सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( १३१ )
ब्राह्मणादि दाहिनी भुजामें सुदर्शन और बाईं भुजामें शंखको धारण करे ऐसा वेदवेत्ता लोग कहते हैं। चक्रधारणमन्त्र-सुदर्शनेत्यादि । शंखधारण मन्त्र-त्वं पुरेत्यादि ॥ १५ ॥ नामकरणम्-पुत्रादीनां केशवादिनाम्ना व्यवहारः सर्वदा तन्नामा- नुस्मरणार्थम् । भजनं दशविधं वाचा सत्यं हितं प्रियं स्वाध्या- यः कायेन दानं परित्राणं परिरक्षणं मनसा दया स्पृहा श्रद्धा चेति । अत्रैकैकं निष्पाद्य नारायणे समर्पणं भजनम् । तदुक्तम्- "अङ्कनं नामकरणं भजनं दशधा च तत् " इति ॥ १६ ॥ पुत्रादिकोंको केशवादि नाम करना नाम करण है। यह सदा भगवन्नामके स्मरणके लिये है. वचनसे सत्य हितकर और प्रिय बोलना, वेदाध्ययन करना, शरीरसे दानदेना, भयसे मुक्तकरना, रक्षाकरना, मनसे दयाकरना, भगवद्विषयमें श्रद्धा भक्ति करना यह दशविध है इनमेंसे एक एकको सम्पादनकरकर श्रीमन्नारायणके चरणोंमें अर्पण करना भजन है जङ्कनमित्यादि पद्यका पूर्वोक्त अर्थ है ॥ १६ ॥ एवं ज्ञेयत्वादिनापि भेदोऽनुमातव्य , तथा श्रुत्यापि भेदोऽव- गन्तव्य । "सत्यमेतमनुविश्वे मदन्तिराति देवक्य गृणतो मघोनः सत्यासो अस्य महिमागृणे शको यज्ञेषु विप्रराज्ये सत्य आत्मा सत्यो जीव सत्यं भिदा सत्यं भिदा मयि वारुण्यो मयि वारुण्यो मयि वारुण्यः " इति मोक्षानन्दभेदप्रतिपादकश्रुतिभ्यः "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥" ' जगद्व्यापारवर्जप्रकरणादसन्निहित- त्वाच्च' इत्यादिभ्यश्च ॥ १७ ॥ उपास्य उपासक ज्ञेय ज्ञातृभाव होनेसे भी ईश्वर और जीवके अत्यन्त भेदका अनुमान किया जाता है अर्थात् ईश्वर उपास्य और जीव उपासक है एव श्रुतिसे भी यह प्रतिपादित होता है (सत्यमेतमित्यादि) ऋग्वेदका मन्त्र है । इसमें सत्य आत्मा सत्योजीव इत्यादिसे भेद स्पष्टही प्रतिपादित है । भगवद्गीतामे भी पूर्वोक्त क्षेत्र क्षेत्रज्ञ और ईश्वरके स्वरूपका ज्ञानपूर्वक भगवत्की उपासनासे भगवत्के समान धर्म ( स्वरूपका अभेद ) को प्राप्त जीवको पुनः सृष्टिकालमें उत्पत्ति और प्रलय