सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२६०) सर्वदर्शनसंग्रहः। [पूर्णप्रज्ञ- तद्विष्णोः परमं पदं येन गच्छन्ति लाञ्छिताः। उरुक्रमस्य चिह्नै- रङ्किता लोके सुभगा भवन्ति" इति॥ १३॥ 'अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समासत' इति तैत्तिरीय- कोपनिषद्य् ॥ १४॥ (देवाश्च येनेति) जिस सुदर्शन चक्रसे अङ्कित भुजयुक्त देवगण शरीरत्यागके अनन्तर उस परमात्माको प्राप्त होते हैं। जिससे अङ्कित होनेसे मन्वादि लोकसृष्टिको करते हैं। जिस सुदर्शनसे अंकित अर्थात् तप्तमुद्रा धारण करनेवाले ब्राह्मणलोग परमपदको प्राप्त होते हैं। ऋग्वेदीय मन्त्र (पवित्रमित्यादि) ब्रह्मणः पते ! चतुर्मुख ब्रह्माके स्वामिन् (नियामक) विष्णो, विभु चेष्टानुकूलसङ्कल्पाश्रय आप, विश्वत गात्राणि पर्येषि-स्वा- श्रित समस्त चेतनोंके शरीरमें अन्तर्यामी रूपसे व्याप्त होते । पवित्रं ते विततमिति आपका आत्मिक जन शरीरमें अग्निसन्तापसे जायमान चिह्नद्वारा व्याप्त सुदर्शन हे तादृश सुदर्शनसे जिनका भुजमूल तप्त न हो वह आम अर्थात् अतप्त पाप है मोक्षहे- तुभूत उपासनादिका प्रतिबन्धक पाप नष्ट नहीं है अतः तत् ब्रह्मको "ओम् तत् सत् इति ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः" इति स्मृतिके प्रमाणसे तत् शब्द ब्रह्मका वाचक है। नाश्नुते नहीं प्राप्त होते हैं। ( इत् वहन्त.) यह तप्त सुदर्शनको धारण करनेवाले शृतासः विनष्टपाप हैं अतः तत् समश्नुते ब्रह्मको प्राप्त होते हैं अर्थात् मोक्षके अधिकारी होते हैं। "सुदर्शने च दर्भे च पवित्रं चरणस्रुचके "। "सुदर्शनं सहस्रारं पवित्रं चरणं पवि " इत्यादि वेदनिघण्टु वचनोंसे तथा "पवित्रं चरणं नेमि रथचक्रं सुदर्शनम् " इत्यादि पद्मपुराण वचनात्से पवित्र शब्द सुदर्शनचक्रमें रूढ है (उरुक्रमस्येति) वामनभगवान्के चिह्नोंसे अङ्कित होनेसे लोकमें पुण्यशाली होते हैं॥ १३॥ १४॥ स्थानविशेषश्चाग्नेयपुराणे दर्शितः।"दक्षिणे तु करे विप्रो बिभृ- याच्च सुदर्शनम्। सव्येन शंखं च बिभृयादिति ब्रह्मविदो विदुः ॥" इति । अन्यत्र चक्रधारणे मन्त्रविशेषश्च दर्शितः।"सुदर्शन महा- ज्वाल कोटिसूर्य्यसमप्रभ । अज्ञानान्धस्य मे नित्यं विष्णोर्मार्गं प्रदर्शय ॥ त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे ॥ नमितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते"॥ इति ॥ १५॥