वन्ति ब्राह्मणास्तद्वहन्ति ॥

(२६०) सर्वदर्शनसंग्रहः। [पूर्णप्रज्ञ- तद्विष्णोः परमं पदं येन गच्छन्ति लाञ्छिताः। उरुक्रमस्य चिह्नै- रङ्किता लोके सुभगा भवन्ति" इति॥ १३॥ 'अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समासत' इति तैत्तिरीय- कोपनिषद्य् ॥ १४॥ (देवाश्च येनेति) जिस सुदर्शन चक्रसे अङ्कित भुजयुक्त देवगण शरीरत्यागके अनन्तर उस परमात्माको प्राप्त होते हैं। जिससे अङ्कित होनेसे मन्वादि लोकसृष्टिको करते हैं। जिस सुदर्शनसे अंकित अर्थात् तप्तमुद्रा धारण करनेवाले ब्राह्मणलोग परमपदको प्राप्त होते हैं। ऋग्वेदीय मन्त्र (पवित्रमित्यादि) ब्रह्मणः पते ! चतुर्मुख ब्रह्माके स्वामिन् (नियामक) विष्णो, विभु चेष्टानुकूलसङ्कल्पाश्रय आप, विश्वत गात्राणि पर्येषि-स्वा- श्रित समस्त चेतनोंके शरीरमें अन्तर्यामी रूपसे व्याप्त होते । पवित्रं ते विततमिति आपका आत्मिक जन शरीरमें अग्निसन्तापसे जायमान चिह्नद्वारा व्याप्त सुदर्शन हे तादृश सुदर्शनसे जिनका भुजमूल तप्त न हो वह आम अर्थात् अतप्त पाप है मोक्षहे- तुभूत उपासनादिका प्रतिबन्धक पाप नष्ट नहीं है अतः तत् ब्रह्मको "ओम् तत् सत् इति ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः" इति स्मृतिके प्रमाणसे तत् शब्द ब्रह्मका वाचक है। नाश्नुते नहीं प्राप्त होते हैं। ( इत् वहन्त.) यह तप्त सुदर्शनको धारण करनेवाले शृतासः विनष्टपाप हैं अतः तत् समश्नुते ब्रह्मको प्राप्त होते हैं अर्थात् मोक्षके अधिकारी होते हैं। "सुदर्शने च दर्भे च पवित्रं चरणस्रुचके "। "सुदर्शनं सहस्रारं पवित्रं चरणं पवि " इत्यादि वेदनिघण्टु वचनोंसे तथा "पवित्रं चरणं नेमि रथचक्रं सुदर्शनम् " इत्यादि पद्मपुराण वचनात्से पवित्र शब्द सुदर्शनचक्रमें रूढ है (उरुक्रमस्येति) वामनभगवान्के चिह्नोंसे अङ्कित होनेसे लोकमें पुण्यशाली होते हैं॥ १३॥ १४॥ स्थानविशेषश्चाग्नेयपुराणे दर्शितः।"दक्षिणे तु करे विप्रो बिभृ- याच्च सुदर्शनम्। सव्येन शंखं च बिभृयादिति ब्रह्मविदो विदुः ॥" इति । अन्यत्र चक्रधारणे मन्त्रविशेषश्च दर्शितः।"सुदर्शन महा- ज्वाल कोटिसूर्य्यसमप्रभ । अज्ञानान्धस्य मे नित्यं विष्णोर्मार्गं प्रदर्शय ॥ त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे ॥ नमितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते"॥ इति ॥ १५॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( १३१ )

ब्राह्मणादि दाहिनी भुजामें सुदर्शन और बाईं भुजामें शंखको धारण करे ऐसा वेदवेत्ता लोग कहते हैं। चक्रधारणमन्त्र-सुदर्शनेत्यादि । शंखधारण मन्त्र-त्वं पुरेत्यादि ॥ १५ ॥ नामकरणम्-पुत्रादीनां केशवादिनाम्ना व्यवहारः सर्वदा तन्नामा- नुस्मरणार्थम् । भजनं दशविधं वाचा सत्यं हितं प्रियं स्वाध्या- यः कायेन दानं परित्राणं परिरक्षणं मनसा दया स्पृहा श्रद्धा चेति । अत्रैकैकं निष्पाद्य नारायणे समर्पणं भजनम् । तदुक्तम्- "अङ्कनं नामकरणं भजनं दशधा च तत् " इति ॥ १६ ॥ पुत्रादिकोंको केशवादि नाम करना नाम करण है। यह सदा भगवन्नामके स्मरणके लिये है. वचनसे सत्य हितकर और प्रिय बोलना, वेदाध्ययन करना, शरीरसे दानदेना, भयसे मुक्तकरना, रक्षाकरना, मनसे दयाकरना, भगवद्विषयमें श्रद्धा भक्ति करना यह दशविध है इनमेंसे एक एकको सम्पादनकरकर श्रीमन्नारायणके चरणोंमें अर्पण करना भजन है जङ्कनमित्यादि पद्यका पूर्वोक्त अर्थ है ॥ १६ ॥ एवं ज्ञेयत्वादिनापि भेदोऽनुमातव्य , तथा श्रुत्यापि भेदोऽव- गन्तव्य । "सत्यमेतमनुविश्वे मदन्तिराति देवक्य गृणतो मघोनः सत्यासो अस्य महिमागृणे शको यज्ञेषु विप्रराज्ये सत्य आत्मा सत्यो जीव सत्यं भिदा सत्यं भिदा मयि वारुण्यो मयि वारुण्यो मयि वारुण्यः " इति मोक्षानन्दभेदप्रतिपादकश्रुतिभ्यः "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥" ' जगद्व्यापारवर्जप्रकरणादसन्निहित- त्वाच्च' इत्यादिभ्यश्च ॥ १७ ॥ उपास्य उपासक ज्ञेय ज्ञातृभाव होनेसे भी ईश्वर और जीवके अत्यन्त भेदका अनुमान किया जाता है अर्थात् ईश्वर उपास्य और जीव उपासक है एव श्रुतिसे भी यह प्रतिपादित होता है (सत्यमेतमित्यादि) ऋग्वेदका मन्त्र है । इसमें सत्य आत्मा सत्योजीव इत्यादिसे भेद स्पष्टही प्रतिपादित है । भगवद्गीतामे भी पूर्वोक्त क्षेत्र क्षेत्रज्ञ और ईश्वरके स्वरूपका ज्ञानपूर्वक भगवत्की उपासनासे भगवत्के समान धर्म ( स्वरूपका अभेद ) को प्राप्त जीवको पुनः सृष्टिकालमें उत्पत्ति और प्रलय

(१३२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पूर्णप्रज्ञ- कालमें लयाभाव कहा है इद ज्ञानेत्यादिमे । अतएव 'तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जन परम साम्यमुपैति" इत्यादि श्रुति'भोगमात्र साम्यलिङ्गात्' इत्यादि ब्रह्मसूत्र संगत होते है। सूत्रान्तरमे भी मुक्तात्माको जगत् सृष्टि आदि व्यापारको छोडकर ब्रह्मके समस्त गुण कहे है अतो वेत्यादि वाक्यमें सन्निहित ब्रह्म है जीव नही अत प्रकरणवश और सन्निहित न होनेके कारण तदतिरिक्त आनन्दादि गुणही मुक्तात्माका है ॥ १७ ॥ न च 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इति श्रुतिबलाज्जीवस्य पारमै- श्वर्य्यं शक्यशङ्कं 'सम्पूज्य ब्राह्मणं भक्त्या शूद्रोऽपि ब्राह्मणो भवेत्' इतिवत् सहितो भवतीत्यर्थपरत्वात् । ननु “प्रपञ्चो यदि वर्त्तेत निवर्त्तेत न संशय । मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥” इति वचनात् द्वैतस्य कल्पितत्वमवगम्यत इति चेत् ॥ १८ ॥ अद्वैतिकी आशङ्का-नचेत्यादि । ब्रह्मको जाननेवाले ब्रह्मरूप होते है ऐसे श्रुति भगवती कहती है अत जीव और ब्रह्मका अभेद सिद्ध होता है । समाधान- ब्राह्मणोंकी सेवा और शुश्रूषाआदि करनेसे शूद्रभी ब्राह्मण हो जाता है इत्यादि वत् सन्निहित अथवा सादृश्य उसकाभी अर्थ है (ननुइति) यदि प्रपञ्च है तो घटादि वत् अवश्य नष्टभी होगा क्योंकि यह समस्त वस्तु मायासे कल्पित मात्र है वास्तवमे अद्वैतही है ॥ १८ ॥ सत्यं भावमनभिसन्धायभिधानात् । तथाहि यद्ययमुत्पद्येत तर्हि निवर्त्तेत न संशय । तस्मादनादिरेवाय प्रकृष्ट पञ्चविधो भेदप्रपञ्च । न चायमविद्यमानो मायामात्रत्वान्मायोति भगव- दिच्छोच्यते ॥ १९ ॥ यहभी वास्तविक भावका अनुसंधान नही करते है क्योकि यदि घटादिवत् आत्मा उत्पन्न होना हो तो अवश्यही विनष्ट भी होता परन्तु ऐसा उत्पन्न नही होता है निम्नलिखित पाँच प्रकारके भेद अनादि है अत यह प्रपञ्च अविद्यमान नही मायामात्रमित्थम् पदार्थ भी मायाशब्द सदसदनिर्वचनीयत्व नही किन्तु, भगवत्स्वरूपरा वाची माया शब्द है महामाया, अविद्या, नियति, मोहिनी, प्रकृति वासना यह सब भगवद्रूपी इच्छाको कहते है ॥ १९ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १३३ ) 'महामायेत्यविद्येति नियतिर्मोहिनीति च । प्रकृतिर्वासनेत्येव तवेच्छानन्त कथ्यते॥ प्रकृति प्रकृष्टकरणाद्वासना वासयेद्यतः । अ इत्युक्ते हरिस्तस्य मायाऽविद्येति संज्ञिता ॥ मायेत्युक्ता प्रकृष्टत्वात् प्रकृष्टे हि मया भिदा । विष्णोः प्रज्ञप्तिरेवैका शब्दै- रेतैरुदीर्य्यते ॥ प्रज्ञप्तिरूपो हि हरि सा च स्वानन्दलक्षणा ॥ इत्यादिवचननिचयप्रामाण्यबलात् ॥ २० ॥ प्रकृत्यादि संज्ञाके हेतुको कहते हैं प्रकर्षरूपसे अर्थात् असम्भावितकोभी समा- वित करनेसे प्रकृति और वासित करनेसे वासना हे । अशब्द हरिका वाचक है उन्हीं हरिकी माया ( इच्छा ) को अविद्या कहते हैं । अस्य विद्या अविद्या ऐसा विग्रह होता है प्रकृष्ट कार्य करनेसे प्रकृति और माया इत्यादि शब्द विष्णुके ज्ञानविशेषको कहते हैं वह ज्ञानस्वरूप भगवान्‌का आनन्दलक्षण हे ॥ २० ॥ सैव प्रज्ञा मानत्राणकर्त्री च यस्य तन्मायामात्रं ततश्च परमेश्व- रेण ज्ञातत्वाद्रक्षितत्वाच्च न द्वैतं भ्रान्तिकल्पितं, न हीश्वरे सर्वस्य भ्रान्ति सम्भवति विशेषादर्शननिबन्धनत्वाद्भ्रान्तेः । तर्हि तद्व्यपदेश कथमित्यत्रोत्तरम् 'अद्वैतं परमार्थतः' इति पर- मार्थापेक्षया तेन सर्वस्मादुत्तमस्य विष्णुत्तत्तस्य समाभ्यधि- कशून्यत्वमुक्तं भवति ॥ २१ ॥ वही प्रज्ञा मान ओर रक्षा करनेवालीभी हे जिनके मतम द्वेत मायामात्र हे उनके मतमें परमेश्वरसे ज्ञात ओर रक्षित होनेसे द्वेत कदापि कल्पित नहीं होसकता । सर्वज्ञ परमात्मामें भ्रान्ति हो नहीं सकती क्योंकि भ्रान्ति विशेष दर्शन न होनेसे होती ह यथा रज्जुम सर्पका भ्रम केवल दण्डाकारता मात्र देखकर होता हे ईश्वर सर्वज्ञ होनेसे सर्वदा विशेष दर्शन बना रहेगा । यदि ईश्वरमे भ्रम नही हो सकता है तो पुन अद्वैत व्यवहार श्रुतिने केसे किया? इसका उत्तर देते हैं--कि ( परमार्थतः इति ) परमार्थपक्ष लेकर अद्वैत हे अभिप्राय यह है 'न तत्समश्चाभ्यधिकः कुतोऽन्यः' इत्यादि श्रुतियोंसे भगवान् विष्णुके सम ओर अधिक कोईभी न होनेसे अद्वैत ( अद्वितीय ) कहे जाते हैं । अतएव श्रीयामुनाचार्यनेभी कहा हे “यथा चोलनृपः सम्राडद्वितीयोऽत्रभूतले । इति तत्तुल्यनृपतिनिवारणपरं वचः । नतु तत्पुत्रपौत्रादिनि- वारणपरं भवेत् ॥ " इत्यादि ॥ २१ ॥

( १३४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- तथाच परमा श्रुति - "जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा । जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ॥ मिथश्च जडभेदो यं प्रपञ्चो भेदपञ्चकः । सोऽयं सत्योऽप्यनादिश्च सादिश्चेन्नाशमा- प्नुयात् ॥ न च नाशं प्रयात्येप न चासौ भ्रान्तिकल्पित । कल्पितश्चेन्निवर्त्तेत न चासौ विनिवर्त्तते ॥ २२ ॥ भेदपञ्चक-जीवका ईश्वरके साथ भेद १ जड और ईश्वरका भेद २ जीवोंके परस्पर भेद ३ जड और जीवका भेद ४ जडका परस्पर भेद ५ यह पाँच भेदात्मक प्रपञ्च है यह सभी भेद सत्य और अनादि हैं यदि सादि होते तो अवश्य नष्ट होते परन्तु एतादृश भेदका कदापि नाश नहीं होता है एव यह प्रपञ्च भ्रान्तिकल्पि- तभी नहीं क्योंकि कल्पित होता तो अवश्य निवृत्तभी होता परन्तु प्रपञ्चकी निवृत त्तिभी नहीं होती है ॥ २२ ॥ द्वैतं न विद्यत इति तस्मादज्ञानिना मतम् । मतं हि ज्ञानिना- मेतन्मितं त्रातं हि विष्णुना ॥ तस्मान्मात्रमिति प्रोक्तं परमो हरिरेव तु ॥" इत्यादि । तस्माद्विष्णो सर्वोत्कर्ष एव तात्पर्य्यं सर्वागमानाम् ॥ २३ ॥ यह अज्ञानियोंका कहना है कि द्वैतरूप प्रपञ्च हेही नहीं विष्णुसे ज्ञात और रक्षित होनेसे द्वैत सत्य है । यह तत्त्वज्ञानियोंका मत है-अत यह सब मात्र अर्थात् अल्प है सर्वोत्कृष्ट भगवान् विष्णु है । अत विष्णुको सर्वोत्कर्ष बोधनमें सम्पूर्ण आगमका तात्पर्य है ॥ २३ ॥ एतदेवाभिसन्धायाभिहितं भगवता - 'द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षर- श्चाक्षर एव च । क्षर सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ उत्तम- पुरुषस्त्वन्य परमात्मेत्युदाहृत । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्त्यव्यय ईश्वर ॥ यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित पुरुषोत्तम ॥ २४ ॥ जगत्में क्षर और अक्षर भेदसे दो प्रकारके पुरुष प्रसिद्ध हैं । संपूर्ण संसारी चेतन ब्रह्मादि स्तंभपर्यन्त क्षरण स्वभाव प्रकृति सम्बन्ध उपाधिके वश क्षर कहाते हैं प्रकृतिसम्बन्धविनिर्मुक्त मुक्तात्मा अक्षर है । वह अचित् परिणाम ब्रह्मादि देहस

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १३५ ) मान न होनेसे कूटस्थ कहे जाते हैं । क्षर और अक्षर शब्दनिर्दिष्ट बद्ध और मुक्त जीवसे अन्य उत्तम पुरुष है जिसको परमात्मा कहते हैं । जो परमात्मा अचित् और बद्धमुक्तरूप लोकत्रयमे आत्मरूपसे प्रवेश करके भरणकरता है अतः वह अविनाशी और ईश्वर है उक्त स्वभाव होनेसे क्षरपदवाच्य पुरुष और अक्षर शब्दवाच्य मुक्तको भी मैंने अतिक्रमण किया इसीलिये लोक और वेदमें मैं पुरुषोत्तम शब्दसे प्रसिद्ध हूँ ॥ २४ ॥ यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥” इति ॥ २५ ॥ जो मुझे उक्त प्रकारसे पुरुषोत्तम हे भारत ! जानता है यह भगवत् प्राप्तिके सम्पूर्ण उपायोंको जाननेवाला सब प्रकार मेरी भक्ति करता है । हे निष्पाप ! इस प्रकार पर- मपुरुषोत्तमतत्त्व प्रतिपादक अतिगुह्यतम शास्त्र मैंने तुमसे कहा इसको जानकर जीव ज्ञानी और कृतकृत्य होते हैं ॥ २५ ॥ महावराहेऽपि- “मुख्यञ्च सर्ववेदानां तात्पर्य्यं श्रीपतौ परे । उत्कर्षे तु तदन्यत्र तात्पर्य्यं स्यादवान्तरम् ॥” इति ॥ २६ ॥ वाराहपुराणमेंभी कहा है सम्पूर्ण वेदोंका श्रीहरिके परम उत्कर्षबोधनमें मुख्य तात्पर्य है और अन्यत्र गौण तात्पर्य है ॥ २६ ॥ युक्तं च विष्णोः सर्वोत्कर्षे महातात्पर्य्यम् । मोक्षो हि सर्वपुरुषा- र्थोत्तमः धर्मार्थकामास्त्वनित्याः । मोक्ष एव नित्यः । ' तस्मा- न्नित्यं तदर्थाय यतेत मतिमान्नरः' इति भाल्लवेयश्रुते । मोक्षश्च विष्णुप्रसादमन्तरेण न लभ्यते । 'यस्य प्रसादात् परमा यत्स्व- रूपात् संसारान्मुच्यते नावरेसुरा नाराधयन्तोऽसौ परमो विचि- न्त्यो मुमुक्षुभिः कर्मपाशादमुष्मात् ' इति नारायणश्रुते । “तस्मिन् प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं सर्वार्थकामैरलमल्पकारते । समाश्रिताद्ब्रह्मतरोरनन्तान्निःसंशयं मुक्तिफलं प्रयाति ॥” इति विष्णुपुराणोक्तेश्च ॥ २७ ॥ विष्णुके विषयमें सर्वोत्कर्षबोधन युक्तभी है क्योंकि सम्पूर्ण पुरुषार्थोंमें मोक्षही उत्तम पुरुषार्थ है धर्म अर्थ काम अनित्य हैं केवल मोक्षही नित्य है इस मोक्षके-

( १३६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ-

इसलिये बुद्धिमान् पुरुष नित्य यत्न करे ऐसी श्रुति है मोक्ष श्रीविष्णुकी प्रसन्नता बिना नहीं होता है जिनके प्रसादसे परम ( मोक्ष ) होना है अन्य देवताओके आ- राधन करनेवाले मुमुक्षु कर्मबन्धनसे परमपदके चिन्तन करने योग्यभी नहीं होते हैं इत्यादि श्रुति तथा हरि प्रसन्न होनेसे दुर्लभ कुछभी नहीं अर्थ कामकी बात ही क्या है वह अतीव तुच्छ है अनन्त ब्रह्मरूपी वृक्षके आश्रयण करनेसे अवश्य मोक्ष- फलको प्राप्त होते हैं इत्यादि विष्णुपुराणवचनभी हैं ॥ २७ ॥ प्रसादश्च गुणोत्कर्षज्ञानादेव नाभेदज्ञानादित्युक्तम् । न च तत्त्व- मस्यादितादात्म्यव्याकोप श्रुतितात्पर्यापरिज्ञानविजृम्भ- णात् । “आह नित्यपरोक्षं तु तच्छब्दो ह्यविशेषित । त्वंशब्द श्चापरोक्षार्थं तयोरैक्यं कथं भवेत् ॥ आदित्यो यूप इतिवत् सा दृश्यार्था तु सा श्रुति ॥” इति ॥ २८ ॥ प्रसन्नता गुणका उत्कर्षके ज्ञानसे होती है अभेद ज्ञानसे नहीं होती यदि कहो तत्त्वमस्यादि श्रुतिका विरोध होगा यहभी तात्पर्यका अज्ञानमूलक है नित्य ओर परोक्ष वस्तुको तत् शब्द बोधन करता है त्वंपद प्रत्यक्षवस्तुको बोधन करता है अत अत्यन्त विरुद्ध होनेसे दोनोंका अभेद कैस होसकता है ? अत यूप ओर आदित्यके अभेद बोधक वाक्यकी समान मोक्षदशामें कल्याणगुणादि समान होनेसे सादृश्यार्थक है ॥ २८ ॥ तथाच परमा श्रुतिः-“जीवस्य परमैक्यं च बुद्धिसारूप्यमेव वा। एकस्थानानिवेशो वा व्यक्तिस्थानमपेक्ष्य वा ॥ न स्वरूपैकता तस्य मुक्तस्यापि विरूपतः । स्वातन्त्र्यपूर्णतेऽल्पत्वपारतन्त्र्ये विरूपता ॥” इति ॥ २९ ॥ श्रुतिभी कहती है-जीवको परमात्माके साथ ऐक्य बोधकवाक्य सर्वज्ञत्वादि ज्ञानके समान होनेसे ओर शरीरादिरूप एक स्थानवृत्ति होनेसे संगत होती है स्वरू- पको एक मानकर नहीं होता है कारण मुक्तोंकेभी स्वरूपभेद “सदा पश्यन्ति सूरय ” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित है । स्वतन्त्रत्व, और व्यापकत्वादि ईश्वरका स्वरूप और अणुत्व परतन्त्रत्वादि जीवका स्वरूप है ॥ २९ ॥ अथवा तत्त्वमसीत्यत्र स एवात्मा स्वातन्त्र्यादिगुणोपेतत्वात् अतत्त्वमसि त्वं तन्न भवसि तद्रहितत्वादित्येकत्वमतिशयेन

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( १३७ ) निराकृतम् । तदाह-‘अतत्त्वमिति वा छेदस्तैनैक्यं सुनिराकृ- तम् ॥' इति ॥ ३० ॥ अथवा अतत्त्वमसि ऐसा पदच्छेद कर ईश्वर स्वतन्त्रत्वादिरूप होनेसे तुम ईश्वर नहीं हो सकते एवञ्च अभेदका अत्यन्त निराकरण होता है ऐसाभी अर्थ वर्णन करते हैं अतएव कहा है अतत्त्व ऐसा पदच्छेद करनेसे अभेदका निरास होता है ॥ ३० ॥ तत्तस्मात् दृष्टान्तनवकेऽपि स यथा शकुनि सूत्रेण बद्ध इत्यादिना भेद एव दृष्टान्ताभिधानाय अयमभेदोपदेश इति तत्त्ववादरह- स्यम् । तथाच महोपनिषत्-“यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्ष- रसा यथा । यथा नद्य समुद्राश्च शुद्धोदलवणौ यथा ॥ चौराप- हार्यौ च यथा यथा पुंविषयावपि । तथा जीवेश्वरौ भिन्नौ सर्वदैव विलक्षणौ ॥ ३१ ॥ नवों दृष्टान्तोंमे भेदहीका प्रतिपादन होता है यह सब दृष्टान्त छान्दोग्योपनिषदके षष्ठप्रपाठकमे हैं जिस प्रकार पक्षी और उसका बन्धन सूत्र परस्पर भिन्न हैं नाना- प्रकार वृक्षोंका रस परस्पर भिन्न है नदी और समुद्र शुद्ध जल और खार जल भिन्न हैं चोर और चोरीकी वस्तु एव पुरुष और विषय भिन्न होते हैं तिसी प्रकार जीव और ईश्वर परस्पर विलक्षण स्वरूप और स्वभाव होनेमे सदा भिन्न हैं ॥ ३१ ॥ तथाप सूक्ष्मरूपत्वान्न जीवात् परमो हरि । भेदेन मन्ददृ- ष्टीनां दृश्यते प्रेरकोऽपि सन् ॥ वैलक्षण्यं तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते बध्यतेऽन्यथा ॥” इति ॥ ३२ ॥ ऐसे होनेपरभी सूक्ष्म होनेसे मन्दगतियोंको सर्व प्रेरक परमात्मा जीवसे भिन्न होकर गृहीत नहीं होते दोनोंका वैलक्षण्य ज्ञानसे मुक्त होता है अन्यथा बद्ध होता है ॥ ३२ ॥ “ब्रह्मा शिव सुराद्याश्च शरीरक्षरणात् क्षराः । लक्ष्मीरक्षरदेह- त्वादक्षरात् परो हरि ॥ ३३ ॥ ब्रह्मा, शिव, सुर, सब शरीरका क्षरण होनेसे क्षर कहाते हैं नित्य शरीर होनेमे लक्ष्मी अक्षर हैं और हरि इनमेंभी परे हैं ॥ ३३ ॥

( १३८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- स्वातन्त्र्यशक्तिविज्ञानसुखाद्यैरखिलैर्गुणै ॥ नि सीमत्वेन ते सर्वे तद्वशा सर्वदेवता ॥” इति ॥ “विष्णुं सर्वगुणैः पूर्ण ज्ञात्वा संसा- र्व्वर्जित । निर्दुःखानन्दभुङ्नित्यं तत्समीपे स मोदते ॥ मुक्ता- नां चाश्रयो विष्णुरधिकाधिपतिस्तथा । तद्वशा एव ते सर्वे सर्व- दैव स ईश्वर ॥” इति च ॥ ३४ ॥ स्वातन्त्र्य, ज्ञान, शक्ति, सुखादि अनेक गुणो करके निस्सीम होनेसे सम्पूर्ण देवता श्रीहरिके आधीन है सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त विष्णुकी उपासनाद्वारा जो संसारसे मुक्त हो गया है वह दु खशून्य परमानन्दसे युक्त होकर भगवत्समीपमें आनन्दको प्राप्त होता है विष्णु मुक्ताक आश्रय और अधिक ( ब्रह्मादिक ) के भी आधिपति है अतः सम्पूर्ण देवता उनके आधीन हैं, सदा एक विष्णुही ईश्वर है ॥ ३४ ॥ एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानञ्च प्रधानत्वकारणत्वादिना युज्यते न तु सर्वमिथ्यात्वेन । न हि सत्यज्ञानेन मिथ्याज्ञानं सम्भवति । यथा प्रधानपुरुषाणां ज्ञानाज्ञानाभ्यां ग्रामो ज्ञात अज्ञात इत्ये- वमादिव्यपदेशो दृष्ट एव। यथा च कारणे पितरि ज्ञाते जाना- ॰ त्यस्य पुत्रमिति । अन्यथा 'यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातम्' इत्यत्र एकपिण्डशब्दौ वृथा प्रसज्येयाता मृदा विज्ञातयेत्येतावतैव वाक्यस्य पूर्णत्वात् ॥ ३५ ॥ एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान प्रतिज्ञाभी प्रधानत्व कारणत्वादि धर्मयुक्त होनेसे सङ्गत होती है सर्वमिथ्यात्वमें नहीं होती एक वस्तुके सत्यज्ञानसे अन्यका मिथ्याज्ञान सम्भव नहीं है प्रधानके ज्ञानसे अप्रधान ग्रामादि ज्ञान दृष्ट है जैसे कारणज्ञानसे कार्यज्ञान दृष्ट है तैसे ब्रह्म जगत्का कारण है अतः ब्रह्मज्ञानसे कार्यभूत जगत्का ज्ञान होता है । यदि सर्वका मिथ्यात्व माने तो एक मृत्तिकाके ज्ञानसे कार्यभूत घटशरावादि सब ज्ञात होते हैं इस दृष्टान्तमें एक शब्द और मृत्पिण्डपद व्यर्थ होंगे मृत्तिकाज्ञानसे सब ज्ञात होते हैं इतनेहीसे वाक्य पर्याप्त होता है एव लक्षणादि दोष पूर्व [???] ॥ ३५ ॥ न च वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमित्येतत् कार्यस्य मिथ्यात्वमाचष्टे इत्येष्टव्य वाचारम्भणं विकारो यस्य

[Header] दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १३९ ) तत् अविकृतं नित्य नामधेयं मृत्तिकेत्यादिकमित्येतद्वचनं सत्य- मिति तथ्यस्य स्वीकारात् । अपरथा नामधेयमेवेतिशब्दयो- र्वैय्यर्थं प्रसज्येत अतो न कुत्रापि जगतो मिथ्यात्वसिद्धि । किञ्च प्रपञ्चो मिथ्येत्यत्र मिथ्यात्व तथ्यमतथ्यं वा । प्रथमे सत्याद्वैत- भङ्गप्रसङ्ग । चरमे प्रपञ्चसत्यत्वापातः ॥ ३६ ॥ घटादि विकार और नाम वचनमात्र है ऐसे रहनेमे कार्यको मिथ्यात्वकी आश- ङ्का नही कर सक्ते जिसका विकार वाक् व्यवहारार्थ है अविकृत मृत्तिका इत्यादि नामधेय सत्य है यही अर्थ है अत मिथ्यात्वशङ्काभी नहीं हो सकती अन्यथा नामधेय और इति ये दोनों पद व्यर्थ होंगे अतः कहीं भी जगत्का मिथ्यात्व प्रतिपादन नही है ( और भी ) प्रपञ्चको मिथ्या कहनेवालेके मतम मिथ्यात्व सत्य है या असत्य ! यदि सत्य मानो तो अद्वैतकी हानि होगी क्योंकि ब्रह्म और प्रपञ्च मिथ्या दोनों सत्य हो गये । असत्य मानो तो मिथ्यात्वका असत्यत्व होनेसे प्रपञ्चका सत्यत्व होगा ॥ ३६ ॥ नन्वनित्यत्वं नित्यमनित्यं वा उभयथाप्यनुपपत्तिरित्याक्षेपव- द्वयमपि नित्यसमजातिभेदः स्यात् । तदुक्तं न्यायनिर्वाणवेधसा "नित्यमनित्यभावादनित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसम " इति॥तार्किक- रक्षायाञ्च- धर्मस्य तदतद्रूपविकल्पानुपपत्तित । धर्मिणस्त- द्विशिष्टत्वभङ्गी नित्यसमो भवेत् "॥ इति ॥ अस्या सञ्ज्ञाया उपलक्षणत्वमभिप्रेत्याभिहितं प्रबोधसिद्धौ अन्वर्थित्वात्तूषरञ्ज- कधर्मसमेति । तस्मात् सदुत्तरमेतदिति चेत् ॥ ३७ ॥ यदि कहो अनित्यत्व नित्य है या अनित्य ? दोनों पक्षोंमें अनुपपत्ति होती है अत इस आक्षेपके समान यह भी आक्षेप नित्य सजातीयका एक भेद है अतएव न्यायनिर्णयम कहा है अनित्य स्वभाव होनेसे अनित्यभी अनित्य हो तो नित्य समान होगा । तार्किक रक्षामेभी कहा है अनित्यत्वरूप धर्म्मको नित्यानित्य विकल्पसे धम्मीको अनित्यातारूप धर्मयुक्तत्व असम्भव होनेसे नित्यकी समान होगा इस कारण मिथ्यात्वादि सज्ञा उपलक्षणमात्र हे अतएव प्रबोधसिद्धिमें कहा हे कि अन्वर्थ होनेमे उपरञ्जकमात्र है अत उत्तर समीचीन है ॥ ३७ ॥

( १४० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पूर्णप्रज्ञ- अशिक्षितत्रासनमेतत् दुष्टत्वमूलानिरूपणात् । तद्द्विविधं साधारणमसाधारणञ्च । तत्राद्यं स्वव्याघातकम् । द्वितीयं त्रिविधम् युक्ताङ्गहीनत्वमयुक्ताङ्गाधिकत्वमविषयवृत्तित्वञ्चेति । तत्र साधा- रणमसम्भावितमेव उक्तस्याक्षेपस्य स्वात्मव्यापनानुपलम्भात् । एवमसाधारणमपि घटस्य नास्तितोक्तावस्तित्ववत् प्रकृतेऽप्यु- पपत्तेः । ननु प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वमभ्युपेयते नासत्त्वमिति चेत्त- देतत् सांड्य शिरश्छेदेऽपि शतं न ददाति विंशतिपञ्चकन्तु प्रय- च्छतीति शाकटिकवृत्तान्तमनुहरेत् मिथ्यात्वासत्त्वयो पर्या- यत्वादित्यलमतिप्रपञ्चेन ॥ ३८ ॥ यह अशिक्षितोंको भय दर्शाना है क्योंकि मिथ्या दोषका कारण कुछ नहीं दिखाया दुष्टत्वप्रयोजक दो प्रकार है एक साधारण और दूसरा असाधारण । साधारण स्वव्याघातक होता है । असाधारण तीन प्रकार हैं अपेक्षित अङ्गसे विकल १ अनपेक्षित अङ्गसे युक्त २ अनुपयुक्तस्थलवृत्तित्व ३ उक्त आक्षेप आत्मव्यापी न होनेसे साधारण संभव नहीं एव असाधारणभी असम्भावित हे जिस प्रकार घटका नास्तित्व कहनेसे अस्तित्व सम्भव नहीं । यदि कहो मैने प्रपञ्चको मिथ्यात्व कहा है असत्त्व नहीं कहा यह तो शिरके काटडालने परभी १०० रुपये न दूंगा पाच बी- सीही दूंगा इस प्रकार कहनेवाले मूर्खका अनुकरण करता हे असत्य ओर मिथ्या दोनों पर्याय हैं ॥ ३८ ॥ तत्र ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ इति प्रथमसूत्रस्यायमर्थः । तत्राथशब्दो मङ्गलार्थोऽधिकारानन्तर्यार्थश्च स्वीक्रियते । अत शब्दो हेत्वर्थे । तदुक्तं गारुडे- अथात शब्दपूर्वाणि सूत्राणि निखिलान्यपि । प्रारभेत नियत्यैव तत्किमत्र नियामकम् ॥ कश्चार्थस्तु तयोर्वि- द्वान् कथमुत्तमता तयो । एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् यथा ज्ञास्यामि तत्त्वत ॥ एवमुक्तो नारदेन ब्रह्मा प्रोवाच सत्तम । आनन्त- र्याविकारे च मङ्गलार्थे तथैव च ॥ अथशब्दस्त्वत शब्दो हेत्वर्थे समुदीरित ॥” इति ॥ यतो नारायणप्रसादमन्तरेण न मोक्षो

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १४१ ) लभ्यते प्रसादश्च न ज्ञानमन्तरेण, अतो ब्रह्मजिज्ञासा कर्त्तव्येति सिद्धम् ॥ ३९ ॥ अथात इत्यादि प्रथम सूत्रार्थ निरूपण करते हैं-अथशब्द मङ्गल प्रारम्भ, अधि- कार रूप अर्थत्रयबोधक है और अत पद हेतुबोधक है अतएव गरुडपुराणमे कहा है नियमसे अथ अत शब्दद्वय पूर्वक सम्पूर्ण सूत्रोंका आरम्भ करना इसमें क्या नियामक है दोन। शब्दोंका क्या अर्थ है और दोनों श्रेष्ठ क्यों हैं ? हे ब्रह्मन् ! यह मुझसे कहिये जिससे यथार्थ ज्ञान हो नारदजीके इस प्रकार पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मा- जी ने कहा आनन्तर्य मंगल और अधिकार अर्थमें अथशब्द और अत.शब्द हेतु अर्थमे प्रयुक्त होता है भगवान् नारायणकी कृपाके विना मोक्ष नही होता ज्ञानके विना प्रसन्नताभी नही होती है अतः ब्रह्मजिज्ञासा अवश्य करनी चाहिये ॥ ३९ ॥ जिज्ञास्यब्रह्मणो लक्षणमुक्तं 'जन्माद्यस्य यत ' इति । सृष्टि- स्थित्यादि यतो भवति तद् ब्रह्मेति वाक्यार्थ । तथाच स्कान्दं वच.-' उत्पत्तिस्थितिसंहारा नियतिर्ज्ञानमावृतिः । बन्धमोक्षौ च पुरुषाद्यस्मात् स हरिरेकराट्॥' इति ॥ 'यतो वा इमानि' इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ॥ ४० ॥ द्वितीय सूत्रसे जिज्ञास्य ब्रह्मका लक्षण कहते हैं सृष्टि स्थिति लय का जो कारण है वही ब्रह्म है । स्कन्दपुराणमेंभी कहा है उत्पत्ति और स्थिति आदि जिनसे होते हैं वह स्वय प्रकाशमान हरि हैं ॥ ४० ॥ तत्र प्रमाणमप्युक्त 'शास्त्रयोनित्वात्'इति । 'नावेदविन्मनुते तं बृह- न्तं तं त्वौपनिषदम्' इत्यादिश्रुतिभ्य तस्यानुमानिकत्वं निराक्रि- यते । न चानुमानस्य स्वातन्त्र्येण प्रामाण्यमस्ति । तदुक्तं कौर्मे-“श्रुतिसाहाय्यरहितमनुमानं न कुत्रचित् । निश्चयात् साध- येदर्थं प्रमाणान्तरमेव च ॥ श्रुतिस्मृतिसहायं यत् प्रमाणान्त- रमुत्तमम् । प्रमाणपदवी गच्छेदत्रात्र कार्या विचारणा" इति ॥४१॥ तृतीय सूत्रसे ब्रह्ममें प्रमाण दिखाते हैं जो वेदवेत्ता नही वह ब्रह्मको नहीं जान सकते उपनिषत्प्रतिपाद्य पुरुषको जानना चाहता हूं इत्यादि श्रुतियोंसे अनुमान विषयत्वनिराकरण कर केवल शब्दप्रतिपाद्यत्व प्रतिपादन करते हैं अनुमान स्वतन्त्र-

७. प्रत्यभिज्ञा दर्शन (काश्मीर शैव मत)

( १४२ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- प्रमाण नहीं अतएव कूर्मपुराणम कहा हे कि, श्रुतिके सहायताके विना केवल अनुमान कही भी वास्तविक अर्थका साधक नहीं हे श्रुतिके सहित प्रमाणान्तर उत्तम प्रमाण पदवीको प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४१ ॥ शास्त्रस्वरूपमुक्तं स्कान्दे-“ऋग्यजुः सामाथर्वाश्च भारतं पाञ्च- रात्रकम् । मूलरामायणञ्चैव शास्त्रमित्यभिधीयते ॥ यच्चानुकू- लने तस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम् । अतोऽन्यो ग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत् ॥ ” इति ॥ ४२ ॥ शास्त्रका स्वरूप स्कन्दपुराणमें कहा हे ऋक्, यजु, साम, अथर्व, भारत, पाञ्चरात्र, और मूलरामायण यही शास्त्र है इससे अन्य ग्रन्थ प्रपञ्च और कुमार्ग है शास्त्र नहीं ॥ ४२ ॥ तदनेनानन्यलभ्यः शास्त्रार्थ इति न्यायेन भेदस्य प्राप्तत्वेन तत्र न तात्पर्यं किन्त्वद्वैत एव वेदवाक्यानां तात्पर्यमिति अद्वैत- प्रत्याशा प्रतिक्षिप्ता । अनुमानादीश्वरस्य सिद्धाभावेन तद्भेद- स्यापि ततः सिद्ध्यभावात् । तस्मान्न भेदानुवादकत्वमिति- तत्परत्वमवगम्यते । अतएवोक्तम्-सदागमैकविज्ञेयं समतीत- क्षराक्षरम् । नारायणं सदा वन्दे निर्दोषाशेषसद्गुणम्॥’ इति॥४३॥ अतः प्रमाणान्तरसे जो लभ्य नहीं हो वही शब्दका अर्थ हे भेद प्रत्यक्ष सिद्ध होनेसे भेदके बोधनमें वेदका तात्पर्य नहीं हो सकता किन्तु अप्राप्त अद्वैतमे वेदान्त वाक्योंका तात्पर्य है इत्यादि अद्वैतसाधनयुक्ति भी निरस्त होगई । अनुमानद्वारा ईश्वरसिद्धि न होनेसे ईश्वरके साथ अभेदभी अनुमान साध्य नहीं हो सकता अतएव शास्त्रैकगम्य बद्ध मुक्त पुरुषोंसे पर, हेयगुणरहित, कल्याणगुणालय हरिकी वन्दना करता हू इत्यादि अभियुक्तोक्ति सङ्गत होती है ॥ ४३ ॥ शास्त्रस्य तत्र प्रामाण्यमुपपादितं ‘तत्तु समन्वयात्’ इति । सम- न्वय उपक्रमादिलिङ्गम् । उक्तं बृहत्संहितायाम्--“उपक्रमोपसं- हाराभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनि- र्णय ॥”इति । एवं वेदान्ततात्पर्यवशात् तदेव ब्रह्म शास्त्रगम्य- मित्युकतं भवति । दिङ्मात्रमत्र प्रादर्शि शिष्टमानन्दतीर्थभाष्य

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १४३ ) व्याख्यानादौ द्रष्टव्यं ग्रन्थबहुत्वाभियोपरम्यत इति । एतच्च रहस्यं पूर्णप्रज्ञेन मध्यमन्दिरेण वायोस्तदीयावतारम्मन्येन निरूपितामिति ॥ ४४ ॥ चतुर्थ सूत्रसे प्रामाण्य प्रतिपादन किया, उपक्रम, उपसहार, अभ्यास, अपूर्वता फल, अर्थवाद, उपपत्ति, इति षड्विधलिङ्ग समन्वय है । यही लिङ्ग तात्पर्य निर्मा- यक होते हैं एवं वेदान्ततात्पर्य वश ब्रह्म शास्त्रगम्य है यह सिद्ध हुआ अधिक आनन्दतीर्थभाष्यसे जानना । यह सब रहस्य अपनेको वायुका अवतार माननेवाले आनन्दतीर्थने निरूपण किये हैं ॥ ४४ ॥ 'प्रथमस्तु हनूमान् स्यात् द्वितीयो भीम एव च । पूर्णप्रज्ञस्तृ- तीयश्च भगवत्कार्यसाधकः' इति ॥ एतदेवाभिप्रेत्य तत्र तत्र ग्रन्थसमाप्ताविदं पद्यं लिख्यते । यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने दिव्यानि रूपाण्यलं बट्‌तदर्शतमित्यमेतदखिलं वेदस्य गर्भं महत्। वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुर्मध्वो- यस्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृत केशवे ॥ एतत्पदार्थस्तु वळित्थातद्वपुषेऽधायि दर्शते देवस्य भर्ग सहसो यतो- जनीत्यादिश्रुतिपर्यालोचनयावगम्यत इति । तस्मात् सर्वस्य शास्त्रस्य विष्णुत्तत्त्वं सर्वोत्तममित्यत्र तात्पर्यमिति सर्वं निरवद्यम् ॥ ४५ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे पूर्णप्रज्ञदर्शनं समाप्तम् ॥ भगवत्कार्य साधनेके लिये पहिले हनुमान्, द्वितीय, भीम, तृतीय पूर्णप्रज्ञ हुए इसी अभिप्रायसे मध्वोने ग्रन्थसमाप्तिमें निम्न श्लोक लिखे हैं जिन वायुके तीन दिव्यरूप पर्याप्त रूपसे “ बट्‌तद्दर्शत ” इत्यादि वेदवचनमें कहे हैं उनमेंसे प्रथम “ रामवचोनय ' अर्थात् रघुनाथजीके आज्ञाकारी हनुमान्‌जी प्रथम रूप, कौरवसेनाके विनाश करनेवाले भीम द्वितीय रूप, और मध्वाचार्य तृतीय रूप है । जिन्होंने केशवभगवान्‌के विषयमें ग्रन्थ निर्माण किया है इस विषयमे वि- शेष जिज्ञासु ऋग्वेदान्तर्गत उक्त श्रुतिसे जिज्ञासा शान्ति करें । एवञ्च विष्णु तत्त्वही सर्वोत्कृष्ट है इसीमे सम्पूर्ण वेदोंका तात्पर्य है ॥ ४५ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहमें पूर्णप्रज्ञदर्शन समाप्त ।

( १४४ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [पाशुपत- अथ नकुलीशपाशुपतदर्शनम् ॥ ६ ॥ तदेतद्वैष्णवमतं दासत्वादिपदवेदनीय परतन्त्रदुःखावहत्वान्न दुःसान्तादीप्सितास्पदमित्यरोचयमानाः पारमैश्वर्यं कामय- मानाः पराभिहता मुक्ता न भवन्ति परतन्त्रत्वात् पारमैश्वर्य- रहितत्वादस्मदादिवत् मुक्तात्मानश्च परमेश्वरगुणसम्बन्धिन पुरुषत्वे सति समस्तदुःखबीजविधुरत्वात् परमेश्वरवदि- त्याद्यनुमानं प्रमाणं प्रतिपद्यमानाः केचन माहेश्वराः परमपु- रुषार्थसाधनपञ्चार्थप्रपञ्चनपरं पाशुपतशास्त्रमाश्रयन्ते ॥ १ ॥ पूर्वोक्त दासत्वादिपदबोध्य वैष्णवमत परतन्त्रत्वादि दुःख बहुल होनेसे सदा दुःखरूपही बना रहेगा अतः निरवधिक सुखाभिलाषियोंके आश्रयणको अयोग्य माननेवाले परमैश्वर्यको चाहनेवाले परतन्त्र परमैश्वर्य शून्य होनेसे मुक्त नहीं हो सकता जिस प्रकार अस्मदादि बद्ध संसारी मुक्त नहीं है। समस्त दुःखबीजरहित होनेसे मुक्तात्मा परमेश्वर गुण सम्बन्धी है इत्यादि अनुमान प्रमाणको उपन्यास करते हुए कोई २ माहेश्वर (शैव) परम पुरुषार्थसाधक पञ्चार्थप्रपञ्चक पाशुपत- मतका अवलम्ब करते हैं ॥ १ ॥ तत्रेदमादिसूत्रम्-- ‘अथातः पशुपतेः पाशुपतयोगविधिं व्याख्यास्याम’ इति । अस्यार्थ -अत्राथशब्दः पूर्वप्रकृतापेक्षः । पूर्वप्रकृतश्च गुरुं प्रति शिष्यस्य प्रश्नः । गुरुस्वरूपं गणकारिकायां निरूपितम् । “पञ्चकास्त्वष्ट विज्ञेया गणश्चैकात्रिकात्मकः । वेत्ता नवगणस्या- स्य संस्कर्त्ता गुरुरुच्यते” इति। लाभा मला उपायाश्च देशावस्था विशुद्धय । दीक्षाकारित्वलान्यौ पञ्चकास्त्रीणि वृत्तय ॥” इति । तिस्रो वृत्तय इति प्रयोक्तव्ये त्रीणि वृत्तय इति छान्दस प्रयोग । तत्र विधीयमानमुपायफलं लाभ ज्ञानतपोदेवनित्यत्वस्थिति- शुद्धिभेदात् पञ्चविध । तदाह हरदत्ताचार्य्य -'ज्ञानं तपोऽथ नित्यत्वं स्थिति शुद्धिश्च पञ्चमम्' इति ॥ २ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १४५ ) प्रथम सूत्रका अर्थ यह है कि अथशब्द पूर्वप्रकृत शिष्यप्रश्नानन्तर्य्यका बोधक है । गुरुका स्वरूप गणकारिकामें इस प्रकार लिखा है आठ पञ्चक और त्रिकरूप एक गण इस प्रकार नौ गणोंके वेत्ता सस्कार करनेवाले गुरु होते हैं । लाभ, मल, उपाय, देश, अवस्था, विशुद्धि, दीक्षाकारी, बल यह आठ पञ्चक हैं । इनमें एक एकमें पञ्च २ भेद होनेसे पञ्चक कहाते हैं तीन वृत्ति है यद्यपि विशेष्यविशेषणका समान लिङ्ग वचन नियम होनेसे 'तिस्रो वृत्तयः' ऐसा कहना उचित था तथापि छान्दस होनेसे लिङ्गविपर्यय करके त्रीणि ऐसा नपुंसक लिङ्ग होगया । अब क्रमसे एक एककी व्याख्या और भेद कहते हैं । क्रियमाण उपायका फल लाभ है उसको ज्ञान, तप, नित्यत्व, स्थिति, शुद्धिभेदसे हरदत्ताचार्यने पाँच प्रकार कहाहै ॥ २ ॥ आत्माश्रितो दुष्टभावो मलः । स मिथ्याज्ञानादिभेदात् पञ्च- विध । तदप्याह—“मिथ्याज्ञानमधर्मश्च सक्तिर्हेतुश्च्युतिस्तथा। पशुत्वमूलं पञ्चैते तन्त्रे हेया विविक्षितः ॥” इति ॥ साधकस्य शुद्धिहेतुरुपायः वासचर्यादिभेदात् पञ्चविधः । तदप्याह- “वासचर्या जपो ध्यानं सदा रुद्रस्मृतिस्तथा । प्रतिपत्तिश्च लाभानामुपाया पञ्च निश्चिता ॥” इति ॥ ३ ॥ आत्मवृत्तिदुष्टभाव मल है वहभी मिथ्याज्ञान, अधर्म्म, शक्ति, हेतु, च्युति भेदसे पाँच पशुत्वका मूल है अत विवेकद्वीरा यह सब हेय है । साधककी शुद्धिके हेतु उपायभी वासचर्या, जप, ध्यान निरन्तर रुद्रका स्मरण, लाभकी प्रतिपत्तिभेदसे पाँच प्रकार है ॥ ३ ॥ येनार्थानुसन्धानपूर्वकं ज्ञानतपोवृद्धिं प्राप्नोति स देशो गुरुज- नादिः । यदाह—“गुरुर्जनो गुहादेशः श्मशानं रुद्र एव च” इति॥ आलाभप्राप्तेरेकत आदौ यदवस्थानं सावस्था व्यक्तादिविशे- षेण विशिष्टा । तदुक्तम्-‘व्यक्ताव्यक्तजपादानं निष्ठा चैव हि पञ्चमम्, इति ॥ मिथ्याज्ञानादीनामत्यन्तव्यपोहो विशुद्धिः । सा प्रतियोगिभेदात् पञ्चविधा । तदुक्तम्-‘अज्ञानस्याप्यस- ङ्गस्य हानि सङ्करस्य च । च्युतिर्हानिः पशुत्वस्य शुद्धिः पञ्चविधा स्मृता’ इति॥ दीक्षाकारिपञ्चकं चोक्तम्-‘द्रव्यं कालः

( १४८ )' सर्वदर्शनसंग्रह' । [ पाशुपत- यदस्वतन्त्रं सर्वं कार्यं त्रिविधं विद्या कला पशुश्चेति । तत्र पशुगुणो विद्या । सापि द्विविधा बोधाबोधस्वभावभेदात् । बोधस्वभावा विवेकाविवेकप्रवृत्तिभेदात् द्विविधा । तत्र या विवेकप्रवृत्तिः प्रमाणमात्रव्यङ्ग्या चित्तेत्युच्यते । चित्तेन हि सर्व प्राणी बाह्यार्थात्मकप्रकाशानुगृहीतं सामान्येन विवेचित- मविवेचितं चार्थं चेतयते इति । पश्वर्थधर्माधर्मिका पुनरबोधा- त्मिका विद्या स्वशास्त्रं येनोच्यते चेतनपरतन्त्रत्वे मत्यचेतना कला ॥ ८ ॥ विद्या कला और पशु भेदसे अस्वतन्त्र कार्य त्रिविध है । पशुगुण विद्या है । वह बोध और अबोधस्वभाव भेदसे दो प्रकार है । विवेक और अविवेक प्रवृत्ति- भेदसे बोधस्वभावभी द्विविध है । प्रमाणगम्य विवेक प्रवृत्तिका नाम चित्त है समस्त प्राणी चित्त हीसे बाह्यार्थ प्रकाशके सहकारी होकर विवेक युक्त और अविवेक युक्त अर्थका ज्ञान करते हैं । पशुपदार्थ धर्माधर्मरूप अबोधात्मक विद्या है । जिसको पाशुपतशास्त्र कहते हैं चेतनके परतन्त्र और स्वयं अचेतन हो वह कला है ॥ ८ ॥ सापि द्विविधा कार्याख्या कारणाख्या चेति । तत्र कार्या- ख्या दशविधा । पृथिव्यादीनि पञ्च तत्त्वानि रूपादय पञ्च गुणाश्चेति । कारणाख्या त्रयोदशविधा । ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं कर्मेन्द्रियपञ्चकम् अध्यवसायाभिमानसङ्कल्पाभिधवृत्तिभेदात् बुद्ध्यहङ्कारमनोलक्षणमन्तःकरणत्रयञ्चेति । पशुत्वसम्बन्धी पशुः । सोऽपि द्विविध साञ्जनो निरञ्जनश्चेति । तत्र साञ्जन- शरीरेन्द्रियसम्बन्धी, निरञ्जनस्तु तद्रहित । तत्रपञ्चस्तु पञ्चार्थभाष्यदीपिकादौ द्रष्टव्य ॥ ९ ॥ कार्य और कारण भेदसे कला द्विविध है । पृथिव्यादि पञ्च भूत रूपादि पाच गुण मिलकर कार्य दशविध है । कारणभी पाच ज्ञानेन्द्रिय पाच कर्मेन्द्रिय अध्यवसाय (निश्चयात्मक) बुद्धि और अभिमानरूप अहङ्कार सङ्कल्पात्मक मनोरूप तीन

जन्त रूगण मिलाकर तेरह प्रकार है। पशुत्वका सम्बन्धी पशुभी साञ्जन और निरञ्जन भेदसे द्विविध है। शरीर और इन्द्रियसे युक्त साञ्जन ओर शरीरैन्द्रियरहित निरञ्जन है। इसका विस्तार पञ्चार्थभाष्यदीपिकासे जान लेना ॥ ९ ॥ समस्तसृष्टिसंहारानुग्रहकारि कारणं तस्यैकस्यापि गुणकर्मभे- दापेक्षया विभाग उक्त पति साद्य इत्यादिना । तत्र पतित्वं निरतिशयदृक्क्रियाशक्तिमत्त्वं तेनैश्वर्येण नित्यसम्बन्धित्वम् आद्यत्वमनागन्तुकैश्वर्यसम्बन्धित्वम् इत्यादर्शकारादिभि- स्तीर्थकरैर्निरूपितम् ॥ १० ॥ समस्त सृष्टि और संहारका अनुग्राहक कारण है वह यद्यपि एक है तथापि गुण और कर्मके भेदसे उसका भेद 'पति साद्य.' इत्यादि पद्यमें वर्णन किया है। निर- तिशय दर्शनक्रियाशक्तिमत्त्व पशुत्व है उसको ऐश्वर्यके साथ नित्यसम्बन्धित्व आद्यत्व और अनागंतुक ऐश्वर्यवत्त्व आदर्शादिकारिकामें तीर्थंकरोने कहा है ॥ १० ॥ चित्तद्वारेणात्मेश्वरसम्बन्धो योग । स च द्विविधः क्रियालक्षणः क्रियोपरमलक्षणश्चेति । तत्र जप्यध्यानादिरूपः क्रियालक्षणः । क्रियोपरमलक्षणस्तु संविद्वृत्यादिसंज्ञित धर्मार्थसाधकव्या- पारो विधि । स च द्विविध प्रधानभूतो गुणभूतश्च । तत्र प्रधानभूत साक्षाद्धर्महेतुः चर्या सा द्विविधा व्रतं द्वाराणि चेति । तत्र भस्मस्नानशय्योपहारजपप्रदक्षिणानि व्रतम् । तदुक्तं भगवता नकुलीशेन । भस्मना त्रिपवणं स्नायीत भस्मान शयीतेति ॥ ११ ॥ चित्तद्वारा आत्मा और ईश्वरका सम्बन्ध योग है। वह क्रियालक्षण और क्रियो- परमलक्षण भेदसे योग द्विविध है। जप ध्यानादिरूप क्रियालक्षण है और संवित् गत्यादिरूप दूसरा है। धर्मार्थ साधक व्यापार विधि है। वहभी प्रधान और गौण भेदसे दो प्रकार है। साक्षात् धर्मसाधक चर्या प्रथम है सोभी व्रत और द्वारभेदसे दो प्रकार है। भस्मस्नान, शय्या, उपहार, जप, और प्रदक्षिणा व्रत है। त्रिकाल भस्म स्नान और भस्ममें शयन करे इत्यादि नकुलीशनेभी कहा है ॥ ११ ॥