भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १३३ ) 'महामायेत्यविद्येति नियतिर्मोहिनीति च । प्रकृतिर्वासनेत्येव तवेच्छानन्त कथ्यते॥ प्रकृति प्रकृष्टकरणाद्वासना वासयेद्यतः । अ इत्युक्ते हरिस्तस्य मायाऽविद्येति संज्ञिता ॥ मायेत्युक्ता प्रकृष्टत्वात् प्रकृष्टे हि मया भिदा । विष्णोः प्रज्ञप्तिरेवैका शब्दै- रेतैरुदीर्य्यते ॥ प्रज्ञप्तिरूपो हि हरि सा च स्वानन्दलक्षणा ॥ इत्यादिवचननिचयप्रामाण्यबलात् ॥ २० ॥ प्रकृत्यादि संज्ञाके हेतुको कहते हैं प्रकर्षरूपसे अर्थात् असम्भावितकोभी समा- वित करनेसे प्रकृति और वासित करनेसे वासना हे । अशब्द हरिका वाचक है उन्हीं हरिकी माया ( इच्छा ) को अविद्या कहते हैं । अस्य विद्या अविद्या ऐसा विग्रह होता है प्रकृष्ट कार्य करनेसे प्रकृति और माया इत्यादि शब्द विष्णुके ज्ञानविशेषको कहते हैं वह ज्ञानस्वरूप भगवान्‌का आनन्दलक्षण हे ॥ २० ॥ सैव प्रज्ञा मानत्राणकर्त्री च यस्य तन्मायामात्रं ततश्च परमेश्व- रेण ज्ञातत्वाद्रक्षितत्वाच्च न द्वैतं भ्रान्तिकल्पितं, न हीश्वरे सर्वस्य भ्रान्ति सम्भवति विशेषादर्शननिबन्धनत्वाद्भ्रान्तेः । तर्हि तद्व्यपदेश कथमित्यत्रोत्तरम् 'अद्वैतं परमार्थतः' इति पर- मार्थापेक्षया तेन सर्वस्मादुत्तमस्य विष्णुत्तत्तस्य समाभ्यधि- कशून्यत्वमुक्तं भवति ॥ २१ ॥ वही प्रज्ञा मान ओर रक्षा करनेवालीभी हे जिनके मतम द्वेत मायामात्र हे उनके मतमें परमेश्वरसे ज्ञात ओर रक्षित होनेसे द्वेत कदापि कल्पित नहीं होसकता । सर्वज्ञ परमात्मामें भ्रान्ति हो नहीं सकती क्योंकि भ्रान्ति विशेष दर्शन न होनेसे होती ह यथा रज्जुम सर्पका भ्रम केवल दण्डाकारता मात्र देखकर होता हे ईश्वर सर्वज्ञ होनेसे सर्वदा विशेष दर्शन बना रहेगा । यदि ईश्वरमे भ्रम नही हो सकता है तो पुन अद्वैत व्यवहार श्रुतिने केसे किया? इसका उत्तर देते हैं--कि ( परमार्थतः इति ) परमार्थपक्ष लेकर अद्वैत हे अभिप्राय यह है 'न तत्समश्चाभ्यधिकः कुतोऽन्यः' इत्यादि श्रुतियोंसे भगवान् विष्णुके सम ओर अधिक कोईभी न होनेसे अद्वैत ( अद्वितीय ) कहे जाते हैं । अतएव श्रीयामुनाचार्यनेभी कहा हे “यथा चोलनृपः सम्राडद्वितीयोऽत्रभूतले । इति तत्तुल्यनृपतिनिवारणपरं वचः । नतु तत्पुत्रपौत्रादिनि- वारणपरं भवेत् ॥ " इत्यादि ॥ २१ ॥