सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२२ ) सर्वदर्शनसंग्रह । / [ पूर्णप्रज्ञ- दिङ्मात्रमत्र प्रदर्शितं विस्तरस्तनाकरादेवानगन्तव्य इति विस्तरभीरुणोदास्यत इति सर्वमनाकुलम् ॥ ५१ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे रामानुजदर्शनं समाप्तम् ॥ ४ ॥ शंका-जैसे प्रत्यक्ष और अनुमानका विषय ब्रह्म नहीं वैसेही शास्त्रकाभी विषय नहीं हो सकता क्योंकि मीमांसक कहते हैं "आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमत- दर्थानाम् " विधिप्रत्यययुक्त क्रियापरक जो वेदवाक्य है वही प्रमाण है इससे विपरीत अनर्थक है अतः प्रवृत्ति निवृत्ति अन्यतर बोधकसे रहितवाक्य सिद्ध ब्रह्म- को शास्त्रप्रतिपादन नहीं कर सकता, ऐसी शंकाके परिहारार्थ चतुर्थ सूत्रका अवतार कहते हैं 'तुशब्द' प्रकृत शंकारनिरासक है ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक हो सकता है कारण परम पुरुषार्थ बोधनद्वारा ब्रह्म बोधक होनेसे वाचकतासम्बन्धसे अन्वित है यदि कहो प्रवृत्ति और निवृत्ति बोधनशून्य वाक्य निष्प्रयोजन होनेसे अनर्थक होगा यह नहीं 'तुम्हारे पुत्र हुआ यह सर्प नहीं है' इत्यादि सिद्धवस्तुबोधक वाक्यसे भी हर्ष तथा भयनिवृत्तिरूप प्रयोजन देख पड़ता है अतः सिद्धवस्तुबोधनमें कोई अनुपपत्ति नहीं है यह केवल दिक्दर्शन मैने किया अधिक जिज्ञासु श्रीभाष्यादि प्रबन्धसे जानलें ॥ ५१ ॥ सर्वदर्शनसंग्रहम श्रीरामानुज दर्शन समाप्त । अथ पूर्णप्रज्ञदर्शनम् ॥ ५ ॥ तदेतद्रामानुजमतं जीवाणुत्वदासत्ववेदापौरुषेयत्वसिद्धार्थबो- धकत्वस्वतःप्रमाणत्वप्रमाणत्रित्वपाञ्चरात्रोपजीव्यत्वप्रपञ्चभेद- सत्यतादिसाम्येऽपि परस्परविरुद्धभेदादिपक्षत्रयकक्षीकारेण क्षपणकपक्षनिक्षिप्तमित्युपेक्षमाणः स आत्मा तत्त्वमसीत्यादिवे- दान्तवाक्यजातस्य भङ्ग्यन्तरेणार्थान्तरपरत्वमुपपाद्य ब्रह्ममी- मांसाविवरणव्याजेनानन्दतीर्थः प्रस्थानान्तरमास्थितः। तन्मते हि द्विविधंतत्त्वं स्वतन्त्रास्वतन्त्रभेदात् । तदुक्तं तत्त्वविवेके । "स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्त्वमिष्यते । स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुर्निर्दोषोऽशेषसद्गुणः ॥" इति ॥ १ ॥