भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( १३७ ) निराकृतम् । तदाह-‘अतत्त्वमिति वा छेदस्तैनैक्यं सुनिराकृ- तम् ॥' इति ॥ ३० ॥ अथवा अतत्त्वमसि ऐसा पदच्छेद कर ईश्वर स्वतन्त्रत्वादिरूप होनेसे तुम ईश्वर नहीं हो सकते एवञ्च अभेदका अत्यन्त निराकरण होता है ऐसाभी अर्थ वर्णन करते हैं अतएव कहा है अतत्त्व ऐसा पदच्छेद करनेसे अभेदका निरास होता है ॥ ३० ॥ तत्तस्मात् दृष्टान्तनवकेऽपि स यथा शकुनि सूत्रेण बद्ध इत्यादिना भेद एव दृष्टान्ताभिधानाय अयमभेदोपदेश इति तत्त्ववादरह- स्यम् । तथाच महोपनिषत्-“यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्ष- रसा यथा । यथा नद्य समुद्राश्च शुद्धोदलवणौ यथा ॥ चौराप- हार्यौ च यथा यथा पुंविषयावपि । तथा जीवेश्वरौ भिन्नौ सर्वदैव विलक्षणौ ॥ ३१ ॥ नवों दृष्टान्तोंमे भेदहीका प्रतिपादन होता है यह सब दृष्टान्त छान्दोग्योपनिषदके षष्ठप्रपाठकमे हैं जिस प्रकार पक्षी और उसका बन्धन सूत्र परस्पर भिन्न हैं नाना- प्रकार वृक्षोंका रस परस्पर भिन्न है नदी और समुद्र शुद्ध जल और खार जल भिन्न हैं चोर और चोरीकी वस्तु एव पुरुष और विषय भिन्न होते हैं तिसी प्रकार जीव और ईश्वर परस्पर विलक्षण स्वरूप और स्वभाव होनेमे सदा भिन्न हैं ॥ ३१ ॥ तथाप सूक्ष्मरूपत्वान्न जीवात् परमो हरि । भेदेन मन्ददृ- ष्टीनां दृश्यते प्रेरकोऽपि सन् ॥ वैलक्षण्यं तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते बध्यतेऽन्यथा ॥” इति ॥ ३२ ॥ ऐसे होनेपरभी सूक्ष्म होनेसे मन्दगतियोंको सर्व प्रेरक परमात्मा जीवसे भिन्न होकर गृहीत नहीं होते दोनोंका वैलक्षण्य ज्ञानसे मुक्त होता है अन्यथा बद्ध होता है ॥ ३२ ॥ “ब्रह्मा शिव सुराद्याश्च शरीरक्षरणात् क्षराः । लक्ष्मीरक्षरदेह- त्वादक्षरात् परो हरि ॥ ३३ ॥ ब्रह्मा, शिव, सुर, सब शरीरका क्षरण होनेसे क्षर कहाते हैं नित्य शरीर होनेमे लक्ष्मी अक्षर हैं और हरि इनमेंभी परे हैं ॥ ३३ ॥