भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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(१३२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पूर्णप्रज्ञ- कालमें लयाभाव कहा है इद ज्ञानेत्यादिमे । अतएव 'तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जन परम साम्यमुपैति" इत्यादि श्रुति'भोगमात्र साम्यलिङ्गात्' इत्यादि ब्रह्मसूत्र संगत होते है। सूत्रान्तरमे भी मुक्तात्माको जगत् सृष्टि आदि व्यापारको छोडकर ब्रह्मके समस्त गुण कहे है अतो वेत्यादि वाक्यमें सन्निहित ब्रह्म है जीव नही अत प्रकरणवश और सन्निहित न होनेके कारण तदतिरिक्त आनन्दादि गुणही मुक्तात्माका है ॥ १७ ॥ न च 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इति श्रुतिबलाज्जीवस्य पारमै- श्वर्य्यं शक्यशङ्कं 'सम्पूज्य ब्राह्मणं भक्त्या शूद्रोऽपि ब्राह्मणो भवेत्' इतिवत् सहितो भवतीत्यर्थपरत्वात् । ननु “प्रपञ्चो यदि वर्त्तेत निवर्त्तेत न संशय । मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥” इति वचनात् द्वैतस्य कल्पितत्वमवगम्यत इति चेत् ॥ १८ ॥ अद्वैतिकी आशङ्का-नचेत्यादि । ब्रह्मको जाननेवाले ब्रह्मरूप होते है ऐसे श्रुति भगवती कहती है अत जीव और ब्रह्मका अभेद सिद्ध होता है । समाधान- ब्राह्मणोंकी सेवा और शुश्रूषाआदि करनेसे शूद्रभी ब्राह्मण हो जाता है इत्यादि वत् सन्निहित अथवा सादृश्य उसकाभी अर्थ है (ननुइति) यदि प्रपञ्च है तो घटादि वत् अवश्य नष्टभी होगा क्योंकि यह समस्त वस्तु मायासे कल्पित मात्र है वास्तवमे अद्वैतही है ॥ १८ ॥ सत्यं भावमनभिसन्धायभिधानात् । तथाहि यद्ययमुत्पद्येत तर्हि निवर्त्तेत न संशय । तस्मादनादिरेवाय प्रकृष्ट पञ्चविधो भेदप्रपञ्च । न चायमविद्यमानो मायामात्रत्वान्मायोति भगव- दिच्छोच्यते ॥ १९ ॥ यहभी वास्तविक भावका अनुसंधान नही करते है क्योकि यदि घटादिवत् आत्मा उत्पन्न होना हो तो अवश्यही विनष्ट भी होता परन्तु ऐसा उत्पन्न नही होता है निम्नलिखित पाँच प्रकारके भेद अनादि है अत यह प्रपञ्च अविद्यमान नही मायामात्रमित्थम् पदार्थ भी मायाशब्द सदसदनिर्वचनीयत्व नही किन्तु, भगवत्स्वरूपरा वाची माया शब्द है महामाया, अविद्या, नियति, मोहिनी, प्रकृति वासना यह सब भगवद्रूपी इच्छाको कहते है ॥ १९ ॥