भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( १५२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पाशुपत- ननु महदेतदिन्द्रजालं यन्निरपेक्षः परमेश्वरः कारणमिति तथात्वे कर्मवैफल्यं सर्वकार्याणां समसमयसमुत्पादश्चेति दोषद्वयं प्रादु- ष्यात् मैवं मन्येथा व्यधिकरणत्वात् । यदि निरपेक्षस्य भगवत कारणत्वं स्यात्तर्हि कर्मणो वैफल्ये किमायाताम् । प्रयोजनाभाव इति चेत् कस्य प्रयोजनाभावः । कर्मवैफल्ये कारणं किं कर्मिण किं वा भगवतः । नाद्यः ईश्वरेच्छानुगृहीतस्य कर्मणः सफलत्वो- पपत्तेः तदनुगृहीतस्य ययातिप्रभृतिकर्मवत् कदाचित् निष्फल- त्वसम्भवाच्च । न चैतावता कर्मस्वप्रवृत्तिः कर्षकादिष्वपपत्तेः ईश्वरेच्छायतत्वाच्च पशूनां प्रवृत्तेः । नापि द्वितीयः परमेश्वरस्य पर्याप्तकामत्वेन कर्मसाध्यप्रयोजनापेक्षाया अभावात् । यदुक्तं समसमयसमुत्पाद इति तदप्ययुक्तम् अचिन्त्यशक्तिकस्य पर- मेश्वरस्येच्छानुविधायिन्या अव्याहतक्रियाशक्त्या कार्यकारि- त्वाभ्युपगमात् । तदुक्तं सम्प्रदायविद्भि - "कर्मादिनिरपेक्षस्तु स्वेच्छाचारी यतो ह्यहम् । ततः कारणतः शास्त्रे सर्वकारण- कारणम् ॥” इति ॥ १५ ॥ यह बडा भारी इन्द्रजाल हे कि परमेश्वर निरपेक्षही कारण बन जाते है ऐसा हो तो कर्मही विफल होगा ओर संपूर्ण कार्य एकही समय उत्पन्नभी होने लगेंगे यहभी नहीं आपका कथन विपरीत हे निरपेक्ष भगवान्‌को कारण माननेसे कर्म विफल होनेपर क्या होता है । प्रयोजनाभाव कहोगे तो किसका प्रयो जनाभाव है । कर्मवैफल्यमें क्या कर्मी कारण हे या भगवान् कारण है ? (उत्तर) भगवान्‌को ईश्वरेच्छासे अनुगृहीत कर्मका सफलत्व सम्भव हे अतः प्रथम पक्षको कह नहीं सकते । ययाति प्रभृतिके कर्मके समान कदाचित् ईश्वरानुगृहीत कर्मभी विफल हो सकता है क्योंकि इतनेहीसे कर्ममें प्रवृत्तिका अभाव सम्भव नहीं कृषकोंके समान कर्ममें प्रवृत्ति हो सकता है परमेश्वर आप्तकाम होनेसे सकर्म साध्य प्रयोज- नकी अपेक्षाभी नहीं है समकालमें सब कार्य होनेलगेगा। यहभी नहीं अचिन्त्यशक्ति परमात्माकी इच्छाधीन क्रियाशक्ति कार्यनिर्वाहक मानी है अतएव साम्प्रदायिकोंने कहा है जिनसे परमात्मा कर्मादि निरपेक्ष स्वेच्छाचारी है इसीसे शास्त्रमें सम्पूर्ण कारणोंको भी कारण कहा है ॥ १५ ॥