भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १५१ ) विषयीकी चेष्टा करना शृङ्गार है उन्मत्तके समान लोकनिन्दित कर्मकरना अवितत्क- रण है। पागलोंकी समान परस्पर व्याहत और अपार्थशब्दका उच्चारण करनाऽ अवितद्भाषण है ॥ १२ ॥ गुणभूतस्तु चर्याऽनुग्राहकोऽनुस्नानादिः भैक्ष्योच्छिष्टादि- निर्मितायोग्यताप्रत्ययनिवृत्त्यर्थं । तदप्युक्तं सूत्रकारेण । अनु- स्नाननिर्माल्यलिङ्गधारीति ॥ तत्र समासो नाम धर्म्मिमात्राभि- धानम् । तच्च प्रथमसूत्र एव कृतम् । पञ्चानां पदार्थानां प्रमा- णत पञ्चाभिधानं विस्तरः । स खलु राशीकरभाष्ये द्रष्टव्यः । एतेषां यथासम्भवं लक्षणतोऽसङ्करेणाभिधानं विभागः । स तु विहितशास्त्रान्तरेभ्योऽमीषां गुणातिशयेन कथनं विशेषः ॥ १३ ॥ गुणभूत चर्या अनुग्राहक और अनुस्नानादि है । भिक्षा उच्छिष्टादिनिर्मित अयो- ग्यताप्रवृत्तिके लिये है धर्मी मात्रका कथन समास है यह प्रथमसूत्रमे कहा है । पांचों तत्त्वोंके पाच पाच भेद कथन विस्तार है । वह राशीकरके भाष्यसे जानले । इन्हीको पृथक् लक्षणोंसे कथन विभाग है । वह शास्त्रान्तरसे विशेष गुणातिशयका कथन है ॥ १३ ॥ तथाहि अन्यत्र दुःखनिवृत्तिरेव दुःखान्तः इह तु पारमैश्वर्य्य- प्राप्तिश्च । अन्यत्राभूत्वा भावि कार्य्यमिह तु नित्यं पश्वादि । अन्यत्र सापेक्षं कारणम् इह तु निरपेक्षो भगवान् एव । अन्यत्र कैवल्यादिफलको योग इह तु पारमैश्वर्य्यदुःखान्तफलकः । अन्यत्र पुनरावृत्ति स्वर्गादिः इह पुनरपुनरावृत्तिरूप सामी- प्यादिफलकः ॥ १४ ॥ अन्यत्र मतान्तरमें दुःखनिवृत्तिमात्रको दुःखका अन्त कहा है परन्तु इस मतमें पारमैश्वर्यप्राप्तिभी माने जाते हैं अन्यत्र अविद्यमानकी उत्पत्तिही कार्य है। इसमें पश्वादि नित्य कार्य है । अन्यत्र कारण सापेक्ष रहता है । यहां निरपेक्ष भगवान् कारण हैं अन्यत्र योगका फल केवल्य है यहाँ दुःखान्त और पामैश्वर्य प्राप्तिभी है अन्यत्र स्वर्गादि पुनरावृत्तियुक्त अर्थात् नाशवान् है यहाँ पुनरावृत्तिरहित सामीप्य फलक है ॥ १४ ॥