भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १३६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ-

इसलिये बुद्धिमान् पुरुष नित्य यत्न करे ऐसी श्रुति है मोक्ष श्रीविष्णुकी प्रसन्नता बिना नहीं होता है जिनके प्रसादसे परम ( मोक्ष ) होना है अन्य देवताओके आ- राधन करनेवाले मुमुक्षु कर्मबन्धनसे परमपदके चिन्तन करने योग्यभी नहीं होते हैं इत्यादि श्रुति तथा हरि प्रसन्न होनेसे दुर्लभ कुछभी नहीं अर्थ कामकी बात ही क्या है वह अतीव तुच्छ है अनन्त ब्रह्मरूपी वृक्षके आश्रयण करनेसे अवश्य मोक्ष- फलको प्राप्त होते हैं इत्यादि विष्णुपुराणवचनभी हैं ॥ २७ ॥ प्रसादश्च गुणोत्कर्षज्ञानादेव नाभेदज्ञानादित्युक्तम् । न च तत्त्व- मस्यादितादात्म्यव्याकोप श्रुतितात्पर्यापरिज्ञानविजृम्भ- णात् । “आह नित्यपरोक्षं तु तच्छब्दो ह्यविशेषित । त्वंशब्द श्चापरोक्षार्थं तयोरैक्यं कथं भवेत् ॥ आदित्यो यूप इतिवत् सा दृश्यार्था तु सा श्रुति ॥” इति ॥ २८ ॥ प्रसन्नता गुणका उत्कर्षके ज्ञानसे होती है अभेद ज्ञानसे नहीं होती यदि कहो तत्त्वमस्यादि श्रुतिका विरोध होगा यहभी तात्पर्यका अज्ञानमूलक है नित्य ओर परोक्ष वस्तुको तत् शब्द बोधन करता है त्वंपद प्रत्यक्षवस्तुको बोधन करता है अत अत्यन्त विरुद्ध होनेसे दोनोंका अभेद कैस होसकता है ? अत यूप ओर आदित्यके अभेद बोधक वाक्यकी समान मोक्षदशामें कल्याणगुणादि समान होनेसे सादृश्यार्थक है ॥ २८ ॥ तथाच परमा श्रुतिः-“जीवस्य परमैक्यं च बुद्धिसारूप्यमेव वा। एकस्थानानिवेशो वा व्यक्तिस्थानमपेक्ष्य वा ॥ न स्वरूपैकता तस्य मुक्तस्यापि विरूपतः । स्वातन्त्र्यपूर्णतेऽल्पत्वपारतन्त्र्ये विरूपता ॥” इति ॥ २९ ॥ श्रुतिभी कहती है-जीवको परमात्माके साथ ऐक्य बोधकवाक्य सर्वज्ञत्वादि ज्ञानके समान होनेसे ओर शरीरादिरूप एक स्थानवृत्ति होनेसे संगत होती है स्वरू- पको एक मानकर नहीं होता है कारण मुक्तोंकेभी स्वरूपभेद “सदा पश्यन्ति सूरय ” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित है । स्वतन्त्रत्व, और व्यापकत्वादि ईश्वरका स्वरूप और अणुत्व परतन्त्रत्वादि जीवका स्वरूप है ॥ २९ ॥ अथवा तत्त्वमसीत्यत्र स एवात्मा स्वातन्त्र्यादिगुणोपेतत्वात् अतत्त्वमसि त्वं तन्न भवसि तद्रहितत्वादित्येकत्वमतिशयेन