भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १३४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ- तथाच परमा श्रुति - "जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा । जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ॥ मिथश्च जडभेदो यं प्रपञ्चो भेदपञ्चकः । सोऽयं सत्योऽप्यनादिश्च सादिश्चेन्नाशमा- प्नुयात् ॥ न च नाशं प्रयात्येप न चासौ भ्रान्तिकल्पित । कल्पितश्चेन्निवर्त्तेत न चासौ विनिवर्त्तते ॥ २२ ॥ भेदपञ्चक-जीवका ईश्वरके साथ भेद १ जड और ईश्वरका भेद २ जीवोंके परस्पर भेद ३ जड और जीवका भेद ४ जडका परस्पर भेद ५ यह पाँच भेदात्मक प्रपञ्च है यह सभी भेद सत्य और अनादि हैं यदि सादि होते तो अवश्य नष्ट होते परन्तु एतादृश भेदका कदापि नाश नहीं होता है एव यह प्रपञ्च भ्रान्तिकल्पि- तभी नहीं क्योंकि कल्पित होता तो अवश्य निवृत्तभी होता परन्तु प्रपञ्चकी निवृत त्तिभी नहीं होती है ॥ २२ ॥ द्वैतं न विद्यत इति तस्मादज्ञानिना मतम् । मतं हि ज्ञानिना- मेतन्मितं त्रातं हि विष्णुना ॥ तस्मान्मात्रमिति प्रोक्तं परमो हरिरेव तु ॥" इत्यादि । तस्माद्विष्णो सर्वोत्कर्ष एव तात्पर्य्यं सर्वागमानाम् ॥ २३ ॥ यह अज्ञानियोंका कहना है कि द्वैतरूप प्रपञ्च हेही नहीं विष्णुसे ज्ञात और रक्षित होनेसे द्वैत सत्य है । यह तत्त्वज्ञानियोंका मत है-अत यह सब मात्र अर्थात् अल्प है सर्वोत्कृष्ट भगवान् विष्णु है । अत विष्णुको सर्वोत्कर्ष बोधनमें सम्पूर्ण आगमका तात्पर्य है ॥ २३ ॥ एतदेवाभिसन्धायाभिहितं भगवता - 'द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षर- श्चाक्षर एव च । क्षर सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ उत्तम- पुरुषस्त्वन्य परमात्मेत्युदाहृत । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्त्यव्यय ईश्वर ॥ यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित पुरुषोत्तम ॥ २४ ॥ जगत्में क्षर और अक्षर भेदसे दो प्रकारके पुरुष प्रसिद्ध हैं । संपूर्ण संसारी चेतन ब्रह्मादि स्तंभपर्यन्त क्षरण स्वभाव प्रकृति सम्बन्ध उपाधिके वश क्षर कहाते हैं प्रकृतिसम्बन्धविनिर्मुक्त मुक्तात्मा अक्षर है । वह अचित् परिणाम ब्रह्मादि देहस