भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १०६ ) षड्दर्शनप्रद । [ मी- वेशविशिष्टत्वाद् विनश्वरत्वाद्वा घटादिवत् तेन च कार्य्यत्वेन बुद्धिमत्पूर्वकत्वमनुमातुं सुकरमेव। क्षितं सकर्तृकं कार्य्यत्वात् घटवत् यदुक्तसाधनं तदुक्तसाध्यं न यन्नैव न तन्नैव यथा- त्मादि । परमेश्वरानुमानप्रामाण्यस्यानुपानमन्यत्रकारी- त्युपरम्यते ॥ ५ ॥ यदि कहो-पहिले देहादिका कार्य्यकर्ता सिद्ध नहीं पश्चात् देहो बनानेवालेको किसीने नहीं देखा सत्य कहते हो तो भी देहके बनाने हुए किसीको नहीं देखनेसेही कर्त्ताका निषेध नहीं कर सक्ता क्योंकि अनुमानसेभी कर्त्ता सिद्ध हो सकता है। सावयव और अनित्य होनेसे घटादिके समान देहादिक कार्य्य हैं। देहादिक कार्य्य होनेसे सकर्तृक हैं इत्यादि अनुमानसे कर्त्ता सिद्ध होनेपर बुद्धिमत्कर्तृ- कत्वभी सुलभ है इसी प्रकार क्षित (धराधामरूप) भुवनादिकभी घटादिके समान कार्य्य होनेसे सकर्तृक हैं जो जो उक्त साधन (कार्य्य) हो वह सब सकर्तृक हैं जो सकर्तृक नहीं वह कार्य्यभी नहीं जैसे आत्मा परमेश्वरानुमानका प्रामाण्य अन्यत्र कुसु- माञ्जल्यादि ग्रन्थमें दिखाया है अत विराम लेना ॥ ५ ॥ "अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मन सुखदु खयो । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा॥" इति न्यायेन प्राणिकृतकर्मा- पेक्षया परमेश्वरस्य कर्तृत्वोपपत्ते । न च स्वातन्त्र्यविहतिरि- तिवाच्यं करणापेक्षया कर्तु स्वातन्त्र्यविहतेरनुपलम्भात् कोषाध्यक्षापेक्षस्य राज्ञ प्रसादादिना दानवत् । यथोक्तं सिद्ध गुरुभि - "स्वतन्त्रस्याप्रयोज्यत्वं करणादिप्रयोक्तृता । कर्तृ स्वातन्त्र्यमेतद्धि नच कर्माद्यपेक्षता ॥" इति ॥ ६ ॥ जीव अज्ञ और अपने सुखदुःखकी निवृत्तिके लियेभी समर्थ नहीं है ईश्वरकी प्रेरणासे स्वर्ग अथवा नरक जाता है। इत्युक्त प्रकार प्राणी कर्म्मकी अपेक्षासे ईश्वरका कर्तृत्व है। यदि कहो स्वतन्त्रताकी हानि होगी सो ऐसा नहीं कहसकते कारणकी अपेक्षा करनेसे कर्त्ताके स्वातन्त्र्यकी हानि कही दृष्ट नहीं है जिस प्रकार दानादिमें कोषाध्यक्षकी अपेक्षा करनेसे राजाका स्वातन्त्र्य भंग नहीं होता प्रत्युत स्वातन्त्र्य रक्षित होता है यथा सिद्धगुरुने कहा है कि स्वतन्त्रका अप्रयोज्यत्व और करणा- दिका प्रयोजकत्व यही कर्त्ताका स्वातन्त्र्य है कर्मादि निरपेक्षता स्वातन्त्र्य नहीं है ॥ ६ ॥

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