सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १३९ ) तत् अविकृतं नित्य नामधेयं मृत्तिकेत्यादिकमित्येतद्वचनं सत्य- मिति तथ्यस्य स्वीकारात् । अपरथा नामधेयमेवेतिशब्दयो- र्वैय्यर्थं प्रसज्येत अतो न कुत्रापि जगतो मिथ्यात्वसिद्धि । किञ्च प्रपञ्चो मिथ्येत्यत्र मिथ्यात्व तथ्यमतथ्यं वा । प्रथमे सत्याद्वैत- भङ्गप्रसङ्ग । चरमे प्रपञ्चसत्यत्वापातः ॥ ३६ ॥ घटादि विकार और नाम वचनमात्र है ऐसे रहनेमे कार्यको मिथ्यात्वकी आश- ङ्का नही कर सक्ते जिसका विकार वाक् व्यवहारार्थ है अविकृत मृत्तिका इत्यादि नामधेय सत्य है यही अर्थ है अत मिथ्यात्वशङ्काभी नहीं हो सकती अन्यथा नामधेय और इति ये दोनों पद व्यर्थ होंगे अतः कहीं भी जगत्का मिथ्यात्व प्रतिपादन नही है ( और भी ) प्रपञ्चको मिथ्या कहनेवालेके मतम मिथ्यात्व सत्य है या असत्य ! यदि सत्य मानो तो अद्वैतकी हानि होगी क्योंकि ब्रह्म और प्रपञ्च मिथ्या दोनों सत्य हो गये । असत्य मानो तो मिथ्यात्वका असत्यत्व होनेसे प्रपञ्चका सत्यत्व होगा ॥ ३६ ॥ नन्वनित्यत्वं नित्यमनित्यं वा उभयथाप्यनुपपत्तिरित्याक्षेपव- द्वयमपि नित्यसमजातिभेदः स्यात् । तदुक्तं न्यायनिर्वाणवेधसा "नित्यमनित्यभावादनित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसम " इति॥तार्किक- रक्षायाञ्च- धर्मस्य तदतद्रूपविकल्पानुपपत्तित । धर्मिणस्त- द्विशिष्टत्वभङ्गी नित्यसमो भवेत् "॥ इति ॥ अस्या सञ्ज्ञाया उपलक्षणत्वमभिप्रेत्याभिहितं प्रबोधसिद्धौ अन्वर्थित्वात्तूषरञ्ज- कधर्मसमेति । तस्मात् सदुत्तरमेतदिति चेत् ॥ ३७ ॥ यदि कहो अनित्यत्व नित्य है या अनित्य ? दोनों पक्षोंमें अनुपपत्ति होती है अत इस आक्षेपके समान यह भी आक्षेप नित्य सजातीयका एक भेद है अतएव न्यायनिर्णयम कहा है अनित्य स्वभाव होनेसे अनित्यभी अनित्य हो तो नित्य समान होगा । तार्किक रक्षामेभी कहा है अनित्यत्वरूप धर्म्मको नित्यानित्य विकल्पसे धम्मीको अनित्यातारूप धर्मयुक्तत्व असम्भव होनेसे नित्यकी समान होगा इस कारण मिथ्यात्वादि सज्ञा उपलक्षणमात्र हे अतएव प्रबोधसिद्धिमें कहा हे कि अन्वर्थ होनेमे उपरञ्जकमात्र है अत उत्तर समीचीन है ॥ ३७ ॥