सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
( १३६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ-
इसलिये बुद्धिमान् पुरुष नित्य यत्न करे ऐसी श्रुति है मोक्ष श्रीविष्णुकी प्रसन्नता बिना नहीं होता है जिनके प्रसादसे परम ( मोक्ष ) होना है अन्य देवताओके आ- राधन करनेवाले मुमुक्षु कर्मबन्धनसे परमपदके चिन्तन करने योग्यभी नहीं होते हैं इत्यादि श्रुति तथा हरि प्रसन्न होनेसे दुर्लभ कुछभी नहीं अर्थ कामकी बात ही क्या है वह अतीव तुच्छ है अनन्त ब्रह्मरूपी वृक्षके आश्रयण करनेसे अवश्य मोक्ष- फलको प्राप्त होते हैं इत्यादि विष्णुपुराणवचनभी हैं ॥ २७ ॥ प्रसादश्च गुणोत्कर्षज्ञानादेव नाभेदज्ञानादित्युक्तम् । न च तत्त्व- मस्यादितादात्म्यव्याकोप श्रुतितात्पर्यापरिज्ञानविजृम्भ- णात् । “आह नित्यपरोक्षं तु तच्छब्दो ह्यविशेषित । त्वंशब्द श्चापरोक्षार्थं तयोरैक्यं कथं भवेत् ॥ आदित्यो यूप इतिवत् सा दृश्यार्था तु सा श्रुति ॥” इति ॥ २८ ॥ प्रसन्नता गुणका उत्कर्षके ज्ञानसे होती है अभेद ज्ञानसे नहीं होती यदि कहो तत्त्वमस्यादि श्रुतिका विरोध होगा यहभी तात्पर्यका अज्ञानमूलक है नित्य ओर परोक्ष वस्तुको तत् शब्द बोधन करता है त्वंपद प्रत्यक्षवस्तुको बोधन करता है अत अत्यन्त विरुद्ध होनेसे दोनोंका अभेद कैस होसकता है ? अत यूप ओर आदित्यके अभेद बोधक वाक्यकी समान मोक्षदशामें कल्याणगुणादि समान होनेसे सादृश्यार्थक है ॥ २८ ॥ तथाच परमा श्रुतिः-“जीवस्य परमैक्यं च बुद्धिसारूप्यमेव वा। एकस्थानानिवेशो वा व्यक्तिस्थानमपेक्ष्य वा ॥ न स्वरूपैकता तस्य मुक्तस्यापि विरूपतः । स्वातन्त्र्यपूर्णतेऽल्पत्वपारतन्त्र्ये विरूपता ॥” इति ॥ २९ ॥ श्रुतिभी कहती है-जीवको परमात्माके साथ ऐक्य बोधकवाक्य सर्वज्ञत्वादि ज्ञानके समान होनेसे ओर शरीरादिरूप एक स्थानवृत्ति होनेसे संगत होती है स्वरू- पको एक मानकर नहीं होता है कारण मुक्तोंकेभी स्वरूपभेद “सदा पश्यन्ति सूरय ” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित है । स्वतन्त्रत्व, और व्यापकत्वादि ईश्वरका स्वरूप और अणुत्व परतन्त्रत्वादि जीवका स्वरूप है ॥ २९ ॥ अथवा तत्त्वमसीत्यत्र स एवात्मा स्वातन्त्र्यादिगुणोपेतत्वात् अतत्त्वमसि त्वं तन्न भवसि तद्रहितत्वादित्येकत्वमतिशयेन
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( १३७ ) निराकृतम् । तदाह-‘अतत्त्वमिति वा छेदस्तैनैक्यं सुनिराकृ- तम् ॥' इति ॥ ३० ॥ अथवा अतत्त्वमसि ऐसा पदच्छेद कर ईश्वर स्वतन्त्रत्वादिरूप होनेसे तुम ईश्वर नहीं हो सकते एवञ्च अभेदका अत्यन्त निराकरण होता है ऐसाभी अर्थ वर्णन करते हैं अतएव कहा है अतत्त्व ऐसा पदच्छेद करनेसे अभेदका निरास होता है ॥ ३० ॥ तत्तस्मात् दृष्टान्तनवकेऽपि स यथा शकुनि सूत्रेण बद्ध इत्यादिना भेद एव दृष्टान्ताभिधानाय अयमभेदोपदेश इति तत्त्ववादरह- स्यम् । तथाच महोपनिषत्-“यथा पक्षी च सूत्रं च नानावृक्ष- रसा यथा । यथा नद्य समुद्राश्च शुद्धोदलवणौ यथा ॥ चौराप- हार्यौ च यथा यथा पुंविषयावपि । तथा जीवेश्वरौ भिन्नौ सर्वदैव विलक्षणौ ॥ ३१ ॥ नवों दृष्टान्तोंमे भेदहीका प्रतिपादन होता है यह सब दृष्टान्त छान्दोग्योपनिषदके षष्ठप्रपाठकमे हैं जिस प्रकार पक्षी और उसका बन्धन सूत्र परस्पर भिन्न हैं नाना- प्रकार वृक्षोंका रस परस्पर भिन्न है नदी और समुद्र शुद्ध जल और खार जल भिन्न हैं चोर और चोरीकी वस्तु एव पुरुष और विषय भिन्न होते हैं तिसी प्रकार जीव और ईश्वर परस्पर विलक्षण स्वरूप और स्वभाव होनेमे सदा भिन्न हैं ॥ ३१ ॥ तथाप सूक्ष्मरूपत्वान्न जीवात् परमो हरि । भेदेन मन्ददृ- ष्टीनां दृश्यते प्रेरकोऽपि सन् ॥ वैलक्षण्यं तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते बध्यतेऽन्यथा ॥” इति ॥ ३२ ॥ ऐसे होनेपरभी सूक्ष्म होनेसे मन्दगतियोंको सर्व प्रेरक परमात्मा जीवसे भिन्न होकर गृहीत नहीं होते दोनोंका वैलक्षण्य ज्ञानसे मुक्त होता है अन्यथा बद्ध होता है ॥ ३२ ॥ “ब्रह्मा शिव सुराद्याश्च शरीरक्षरणात् क्षराः । लक्ष्मीरक्षरदेह- त्वादक्षरात् परो हरि ॥ ३३ ॥ ब्रह्मा, शिव, सुर, सब शरीरका क्षरण होनेसे क्षर कहाते हैं नित्य शरीर होनेमे लक्ष्मी अक्षर हैं और हरि इनमेंभी परे हैं ॥ ३३ ॥
( १३८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- स्वातन्त्र्यशक्तिविज्ञानसुखाद्यैरखिलैर्गुणै ॥ नि सीमत्वेन ते सर्वे तद्वशा सर्वदेवता ॥” इति ॥ “विष्णुं सर्वगुणैः पूर्ण ज्ञात्वा संसा- र्व्वर्जित । निर्दुःखानन्दभुङ्नित्यं तत्समीपे स मोदते ॥ मुक्ता- नां चाश्रयो विष्णुरधिकाधिपतिस्तथा । तद्वशा एव ते सर्वे सर्व- दैव स ईश्वर ॥” इति च ॥ ३४ ॥ स्वातन्त्र्य, ज्ञान, शक्ति, सुखादि अनेक गुणो करके निस्सीम होनेसे सम्पूर्ण देवता श्रीहरिके आधीन है सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त विष्णुकी उपासनाद्वारा जो संसारसे मुक्त हो गया है वह दु खशून्य परमानन्दसे युक्त होकर भगवत्समीपमें आनन्दको प्राप्त होता है विष्णु मुक्ताक आश्रय और अधिक ( ब्रह्मादिक ) के भी आधिपति है अतः सम्पूर्ण देवता उनके आधीन हैं, सदा एक विष्णुही ईश्वर है ॥ ३४ ॥ एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानञ्च प्रधानत्वकारणत्वादिना युज्यते न तु सर्वमिथ्यात्वेन । न हि सत्यज्ञानेन मिथ्याज्ञानं सम्भवति । यथा प्रधानपुरुषाणां ज्ञानाज्ञानाभ्यां ग्रामो ज्ञात अज्ञात इत्ये- वमादिव्यपदेशो दृष्ट एव। यथा च कारणे पितरि ज्ञाते जाना- ॰ त्यस्य पुत्रमिति । अन्यथा 'यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातम्' इत्यत्र एकपिण्डशब्दौ वृथा प्रसज्येयाता मृदा विज्ञातयेत्येतावतैव वाक्यस्य पूर्णत्वात् ॥ ३५ ॥ एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान प्रतिज्ञाभी प्रधानत्व कारणत्वादि धर्मयुक्त होनेसे सङ्गत होती है सर्वमिथ्यात्वमें नहीं होती एक वस्तुके सत्यज्ञानसे अन्यका मिथ्याज्ञान सम्भव नहीं है प्रधानके ज्ञानसे अप्रधान ग्रामादि ज्ञान दृष्ट है जैसे कारणज्ञानसे कार्यज्ञान दृष्ट है तैसे ब्रह्म जगत्का कारण है अतः ब्रह्मज्ञानसे कार्यभूत जगत्का ज्ञान होता है । यदि सर्वका मिथ्यात्व माने तो एक मृत्तिकाके ज्ञानसे कार्यभूत घटशरावादि सब ज्ञात होते हैं इस दृष्टान्तमें एक शब्द और मृत्पिण्डपद व्यर्थ होंगे मृत्तिकाज्ञानसे सब ज्ञात होते हैं इतनेहीसे वाक्य पर्याप्त होता है एव लक्षणादि दोष पूर्व [???] ॥ ३५ ॥ न च वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमित्येतत् कार्यस्य मिथ्यात्वमाचष्टे इत्येष्टव्य वाचारम्भणं विकारो यस्य
[Header] दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १३९ ) तत् अविकृतं नित्य नामधेयं मृत्तिकेत्यादिकमित्येतद्वचनं सत्य- मिति तथ्यस्य स्वीकारात् । अपरथा नामधेयमेवेतिशब्दयो- र्वैय्यर्थं प्रसज्येत अतो न कुत्रापि जगतो मिथ्यात्वसिद्धि । किञ्च प्रपञ्चो मिथ्येत्यत्र मिथ्यात्व तथ्यमतथ्यं वा । प्रथमे सत्याद्वैत- भङ्गप्रसङ्ग । चरमे प्रपञ्चसत्यत्वापातः ॥ ३६ ॥ घटादि विकार और नाम वचनमात्र है ऐसे रहनेमे कार्यको मिथ्यात्वकी आश- ङ्का नही कर सक्ते जिसका विकार वाक् व्यवहारार्थ है अविकृत मृत्तिका इत्यादि नामधेय सत्य है यही अर्थ है अत मिथ्यात्वशङ्काभी नहीं हो सकती अन्यथा नामधेय और इति ये दोनों पद व्यर्थ होंगे अतः कहीं भी जगत्का मिथ्यात्व प्रतिपादन नही है ( और भी ) प्रपञ्चको मिथ्या कहनेवालेके मतम मिथ्यात्व सत्य है या असत्य ! यदि सत्य मानो तो अद्वैतकी हानि होगी क्योंकि ब्रह्म और प्रपञ्च मिथ्या दोनों सत्य हो गये । असत्य मानो तो मिथ्यात्वका असत्यत्व होनेसे प्रपञ्चका सत्यत्व होगा ॥ ३६ ॥ नन्वनित्यत्वं नित्यमनित्यं वा उभयथाप्यनुपपत्तिरित्याक्षेपव- द्वयमपि नित्यसमजातिभेदः स्यात् । तदुक्तं न्यायनिर्वाणवेधसा "नित्यमनित्यभावादनित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसम " इति॥तार्किक- रक्षायाञ्च- धर्मस्य तदतद्रूपविकल्पानुपपत्तित । धर्मिणस्त- द्विशिष्टत्वभङ्गी नित्यसमो भवेत् "॥ इति ॥ अस्या सञ्ज्ञाया उपलक्षणत्वमभिप्रेत्याभिहितं प्रबोधसिद्धौ अन्वर्थित्वात्तूषरञ्ज- कधर्मसमेति । तस्मात् सदुत्तरमेतदिति चेत् ॥ ३७ ॥ यदि कहो अनित्यत्व नित्य है या अनित्य ? दोनों पक्षोंमें अनुपपत्ति होती है अत इस आक्षेपके समान यह भी आक्षेप नित्य सजातीयका एक भेद है अतएव न्यायनिर्णयम कहा है अनित्य स्वभाव होनेसे अनित्यभी अनित्य हो तो नित्य समान होगा । तार्किक रक्षामेभी कहा है अनित्यत्वरूप धर्म्मको नित्यानित्य विकल्पसे धम्मीको अनित्यातारूप धर्मयुक्तत्व असम्भव होनेसे नित्यकी समान होगा इस कारण मिथ्यात्वादि सज्ञा उपलक्षणमात्र हे अतएव प्रबोधसिद्धिमें कहा हे कि अन्वर्थ होनेमे उपरञ्जकमात्र है अत उत्तर समीचीन है ॥ ३७ ॥
( १४० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पूर्णप्रज्ञ- अशिक्षितत्रासनमेतत् दुष्टत्वमूलानिरूपणात् । तद्द्विविधं साधारणमसाधारणञ्च । तत्राद्यं स्वव्याघातकम् । द्वितीयं त्रिविधम् युक्ताङ्गहीनत्वमयुक्ताङ्गाधिकत्वमविषयवृत्तित्वञ्चेति । तत्र साधा- रणमसम्भावितमेव उक्तस्याक्षेपस्य स्वात्मव्यापनानुपलम्भात् । एवमसाधारणमपि घटस्य नास्तितोक्तावस्तित्ववत् प्रकृतेऽप्यु- पपत्तेः । ननु प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वमभ्युपेयते नासत्त्वमिति चेत्त- देतत् सांड्य शिरश्छेदेऽपि शतं न ददाति विंशतिपञ्चकन्तु प्रय- च्छतीति शाकटिकवृत्तान्तमनुहरेत् मिथ्यात्वासत्त्वयो पर्या- यत्वादित्यलमतिप्रपञ्चेन ॥ ३८ ॥ यह अशिक्षितोंको भय दर्शाना है क्योंकि मिथ्या दोषका कारण कुछ नहीं दिखाया दुष्टत्वप्रयोजक दो प्रकार है एक साधारण और दूसरा असाधारण । साधारण स्वव्याघातक होता है । असाधारण तीन प्रकार हैं अपेक्षित अङ्गसे विकल १ अनपेक्षित अङ्गसे युक्त २ अनुपयुक्तस्थलवृत्तित्व ३ उक्त आक्षेप आत्मव्यापी न होनेसे साधारण संभव नहीं एव असाधारणभी असम्भावित हे जिस प्रकार घटका नास्तित्व कहनेसे अस्तित्व सम्भव नहीं । यदि कहो मैने प्रपञ्चको मिथ्यात्व कहा है असत्त्व नहीं कहा यह तो शिरके काटडालने परभी १०० रुपये न दूंगा पाच बी- सीही दूंगा इस प्रकार कहनेवाले मूर्खका अनुकरण करता हे असत्य ओर मिथ्या दोनों पर्याय हैं ॥ ३८ ॥ तत्र ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ इति प्रथमसूत्रस्यायमर्थः । तत्राथशब्दो मङ्गलार्थोऽधिकारानन्तर्यार्थश्च स्वीक्रियते । अत शब्दो हेत्वर्थे । तदुक्तं गारुडे- अथात शब्दपूर्वाणि सूत्राणि निखिलान्यपि । प्रारभेत नियत्यैव तत्किमत्र नियामकम् ॥ कश्चार्थस्तु तयोर्वि- द्वान् कथमुत्तमता तयो । एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् यथा ज्ञास्यामि तत्त्वत ॥ एवमुक्तो नारदेन ब्रह्मा प्रोवाच सत्तम । आनन्त- र्याविकारे च मङ्गलार्थे तथैव च ॥ अथशब्दस्त्वत शब्दो हेत्वर्थे समुदीरित ॥” इति ॥ यतो नारायणप्रसादमन्तरेण न मोक्षो
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १४१ ) लभ्यते प्रसादश्च न ज्ञानमन्तरेण, अतो ब्रह्मजिज्ञासा कर्त्तव्येति सिद्धम् ॥ ३९ ॥ अथात इत्यादि प्रथम सूत्रार्थ निरूपण करते हैं-अथशब्द मङ्गल प्रारम्भ, अधि- कार रूप अर्थत्रयबोधक है और अत पद हेतुबोधक है अतएव गरुडपुराणमे कहा है नियमसे अथ अत शब्दद्वय पूर्वक सम्पूर्ण सूत्रोंका आरम्भ करना इसमें क्या नियामक है दोन। शब्दोंका क्या अर्थ है और दोनों श्रेष्ठ क्यों हैं ? हे ब्रह्मन् ! यह मुझसे कहिये जिससे यथार्थ ज्ञान हो नारदजीके इस प्रकार पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मा- जी ने कहा आनन्तर्य मंगल और अधिकार अर्थमें अथशब्द और अत.शब्द हेतु अर्थमे प्रयुक्त होता है भगवान् नारायणकी कृपाके विना मोक्ष नही होता ज्ञानके विना प्रसन्नताभी नही होती है अतः ब्रह्मजिज्ञासा अवश्य करनी चाहिये ॥ ३९ ॥ जिज्ञास्यब्रह्मणो लक्षणमुक्तं 'जन्माद्यस्य यत ' इति । सृष्टि- स्थित्यादि यतो भवति तद् ब्रह्मेति वाक्यार्थ । तथाच स्कान्दं वच.-' उत्पत्तिस्थितिसंहारा नियतिर्ज्ञानमावृतिः । बन्धमोक्षौ च पुरुषाद्यस्मात् स हरिरेकराट्॥' इति ॥ 'यतो वा इमानि' इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ॥ ४० ॥ द्वितीय सूत्रसे जिज्ञास्य ब्रह्मका लक्षण कहते हैं सृष्टि स्थिति लय का जो कारण है वही ब्रह्म है । स्कन्दपुराणमेंभी कहा है उत्पत्ति और स्थिति आदि जिनसे होते हैं वह स्वय प्रकाशमान हरि हैं ॥ ४० ॥ तत्र प्रमाणमप्युक्त 'शास्त्रयोनित्वात्'इति । 'नावेदविन्मनुते तं बृह- न्तं तं त्वौपनिषदम्' इत्यादिश्रुतिभ्य तस्यानुमानिकत्वं निराक्रि- यते । न चानुमानस्य स्वातन्त्र्येण प्रामाण्यमस्ति । तदुक्तं कौर्मे-“श्रुतिसाहाय्यरहितमनुमानं न कुत्रचित् । निश्चयात् साध- येदर्थं प्रमाणान्तरमेव च ॥ श्रुतिस्मृतिसहायं यत् प्रमाणान्त- रमुत्तमम् । प्रमाणपदवी गच्छेदत्रात्र कार्या विचारणा" इति ॥४१॥ तृतीय सूत्रसे ब्रह्ममें प्रमाण दिखाते हैं जो वेदवेत्ता नही वह ब्रह्मको नहीं जान सकते उपनिषत्प्रतिपाद्य पुरुषको जानना चाहता हूं इत्यादि श्रुतियोंसे अनुमान विषयत्वनिराकरण कर केवल शब्दप्रतिपाद्यत्व प्रतिपादन करते हैं अनुमान स्वतन्त्र-
७. प्रत्यभिज्ञा दर्शन (काश्मीर शैव मत)
( १४२ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- प्रमाण नहीं अतएव कूर्मपुराणम कहा हे कि, श्रुतिके सहायताके विना केवल अनुमान कही भी वास्तविक अर्थका साधक नहीं हे श्रुतिके सहित प्रमाणान्तर उत्तम प्रमाण पदवीको प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४१ ॥ शास्त्रस्वरूपमुक्तं स्कान्दे-“ऋग्यजुः सामाथर्वाश्च भारतं पाञ्च- रात्रकम् । मूलरामायणञ्चैव शास्त्रमित्यभिधीयते ॥ यच्चानुकू- लने तस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम् । अतोऽन्यो ग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत् ॥ ” इति ॥ ४२ ॥ शास्त्रका स्वरूप स्कन्दपुराणमें कहा हे ऋक्, यजु, साम, अथर्व, भारत, पाञ्चरात्र, और मूलरामायण यही शास्त्र है इससे अन्य ग्रन्थ प्रपञ्च और कुमार्ग है शास्त्र नहीं ॥ ४२ ॥ तदनेनानन्यलभ्यः शास्त्रार्थ इति न्यायेन भेदस्य प्राप्तत्वेन तत्र न तात्पर्यं किन्त्वद्वैत एव वेदवाक्यानां तात्पर्यमिति अद्वैत- प्रत्याशा प्रतिक्षिप्ता । अनुमानादीश्वरस्य सिद्धाभावेन तद्भेद- स्यापि ततः सिद्ध्यभावात् । तस्मान्न भेदानुवादकत्वमिति- तत्परत्वमवगम्यते । अतएवोक्तम्-सदागमैकविज्ञेयं समतीत- क्षराक्षरम् । नारायणं सदा वन्दे निर्दोषाशेषसद्गुणम्॥’ इति॥४३॥ अतः प्रमाणान्तरसे जो लभ्य नहीं हो वही शब्दका अर्थ हे भेद प्रत्यक्ष सिद्ध होनेसे भेदके बोधनमें वेदका तात्पर्य नहीं हो सकता किन्तु अप्राप्त अद्वैतमे वेदान्त वाक्योंका तात्पर्य है इत्यादि अद्वैतसाधनयुक्ति भी निरस्त होगई । अनुमानद्वारा ईश्वरसिद्धि न होनेसे ईश्वरके साथ अभेदभी अनुमान साध्य नहीं हो सकता अतएव शास्त्रैकगम्य बद्ध मुक्त पुरुषोंसे पर, हेयगुणरहित, कल्याणगुणालय हरिकी वन्दना करता हू इत्यादि अभियुक्तोक्ति सङ्गत होती है ॥ ४३ ॥ शास्त्रस्य तत्र प्रामाण्यमुपपादितं ‘तत्तु समन्वयात्’ इति । सम- न्वय उपक्रमादिलिङ्गम् । उक्तं बृहत्संहितायाम्--“उपक्रमोपसं- हाराभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनि- र्णय ॥”इति । एवं वेदान्ततात्पर्यवशात् तदेव ब्रह्म शास्त्रगम्य- मित्युकतं भवति । दिङ्मात्रमत्र प्रादर्शि शिष्टमानन्दतीर्थभाष्य
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १४३ ) व्याख्यानादौ द्रष्टव्यं ग्रन्थबहुत्वाभियोपरम्यत इति । एतच्च रहस्यं पूर्णप्रज्ञेन मध्यमन्दिरेण वायोस्तदीयावतारम्मन्येन निरूपितामिति ॥ ४४ ॥ चतुर्थ सूत्रसे प्रामाण्य प्रतिपादन किया, उपक्रम, उपसहार, अभ्यास, अपूर्वता फल, अर्थवाद, उपपत्ति, इति षड्विधलिङ्ग समन्वय है । यही लिङ्ग तात्पर्य निर्मा- यक होते हैं एवं वेदान्ततात्पर्य वश ब्रह्म शास्त्रगम्य है यह सिद्ध हुआ अधिक आनन्दतीर्थभाष्यसे जानना । यह सब रहस्य अपनेको वायुका अवतार माननेवाले आनन्दतीर्थने निरूपण किये हैं ॥ ४४ ॥ 'प्रथमस्तु हनूमान् स्यात् द्वितीयो भीम एव च । पूर्णप्रज्ञस्तृ- तीयश्च भगवत्कार्यसाधकः' इति ॥ एतदेवाभिप्रेत्य तत्र तत्र ग्रन्थसमाप्ताविदं पद्यं लिख्यते । यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने दिव्यानि रूपाण्यलं बट्तदर्शतमित्यमेतदखिलं वेदस्य गर्भं महत्। वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुर्मध्वो- यस्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृत केशवे ॥ एतत्पदार्थस्तु वळित्थातद्वपुषेऽधायि दर्शते देवस्य भर्ग सहसो यतो- जनीत्यादिश्रुतिपर्यालोचनयावगम्यत इति । तस्मात् सर्वस्य शास्त्रस्य विष्णुत्तत्त्वं सर्वोत्तममित्यत्र तात्पर्यमिति सर्वं निरवद्यम् ॥ ४५ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे पूर्णप्रज्ञदर्शनं समाप्तम् ॥ भगवत्कार्य साधनेके लिये पहिले हनुमान्, द्वितीय, भीम, तृतीय पूर्णप्रज्ञ हुए इसी अभिप्रायसे मध्वोने ग्रन्थसमाप्तिमें निम्न श्लोक लिखे हैं जिन वायुके तीन दिव्यरूप पर्याप्त रूपसे “ बट्तद्दर्शत ” इत्यादि वेदवचनमें कहे हैं उनमेंसे प्रथम “ रामवचोनय ' अर्थात् रघुनाथजीके आज्ञाकारी हनुमान्जी प्रथम रूप, कौरवसेनाके विनाश करनेवाले भीम द्वितीय रूप, और मध्वाचार्य तृतीय रूप है । जिन्होंने केशवभगवान्के विषयमें ग्रन्थ निर्माण किया है इस विषयमे वि- शेष जिज्ञासु ऋग्वेदान्तर्गत उक्त श्रुतिसे जिज्ञासा शान्ति करें । एवञ्च विष्णु तत्त्वही सर्वोत्कृष्ट है इसीमे सम्पूर्ण वेदोंका तात्पर्य है ॥ ४५ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहमें पूर्णप्रज्ञदर्शन समाप्त ।
( १४४ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [पाशुपत- अथ नकुलीशपाशुपतदर्शनम् ॥ ६ ॥ तदेतद्वैष्णवमतं दासत्वादिपदवेदनीय परतन्त्रदुःखावहत्वान्न दुःसान्तादीप्सितास्पदमित्यरोचयमानाः पारमैश्वर्यं कामय- मानाः पराभिहता मुक्ता न भवन्ति परतन्त्रत्वात् पारमैश्वर्य- रहितत्वादस्मदादिवत् मुक्तात्मानश्च परमेश्वरगुणसम्बन्धिन पुरुषत्वे सति समस्तदुःखबीजविधुरत्वात् परमेश्वरवदि- त्याद्यनुमानं प्रमाणं प्रतिपद्यमानाः केचन माहेश्वराः परमपु- रुषार्थसाधनपञ्चार्थप्रपञ्चनपरं पाशुपतशास्त्रमाश्रयन्ते ॥ १ ॥ पूर्वोक्त दासत्वादिपदबोध्य वैष्णवमत परतन्त्रत्वादि दुःख बहुल होनेसे सदा दुःखरूपही बना रहेगा अतः निरवधिक सुखाभिलाषियोंके आश्रयणको अयोग्य माननेवाले परमैश्वर्यको चाहनेवाले परतन्त्र परमैश्वर्य शून्य होनेसे मुक्त नहीं हो सकता जिस प्रकार अस्मदादि बद्ध संसारी मुक्त नहीं है। समस्त दुःखबीजरहित होनेसे मुक्तात्मा परमेश्वर गुण सम्बन्धी है इत्यादि अनुमान प्रमाणको उपन्यास करते हुए कोई २ माहेश्वर (शैव) परम पुरुषार्थसाधक पञ्चार्थप्रपञ्चक पाशुपत- मतका अवलम्ब करते हैं ॥ १ ॥ तत्रेदमादिसूत्रम्-- ‘अथातः पशुपतेः पाशुपतयोगविधिं व्याख्यास्याम’ इति । अस्यार्थ -अत्राथशब्दः पूर्वप्रकृतापेक्षः । पूर्वप्रकृतश्च गुरुं प्रति शिष्यस्य प्रश्नः । गुरुस्वरूपं गणकारिकायां निरूपितम् । “पञ्चकास्त्वष्ट विज्ञेया गणश्चैकात्रिकात्मकः । वेत्ता नवगणस्या- स्य संस्कर्त्ता गुरुरुच्यते” इति। लाभा मला उपायाश्च देशावस्था विशुद्धय । दीक्षाकारित्वलान्यौ पञ्चकास्त्रीणि वृत्तय ॥” इति । तिस्रो वृत्तय इति प्रयोक्तव्ये त्रीणि वृत्तय इति छान्दस प्रयोग । तत्र विधीयमानमुपायफलं लाभ ज्ञानतपोदेवनित्यत्वस्थिति- शुद्धिभेदात् पञ्चविध । तदाह हरदत्ताचार्य्य -'ज्ञानं तपोऽथ नित्यत्वं स्थिति शुद्धिश्च पञ्चमम्' इति ॥ २ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १४५ ) प्रथम सूत्रका अर्थ यह है कि अथशब्द पूर्वप्रकृत शिष्यप्रश्नानन्तर्य्यका बोधक है । गुरुका स्वरूप गणकारिकामें इस प्रकार लिखा है आठ पञ्चक और त्रिकरूप एक गण इस प्रकार नौ गणोंके वेत्ता सस्कार करनेवाले गुरु होते हैं । लाभ, मल, उपाय, देश, अवस्था, विशुद्धि, दीक्षाकारी, बल यह आठ पञ्चक हैं । इनमें एक एकमें पञ्च २ भेद होनेसे पञ्चक कहाते हैं तीन वृत्ति है यद्यपि विशेष्यविशेषणका समान लिङ्ग वचन नियम होनेसे 'तिस्रो वृत्तयः' ऐसा कहना उचित था तथापि छान्दस होनेसे लिङ्गविपर्यय करके त्रीणि ऐसा नपुंसक लिङ्ग होगया । अब क्रमसे एक एककी व्याख्या और भेद कहते हैं । क्रियमाण उपायका फल लाभ है उसको ज्ञान, तप, नित्यत्व, स्थिति, शुद्धिभेदसे हरदत्ताचार्यने पाँच प्रकार कहाहै ॥ २ ॥ आत्माश्रितो दुष्टभावो मलः । स मिथ्याज्ञानादिभेदात् पञ्च- विध । तदप्याह—“मिथ्याज्ञानमधर्मश्च सक्तिर्हेतुश्च्युतिस्तथा। पशुत्वमूलं पञ्चैते तन्त्रे हेया विविक्षितः ॥” इति ॥ साधकस्य शुद्धिहेतुरुपायः वासचर्यादिभेदात् पञ्चविधः । तदप्याह- “वासचर्या जपो ध्यानं सदा रुद्रस्मृतिस्तथा । प्रतिपत्तिश्च लाभानामुपाया पञ्च निश्चिता ॥” इति ॥ ३ ॥ आत्मवृत्तिदुष्टभाव मल है वहभी मिथ्याज्ञान, अधर्म्म, शक्ति, हेतु, च्युति भेदसे पाँच पशुत्वका मूल है अत विवेकद्वीरा यह सब हेय है । साधककी शुद्धिके हेतु उपायभी वासचर्या, जप, ध्यान निरन्तर रुद्रका स्मरण, लाभकी प्रतिपत्तिभेदसे पाँच प्रकार है ॥ ३ ॥ येनार्थानुसन्धानपूर्वकं ज्ञानतपोवृद्धिं प्राप्नोति स देशो गुरुज- नादिः । यदाह—“गुरुर्जनो गुहादेशः श्मशानं रुद्र एव च” इति॥ आलाभप्राप्तेरेकत आदौ यदवस्थानं सावस्था व्यक्तादिविशे- षेण विशिष्टा । तदुक्तम्-‘व्यक्ताव्यक्तजपादानं निष्ठा चैव हि पञ्चमम्, इति ॥ मिथ्याज्ञानादीनामत्यन्तव्यपोहो विशुद्धिः । सा प्रतियोगिभेदात् पञ्चविधा । तदुक्तम्-‘अज्ञानस्याप्यस- ङ्गस्य हानि सङ्करस्य च । च्युतिर्हानिः पशुत्वस्य शुद्धिः पञ्चविधा स्मृता’ इति॥ दीक्षाकारिपञ्चकं चोक्तम्-‘द्रव्यं कालः
( १४८ )' सर्वदर्शनसंग्रह' । [ पाशुपत- यदस्वतन्त्रं सर्वं कार्यं त्रिविधं विद्या कला पशुश्चेति । तत्र पशुगुणो विद्या । सापि द्विविधा बोधाबोधस्वभावभेदात् । बोधस्वभावा विवेकाविवेकप्रवृत्तिभेदात् द्विविधा । तत्र या विवेकप्रवृत्तिः प्रमाणमात्रव्यङ्ग्या चित्तेत्युच्यते । चित्तेन हि सर्व प्राणी बाह्यार्थात्मकप्रकाशानुगृहीतं सामान्येन विवेचित- मविवेचितं चार्थं चेतयते इति । पश्वर्थधर्माधर्मिका पुनरबोधा- त्मिका विद्या स्वशास्त्रं येनोच्यते चेतनपरतन्त्रत्वे मत्यचेतना कला ॥ ८ ॥ विद्या कला और पशु भेदसे अस्वतन्त्र कार्य त्रिविध है । पशुगुण विद्या है । वह बोध और अबोधस्वभाव भेदसे दो प्रकार है । विवेक और अविवेक प्रवृत्ति- भेदसे बोधस्वभावभी द्विविध है । प्रमाणगम्य विवेक प्रवृत्तिका नाम चित्त है समस्त प्राणी चित्त हीसे बाह्यार्थ प्रकाशके सहकारी होकर विवेक युक्त और अविवेक युक्त अर्थका ज्ञान करते हैं । पशुपदार्थ धर्माधर्मरूप अबोधात्मक विद्या है । जिसको पाशुपतशास्त्र कहते हैं चेतनके परतन्त्र और स्वयं अचेतन हो वह कला है ॥ ८ ॥ सापि द्विविधा कार्याख्या कारणाख्या चेति । तत्र कार्या- ख्या दशविधा । पृथिव्यादीनि पञ्च तत्त्वानि रूपादय पञ्च गुणाश्चेति । कारणाख्या त्रयोदशविधा । ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं कर्मेन्द्रियपञ्चकम् अध्यवसायाभिमानसङ्कल्पाभिधवृत्तिभेदात् बुद्ध्यहङ्कारमनोलक्षणमन्तःकरणत्रयञ्चेति । पशुत्वसम्बन्धी पशुः । सोऽपि द्विविध साञ्जनो निरञ्जनश्चेति । तत्र साञ्जन- शरीरेन्द्रियसम्बन्धी, निरञ्जनस्तु तद्रहित । तत्रपञ्चस्तु पञ्चार्थभाष्यदीपिकादौ द्रष्टव्य ॥ ९ ॥ कार्य और कारण भेदसे कला द्विविध है । पृथिव्यादि पञ्च भूत रूपादि पाच गुण मिलकर कार्य दशविध है । कारणभी पाच ज्ञानेन्द्रिय पाच कर्मेन्द्रिय अध्यवसाय (निश्चयात्मक) बुद्धि और अभिमानरूप अहङ्कार सङ्कल्पात्मक मनोरूप तीन
जन्त रूगण मिलाकर तेरह प्रकार है। पशुत्वका सम्बन्धी पशुभी साञ्जन और निरञ्जन भेदसे द्विविध है। शरीर और इन्द्रियसे युक्त साञ्जन ओर शरीरैन्द्रियरहित निरञ्जन है। इसका विस्तार पञ्चार्थभाष्यदीपिकासे जान लेना ॥ ९ ॥ समस्तसृष्टिसंहारानुग्रहकारि कारणं तस्यैकस्यापि गुणकर्मभे- दापेक्षया विभाग उक्त पति साद्य इत्यादिना । तत्र पतित्वं निरतिशयदृक्क्रियाशक्तिमत्त्वं तेनैश्वर्येण नित्यसम्बन्धित्वम् आद्यत्वमनागन्तुकैश्वर्यसम्बन्धित्वम् इत्यादर्शकारादिभि- स्तीर्थकरैर्निरूपितम् ॥ १० ॥ समस्त सृष्टि और संहारका अनुग्राहक कारण है वह यद्यपि एक है तथापि गुण और कर्मके भेदसे उसका भेद 'पति साद्य.' इत्यादि पद्यमें वर्णन किया है। निर- तिशय दर्शनक्रियाशक्तिमत्त्व पशुत्व है उसको ऐश्वर्यके साथ नित्यसम्बन्धित्व आद्यत्व और अनागंतुक ऐश्वर्यवत्त्व आदर्शादिकारिकामें तीर्थंकरोने कहा है ॥ १० ॥ चित्तद्वारेणात्मेश्वरसम्बन्धो योग । स च द्विविधः क्रियालक्षणः क्रियोपरमलक्षणश्चेति । तत्र जप्यध्यानादिरूपः क्रियालक्षणः । क्रियोपरमलक्षणस्तु संविद्वृत्यादिसंज्ञित धर्मार्थसाधकव्या- पारो विधि । स च द्विविध प्रधानभूतो गुणभूतश्च । तत्र प्रधानभूत साक्षाद्धर्महेतुः चर्या सा द्विविधा व्रतं द्वाराणि चेति । तत्र भस्मस्नानशय्योपहारजपप्रदक्षिणानि व्रतम् । तदुक्तं भगवता नकुलीशेन । भस्मना त्रिपवणं स्नायीत भस्मान शयीतेति ॥ ११ ॥ चित्तद्वारा आत्मा और ईश्वरका सम्बन्ध योग है। वह क्रियालक्षण और क्रियो- परमलक्षण भेदसे योग द्विविध है। जप ध्यानादिरूप क्रियालक्षण है और संवित् गत्यादिरूप दूसरा है। धर्मार्थ साधक व्यापार विधि है। वहभी प्रधान और गौण भेदसे दो प्रकार है। साक्षात् धर्मसाधक चर्या प्रथम है सोभी व्रत और द्वारभेदसे दो प्रकार है। भस्मस्नान, शय्या, उपहार, जप, और प्रदक्षिणा व्रत है। त्रिकाल भस्म स्नान और भस्ममें शयन करे इत्यादि नकुलीशनेभी कहा है ॥ ११ ॥
( १५० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पाशुपत-
अत्रोपहारो नियम । स च षडङ्ग । तदुक्त सूत्रकारेण-“हसित- गीतनृत्यहुडुक्कारनमस्कारजप्यषडङ्गोपहारेण उपतिष्ठेत ” इति । तत्र हसितं नाम कण्ठौष्ठपुटविस्फूर्जनपुर सरमहहहेत्यट्टहास । गीतं गान्धर्वशास्त्रसमयानुसारेण महेश्वरसम्बन्धिगुणधर्मादिनिमि- त्तानां चिन्तनम् । नृत्यमपि नाट्यशास्त्रानुसारेण हस्तपादादीना- मुत्क्षेपणादिकमङ्गप्रत्यंगोपांगसहितं भावाभावसमेतञ्च प्रयोक्त- व्यम् । हुडुक्कारो नाम जिह्वातालुसंयोगान्निष्पाद्यमान पुण्यो वृषनादसदृशो नादः हुडुगिति शब्दानुकारो वषडितिवत् । यत्र लौकिका भवन्ति तत्रैतत् सर्वं गूढं प्रयोक्तव्यम् । शिष्ट प्रसिद्धम् । द्वाराणि तु क्राथनस्पन्दनमन्दनशृङ्गारणावितत्कर- णावितद्भाषणानि । तत्रासुप्तस्यैव सुप्तलिङ्गप्रदर्शनं क्राथनम् । वाय्वभिभूतस्येव शरीरावयवानां स्पन्दनं कम्पनम् । उपहतपादे- न्द्रियस्येव गमनं मन्दनम् । रूपयौवनसम्पन्ना कामिनीमवलो- क्यात्मानं कामुकमिव यैर्विलासै प्रदर्शयति तत् शृङ्गारणम् । कार्याकार्यविवेकविकलस्येव लोकनिन्दितकर्मकरणमवित- त्करणम् । व्याहतापार्थकादिशब्दोच्चारणमवितद्भाषणमिति ॥ १२॥ षडङ्ग युक्त नियमका नाम उपहार है । हसित १ गीत २ नृत्य ३ हुडुङ्कार ४ नमस्कार ५ और जप्य रूप ६ षडङ्ग उपहारसे उपस्थान कर इत्यादि सूत्रकारने कहा है । कण्ठ और ओष्ठको फाडकर चिल्लाकर अट्टहास करना हसित है । महेश्वरस म्बन्धी गुण और धर्म निमित्तके गन्धर्वशास्त्रानुसार चिन्तन गीत है । नाट्यशास्त्रा- नुसार हाथ पांवका चलाना अङ्गको भावपूर्वक अथवा भावशून्य डुलाना नृत्य है । बैलके शब्दकी समान हुडुक्शब्द वषड शब्दवत् डुडुङ्कशब्दका अनुकरण हुडुङ्कार है यह सब लौकिकोंके सामने गुप्त रखे शेष प्रसिद्ध कर । क्राथन, स्पन्दन, मन्दन, शृंगारण, अवितत्करण और अवितद्भाषण द्वार हैं । असुप्तभी सुप्तके समान आकृति दर्शनका नाम क्राथन है । वायुसे अभिभूतके समान शरीरको चलाना कम्पन है। लङ्गडेके समान चलना मन्दन है, रूपयोवनयुक्त सुन्दर स्त्रीको देखकर अत्यन्त
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १५१ ) विषयीकी चेष्टा करना शृङ्गार है उन्मत्तके समान लोकनिन्दित कर्मकरना अवितत्क- रण है। पागलोंकी समान परस्पर व्याहत और अपार्थशब्दका उच्चारण करनाऽ अवितद्भाषण है ॥ १२ ॥ गुणभूतस्तु चर्याऽनुग्राहकोऽनुस्नानादिः भैक्ष्योच्छिष्टादि- निर्मितायोग्यताप्रत्ययनिवृत्त्यर्थं । तदप्युक्तं सूत्रकारेण । अनु- स्नाननिर्माल्यलिङ्गधारीति ॥ तत्र समासो नाम धर्म्मिमात्राभि- धानम् । तच्च प्रथमसूत्र एव कृतम् । पञ्चानां पदार्थानां प्रमा- णत पञ्चाभिधानं विस्तरः । स खलु राशीकरभाष्ये द्रष्टव्यः । एतेषां यथासम्भवं लक्षणतोऽसङ्करेणाभिधानं विभागः । स तु विहितशास्त्रान्तरेभ्योऽमीषां गुणातिशयेन कथनं विशेषः ॥ १३ ॥ गुणभूत चर्या अनुग्राहक और अनुस्नानादि है । भिक्षा उच्छिष्टादिनिर्मित अयो- ग्यताप्रवृत्तिके लिये है धर्मी मात्रका कथन समास है यह प्रथमसूत्रमे कहा है । पांचों तत्त्वोंके पाच पाच भेद कथन विस्तार है । वह राशीकरके भाष्यसे जानले । इन्हीको पृथक् लक्षणोंसे कथन विभाग है । वह शास्त्रान्तरसे विशेष गुणातिशयका कथन है ॥ १३ ॥ तथाहि अन्यत्र दुःखनिवृत्तिरेव दुःखान्तः इह तु पारमैश्वर्य्य- प्राप्तिश्च । अन्यत्राभूत्वा भावि कार्य्यमिह तु नित्यं पश्वादि । अन्यत्र सापेक्षं कारणम् इह तु निरपेक्षो भगवान् एव । अन्यत्र कैवल्यादिफलको योग इह तु पारमैश्वर्य्यदुःखान्तफलकः । अन्यत्र पुनरावृत्ति स्वर्गादिः इह पुनरपुनरावृत्तिरूप सामी- प्यादिफलकः ॥ १४ ॥ अन्यत्र मतान्तरमें दुःखनिवृत्तिमात्रको दुःखका अन्त कहा है परन्तु इस मतमें पारमैश्वर्यप्राप्तिभी माने जाते हैं अन्यत्र अविद्यमानकी उत्पत्तिही कार्य है। इसमें पश्वादि नित्य कार्य है । अन्यत्र कारण सापेक्ष रहता है । यहां निरपेक्ष भगवान् कारण हैं अन्यत्र योगका फल केवल्य है यहाँ दुःखान्त और पामैश्वर्य प्राप्तिभी है अन्यत्र स्वर्गादि पुनरावृत्तियुक्त अर्थात् नाशवान् है यहाँ पुनरावृत्तिरहित सामीप्य फलक है ॥ १४ ॥
( १५२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पाशुपत- ननु महदेतदिन्द्रजालं यन्निरपेक्षः परमेश्वरः कारणमिति तथात्वे कर्मवैफल्यं सर्वकार्याणां समसमयसमुत्पादश्चेति दोषद्वयं प्रादु- ष्यात् मैवं मन्येथा व्यधिकरणत्वात् । यदि निरपेक्षस्य भगवत कारणत्वं स्यात्तर्हि कर्मणो वैफल्ये किमायाताम् । प्रयोजनाभाव इति चेत् कस्य प्रयोजनाभावः । कर्मवैफल्ये कारणं किं कर्मिण किं वा भगवतः । नाद्यः ईश्वरेच्छानुगृहीतस्य कर्मणः सफलत्वो- पपत्तेः तदनुगृहीतस्य ययातिप्रभृतिकर्मवत् कदाचित् निष्फल- त्वसम्भवाच्च । न चैतावता कर्मस्वप्रवृत्तिः कर्षकादिष्वपपत्तेः ईश्वरेच्छायतत्वाच्च पशूनां प्रवृत्तेः । नापि द्वितीयः परमेश्वरस्य पर्याप्तकामत्वेन कर्मसाध्यप्रयोजनापेक्षाया अभावात् । यदुक्तं समसमयसमुत्पाद इति तदप्ययुक्तम् अचिन्त्यशक्तिकस्य पर- मेश्वरस्येच्छानुविधायिन्या अव्याहतक्रियाशक्त्या कार्यकारि- त्वाभ्युपगमात् । तदुक्तं सम्प्रदायविद्भि - "कर्मादिनिरपेक्षस्तु स्वेच्छाचारी यतो ह्यहम् । ततः कारणतः शास्त्रे सर्वकारण- कारणम् ॥” इति ॥ १५ ॥ यह बडा भारी इन्द्रजाल हे कि परमेश्वर निरपेक्षही कारण बन जाते है ऐसा हो तो कर्मही विफल होगा ओर संपूर्ण कार्य एकही समय उत्पन्नभी होने लगेंगे यहभी नहीं आपका कथन विपरीत हे निरपेक्ष भगवान्को कारण माननेसे कर्म विफल होनेपर क्या होता है । प्रयोजनाभाव कहोगे तो किसका प्रयो जनाभाव है । कर्मवैफल्यमें क्या कर्मी कारण हे या भगवान् कारण है ? (उत्तर) भगवान्को ईश्वरेच्छासे अनुगृहीत कर्मका सफलत्व सम्भव हे अतः प्रथम पक्षको कह नहीं सकते । ययाति प्रभृतिके कर्मके समान कदाचित् ईश्वरानुगृहीत कर्मभी विफल हो सकता है क्योंकि इतनेहीसे कर्ममें प्रवृत्तिका अभाव सम्भव नहीं कृषकोंके समान कर्ममें प्रवृत्ति हो सकता है परमेश्वर आप्तकाम होनेसे सकर्म साध्य प्रयोज- नकी अपेक्षाभी नहीं है समकालमें सब कार्य होनेलगेगा। यहभी नहीं अचिन्त्यशक्ति परमात्माकी इच्छाधीन क्रियाशक्ति कार्यनिर्वाहक मानी है अतएव साम्प्रदायिकोंने कहा है जिनसे परमात्मा कर्मादि निरपेक्ष स्वेच्छाचारी है इसीसे शास्त्रमें सम्पूर्ण कारणोंको भी कारण कहा है ॥ १५ ॥
दर्शनम् । भाषाटीकासमेतः । ( १६३ ) ननु दर्शनान्तरेऽपीश्वरज्ञानान्मोक्षो लभ्यत एवेति कुतोऽस्य विशेष इति चेन्मैवं वादीः विकल्पानुपपत्तेः । किमीश्वरविषय- ज्ञानमात्रं निर्वाणकारणं किंवा साक्षात्कारः, अथवा यथावत्त- त्त्वनिश्चय । नाद्य - शास्त्रमन्तरेणापि प्राकृतजनवद्देवाना मधिपो महादेव इति ज्ञानोत्पत्तिमात्रेण मोक्षसिद्धौ शास्त्राभ्यासवैफल्य- प्रसङ्गात् । नापि द्वितीय.--अनेकमलप्रचयोपचितानां पिशि- तलोचनानां पशूना परमेश्वरसाक्षात्कारानुपपत्ते । तृतीयेऽस्म- न्मतापात पाशुपतशास्त्रमन्तरेण यथावत्तत्त्वनिश्चयानुपपत्तेः । तदुक्तमाचार्य्यै - ज्ञानमात्रे यथा शास्त्रं साक्षाद्दृष्टिस्तु दुर्लभा । पञ्चार्थादन्यतो नास्ति यथावत्तत्त्वनिश्चयः ॥” इति । तस्मात् पुरुषार्थकाम- पुरुषधौरेयैः पञ्चार्थप्रतिपादनपरं पाशुपतशास्त्र- माश्रयणीयम् ॥ १६ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे नकुलीशपाशुपतदर्शनं समाप्तम् ॥ ६ ॥ जब दर्शनान्तरमें भी ईश्वरज्ञानसे मोक्ष प्रतिपादन किया है तब यहाँ क्या विशेष है जिससे इतना श्रम उठाते हो सुनो. क्या ईश्वरविषय ज्ञानमात्रसे मोक्ष है, किंवा प्रत्यक्षसे, अथवा यथावत्तत्त्व निश्चयसे मोक्ष है ? शास्त्राभ्यासके विनाभी पामरोंके समान महादेव देवोंकेभी देव है इत्यादि ज्ञानमात्रसे मोक्ष होजाय तो शास्त्राभ्यास व्यर्थ होगा अत प्रथम पक्ष अयुक्त हे। द्वितीयमेंभी अनेक पापसे युक्त चर्मचक्षुओंको ईश्वर साक्षात्कार असम्भव हे तृतीय पक्षमें पाशुपत मतम प्रवेश अवश्यही होगा पाशुपतशास्त्रके बिना यथावत् तत्त्वनिश्चय अनुपपन्न हे अतएव कहा है ज्ञान- मात्रपक्षमें शास्त्र व्यर्थ होगा साक्षात्कार ( प्रत्यक्ष ) दुर्लभ है पञ्चार्थ प्रतिपादक पाशुपतशास्त्रके बिना तत्त्वनिश्चयभी नहीं होगा अतः पुरुषार्थ चाहनेवाले श्रेष्ठ पुरुष पञ्चार्थ प्रतिपादक पाशुपतशास्त्रका आश्रयण करें ॥ १६ ॥ सर्वदर्शनसंग्रहमें नकुलीशपाशुपतदर्शन समाप्त ।
( १५४ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ शैव- अथ शैवदर्शनम् ॥ ७ ॥ तमिमं परमेश्वरं कर्मादिनिरपेक्षं कारणमिति पक्षं वैषम्यनै- र्घृण्यदोषदूषितत्वात् प्रतिक्षिपन्तः केचन माहेश्वरा शैवागम- सिद्धान्ततत्त्वं यथावदीक्षमाणा कर्मादिसापेक्षं परमेश्वरं का- रणमिति पक्षं कक्षीकुर्वाणाः पक्षान्तरमुपक्षिपन्ति पतिपशुपाश- भेदात् त्रयः पदार्था इति ॥ १ ॥ कर्मादिनिरपेक्ष ईश्वरको कारणत्व स्वीकार करनेवाले नाकुलीशके मतमें-वैषम्य नैर्घृण्य ( निन्दनीयत्व ) दूषित होनेसे उक्त पक्षको दूषित करके शैवसिद्धान्तको सम्यक् विचारकर कर्मादिसापेक्ष ईश्वरको कारण माननेवाले कोई माहेश्वर मतान्तर निरासपूर्वक पति, पशु और पाशभेदसे तीन तत्त्वोंको व्यवस्थापन करते हैं ॥ १ ॥ तदुक्तं तन्त्रतत्त्वज्ञै । “त्रिपदार्थं चतुष्पादं महातन्त्रं जगद्गुरु । सूत्रेणैकेन सङ्क्षिप्य प्राह विस्तरत पुन ॥” इति । अस्यार्थ - उक्तास्त्रयः पदार्था यस्मिन् सन्ति तत्रिपदार्थ विद्याक्रियायो- गचर्य्याख्याश्चत्वार पादा यस्मिन् तच्चतुश्चरण महातन्त्रमिति । तत्र पशूनामस्वतन्त्रत्वात् पाशानामचैतन्यात् तद्विलक्षण- स्य पत्युः प्रथममुद्देशः चेतनत्वसाधर्म्यात् पशूनां तदानन्त- र्य्यम् । अवशिष्टानां पाशानामन्ते विनिवेश इति क्रमनियमः ॥ २ ॥ अतएव तन्त्रतत्त्वज्ञोंने कहा है जगद्गुरुने तीन पदार्थ चार चरणोंसे युक्त महातन्त्रको एकही सूत्र द्वारा संक्षेपसे कहकर पुनः विस्तारसे वर्णन किया तात्पर्य जिस तन्त्रमें उक्त तीनो पदार्थ और विद्या क्रिया, योग, चर्यारूप चार पाद हो वह महातन्त्र है । पशु परतन्त्र और पाश अचेतन होनेसे सर्वश्रेष्ठ पतिका प्रथम निर्देश किया चेतनत्व धर्म समान होनेसे अनन्तर पशुका निर्देश किया ओर अन्तमें पाशका निर्देश किया है ॥ २ ॥ दीक्षाया परमपुरुषार्थहेतुत्वात् तस्याश्च पशूपाशेश्वरस्वरूप- निर्णयोपायभूतेन मन्त्रमन्त्रेश्वरादिमाहात्म्यनिश्चायकेन ज्ञानेन,
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १५५ ) विना निष्पादयितुमशक्यत्वात् तदेव बोधकस्य विद्यापादस्य प्राथम्यम् । अनेकविधसाङ्गदीक्षाविधिप्रदर्शकस्य क्रियापादस्य तदानन्तर्यम् । योगेन विना नाभिमतप्राप्तिरिति साङ्गयोगज्ञा- पकस्य योगपादस्य तदुत्तरत्वम् । विहिताचरणनिषिद्धवर्जन- रूपा चर्यां विना योगोऽपि न निर्वहतीति तत्प्रतिपादकस्य चर्यापादस्य चरमत्वमिति विवेकः ॥ ३ ॥ मोक्षका कारण दीक्षा है वह दीक्षा पशु पाश और ईश्वर इन तीनके स्वरूप निर्णयके उपायभूत मन्त्र मन्त्रेश्वरादि माहात्म्य ज्ञानके निश्चायक बिना असम्भव होनेसे तद्बोधक विद्यापादका प्रथम उपादान हे नानाविध दीक्षाविधिप्रदर्शक क्रियापादके अनन्तर उपन्यास एव योगके बिना अभिमतप्राप्ति न होनेसे साङ्गो- गबोधक योगपादके पश्चात् उपन्यास किया है । विहितानुष्ठान निषिद्धत्यागरूप चर्याके बिना योगभी अकार्यकर होनेसे तत्प्रतिपादक चर्याको सबके अन्तमें उपादान किया ॥ ३ ॥ तत्र पतिपदार्थः शिवोऽभिमतः । मुक्तात्मनां विद्येश्वरादी नाञ्च यद्यपि शिवत्वमस्ति तथापि परमेश्वरपारतन्त्र्यात् स्वा- तन्त्र्यं नास्ति । ततश्च तदनुकरणभुवनादीनां भावानां सन्निवेश- विशिष्टत्वेन कार्यत्वमवगम्यते । तेन च कार्यत्वेनैषां बुद्धिम- त्पूर्वकत्वमनुमायित इत्यनुमानवशात्परमेश्वरप्रासिद्धिरुपपद्यते॥४॥ यहा पशुपदार्थ शिव विवक्षित है यद्यपि मुक्त और विद्या ईश्वरादिको भी शिवत्व है तथापि परमेश्वर परतन्त्र होनेसे स्वातन्त्र्य नहीं । अनन्तर भुवनादिके अवयवसन्नि- वेश विशिष्ट ( सावयव ) होनेसे कार्यत्व अनुमित होता है जो कार्य होता है वह उपादानसम्प्रदानादि बुद्धिमत्कर्त्तृक होताहै ईदृश विस्तृत भुवनादिका उपादानादि ज्ञानवान् ईश्वरसे अन्य न हो सकनेसे अनुमानद्वारा परमेश्वर सिद्धि होती है ॥ ४ ॥ ननु देहस्यैव तावत्कार्यत्वमसिद्धम् । न हि क्वचित् केनचित् कदाचिद्देहः क्रियमाणो दृष्टचरः । सत्यं तथापि न केनाचित्क्रि- यमाणत्वं देहस्य दृष्टमिति कर्तृदर्शनापह्नवौ न युज्यते तस्या- नुमेयत्वेनाप्युपपत्तेः । देहादिकं कार्यं भवितुमर्हति सन्नि-
( १०६ ) षड्दर्शनप्रद । [ मी- वेशविशिष्टत्वाद् विनश्वरत्वाद्वा घटादिवत् तेन च कार्य्यत्वेन बुद्धिमत्पूर्वकत्वमनुमातुं सुकरमेव। क्षितं सकर्तृकं कार्य्यत्वात् घटवत् यदुक्तसाधनं तदुक्तसाध्यं न यन्नैव न तन्नैव यथा- त्मादि । परमेश्वरानुमानप्रामाण्यस्यानुपानमन्यत्रकारी- त्युपरम्यते ॥ ५ ॥ यदि कहो-पहिले देहादिका कार्य्यकर्ता सिद्ध नहीं पश्चात् देहो बनानेवालेको किसीने नहीं देखा सत्य कहते हो तो भी देहके बनाने हुए किसीको नहीं देखनेसेही कर्त्ताका निषेध नहीं कर सक्ता क्योंकि अनुमानसेभी कर्त्ता सिद्ध हो सकता है। सावयव और अनित्य होनेसे घटादिके समान देहादिक कार्य्य हैं। देहादिक कार्य्य होनेसे सकर्तृक हैं इत्यादि अनुमानसे कर्त्ता सिद्ध होनेपर बुद्धिमत्कर्तृ- कत्वभी सुलभ है इसी प्रकार क्षित (धराधामरूप) भुवनादिकभी घटादिके समान कार्य्य होनेसे सकर्तृक हैं जो जो उक्त साधन (कार्य्य) हो वह सब सकर्तृक हैं जो सकर्तृक नहीं वह कार्य्यभी नहीं जैसे आत्मा परमेश्वरानुमानका प्रामाण्य अन्यत्र कुसु- माञ्जल्यादि ग्रन्थमें दिखाया है अत विराम लेना ॥ ५ ॥ "अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मन सुखदु खयो । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा॥" इति न्यायेन प्राणिकृतकर्मा- पेक्षया परमेश्वरस्य कर्तृत्वोपपत्ते । न च स्वातन्त्र्यविहतिरि- तिवाच्यं करणापेक्षया कर्तु स्वातन्त्र्यविहतेरनुपलम्भात् कोषाध्यक्षापेक्षस्य राज्ञ प्रसादादिना दानवत् । यथोक्तं सिद्ध गुरुभि - "स्वतन्त्रस्याप्रयोज्यत्वं करणादिप्रयोक्तृता । कर्तृ स्वातन्त्र्यमेतद्धि नच कर्माद्यपेक्षता ॥" इति ॥ ६ ॥ जीव अज्ञ और अपने सुखदुःखकी निवृत्तिके लियेभी समर्थ नहीं है ईश्वरकी प्रेरणासे स्वर्ग अथवा नरक जाता है। इत्युक्त प्रकार प्राणी कर्म्मकी अपेक्षासे ईश्वरका कर्तृत्व है। यदि कहो स्वतन्त्रताकी हानि होगी सो ऐसा नहीं कहसकते कारणकी अपेक्षा करनेसे कर्त्ताके स्वातन्त्र्यकी हानि कही दृष्ट नहीं है जिस प्रकार दानादिमें कोषाध्यक्षकी अपेक्षा करनेसे राजाका स्वातन्त्र्य भंग नहीं होता प्रत्युत स्वातन्त्र्य रक्षित होता है यथा सिद्धगुरुने कहा है कि स्वतन्त्रका अप्रयोज्यत्व और करणा- दिका प्रयोजकत्व यही कर्त्ताका स्वातन्त्र्य है कर्मादि निरपेक्षता स्वातन्त्र्य नहीं है ॥ ६ ॥
तथाच तत्तत्कर्माशयवशाद्भोगतत्साधनतदुपादानादिविशेषज्ञ कर्त्ता अनुमानादिसिद्ध इति सिद्धम् । तदिदमुक्तं तत्रभवद्भिर्बृ- हस्पतिभिः--"इह भोग्यभोगसाधनतदुपादानादि यो विजानाति तमृते भूतन्नहदं पुस्कर्माशयविपाकज्ञम्" इति ॥ अन्यत्रापि- "विवादाध्यासितं सर्वं बुद्धिमत्पूर्वकंर्तृकम् । कार्य्यत्वादावयो सिद्धं कार्य्य कुम्भादिकं यथा॥" इति। सर्वात्मकत्वादेवास्य सर्व- ज्ञत्वं सिद्धम् अज्ञस्य करणासम्भवात् । उक्तञ्च श्रीमन्मृगेन्द्रैः -- "सर्वज्ञ सर्वकर्तृत्वात् साधनाङ्गफलै सह । यो यज्जानाति कुरुते स तदेवेति सुस्थितम् ॥" इति ॥ ७ ॥ एवञ्च तत्तत्कर्म्मांशयवश भोग, भोगसाधन, तदुपायको जाननेवाला कर्ता अनु- मान सिद्ध है अतएव बृहस्पतिने कहा है भोग्य भोगोपकरण और भोगोपादानको जो जानता है उसके अतिरिक्त पुरुष कर्माशयका ज्ञाता अन्य नहीं है (अन्यत्रापि) विवादास्पद कार्य उपादान सम्प्रदान प्रयोजन ज्ञातृकर्तृक हे। घटादिवत् सावयव होनेसे दोनोंके मतमें कार्यत्वभी सिद्ध है। अत' सर्वात्मक होनेसे सर्वज्ञत्वभी सिद्ध हुआ अज्ञको कर्तृत्व नही हो सकता हे सर्वका कर्ता होनेसे सर्वज्ञ है जो जिसका साधन फलादि जानता है सोई उसको करता है यह सिद्ध है ॥ ७ ॥ अस्तु तर्हि स्वतन्त्र ईश्वर कर्त्ता स तु तावदशरीर घटादिका- र्य्यस्य शरीरवता कुलालादिना क्रियमाणत्वदर्शनात् । शरी- रवत्त्वे चास्मदादिवदीश्वरः क्लेशयुक्तोऽसर्वज्ञ परिमितशक्ति प्राप्नुयादिति चेन्मैवं मंस्था अशरीरस्याप्यात्मन स्वशरीरस्प- न्दादौ कर्तृत्वदर्शनादभ्युपगम्यापि ब्रूमहे शरीरवत्त्वेऽपि भगवतो न प्रागुक्तदोषानुषङ्ग परमेश्वरस्य हि मलकर्मादिपाशजालास- म्भवेन प्राकृतं शरीरं न भवति किन्तु शाक्तं शक्तिरूपैरीशाना- दिभिः पञ्चभिर्मन्त्रैर्मस्तकादिकल्पनायामीशानमस्तकस्तत्पु- रुषवक्रो ऽघोरहृदयो वामदेवगुह्य सद्योजातपाद ईश्वर इति प्रसिद्ध्या यथाक्रमानुग्रहितिरोभावादानलक्षणस्थितिलक्षणो-