भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । , ( १२३ )

पूर्णप्रज्ञ ( मध्व ) सिद्धान्त ।

यद्यपि रामानुजीय मतमें कहे हुए जीवका अणुपरिमाणत्व वेदापौरुषेयत्व उपनि- दको सिद्ध ब्रह्म बोधकत्व प्रमाणका स्वतः प्रामाण्य "प्रत्यक्षमनुमानञ्च शास्त्र च त्रिवि- धागमम् " इत्यादि स्मृतिबलसे प्रत्यक्षादि प्रमाणत्रयत्व "पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् " इत्युक्त प्रकार पंचरात्रागमका प्राधान्यादि और प्रपंचसत्यत्वादि सिद्धान्त सम्मत है तथापि भेदश्रुति अभेदश्रुति घटकश्रुतिरूप त्रिविध श्रुति प्रतिपादित होनेपरभी शरीर शरीरीभावमे भेद अभेद और विशिष्टत्वादि पक्षत्रय मानना पूर्वोक्त जैनसिद्धान्तके समान है। अतः तत्त्वमस्यादिवेदान्तवाक्योंका प्रकारान्तरसे व्याख्यानके लिये ब्रह्मसूत्रविवरणव्याजसे प्रस्थानान्तर करते है ॥ माध्वमतमे संक्षेपतः स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र रूप दो तत्त्व हैं समस्तकल्याणगुणाकर हेयगुणरहित भगवान् विष्णु स्वतन्त्र तत्त्व है ॥ १ ॥ ननु सजातीयविजातीयस्वगतनानात्वशून्यं ब्रह्म तत्त्वमि- तिप्रतिपादकेषु वेदान्तेषु जागरूकेषु कथमशेषसद्गुणत्वं तस्य कथ्यत इति चेन्मैवम्, भेदप्रमापकबहुप्रमाणविरोधेन तेषां तत्र प्रामाण्यानुपपत्तेः । तथाहि प्रत्यक्षं तावदिदमस्माद्भिन्नमिति नीलपीतादेर्भेदध्यक्षयति ॥ २ ॥ प्रत्यक्ष श्रुतिविरुद्ध होनेसे उक्त विभागके असंगतत्वकी आशंका करते है(ननुज्ञेति) "सदेवसोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् " इस श्रुतिमें सत् पदसे असत्रूपकी व्या- वृत्ति है एवपदसे विजातीय अचेतन व्यावृत्ति और एकपदसे सजातीय जीवादि व्यावृत्ति है अद्वितीयपदसे स्वगत भेदकी व्यावृत्ति होती है। एवंच समस्त भेदशून्य निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्मस्वरूप बोधक वेदान्तके रहते विविध भेद सत्यत्व मानना सर्वथा अप्रामाणिक है। परिहार करते है ( मैवमित्यादि)"पृथगात्मानं प्रेरितारञ्च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति " " नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विद- धाति कामान् " इत्यादि भेदप्रतिपादक अनेक श्रुतियोंके विरोध होनेसे सदेवेत्यादि श्रुतियोको वास्तवमें अभेदबोधकत्व नही हो सकता पूर्वापरवाक्यको बिना विचारे


१ तात्पर्य यह हे " यस्यात्मा शरीरम् " इत्यादि अन्तर्यामी ब्राह्मणसे शरीर शरीरिभाव सिद्ध है शरीर शरीरीका भेदाभेदभी लोकव्यवहारसिद्ध है अत उस मतमें तीनों प्रकारकी श्रुतियों की संगति होती है । केवल भेदवादीके मतमें अभेद श्रुति एव केवल अभेदवादीके मतमें भेद श्रुति तथा दोनोंके मतमें घटक श्रुति सर्वथा बाधितार्थ रहेगी यही विशेष है।