भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १२० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- उससे जायमान तेज हे उससे विपरीत तद्विपर्ययज सन्तोषको उद्धर्ष कहते हैं इससे विपरीत अनुद्धर्ष हे अत्यन्त सन्तोषभी विरोधी होता हे शान्तोदान्त इत्यादि श्रुति हे एतादृश नियमविशेषोंसे आराधित परमात्माके प्रसादसे जिनके चित्तके रागादिक नष्ट हो गये हो उनको निरतिशय प्रिय ओर प्रयोजनान्तर शून्य प्रत्यक्ष तापन्न भक्तिद्वारा परम पुरुष परमात्मा प्राप्त होते हैं ॥ ४७ ॥ तदुक्तं यामुनेन-“उभयपरिकर्मितस्वान्तस्यैकान्तिकात्यन्तिकभ- क्तियोगलभ्यः” इति।ज्ञानकर्मयोगसंस्कृतान्त करणस्येत्यर्थ ॥४८॥ श्रीयामुनाचार्यजीने कहा हे-ज्ञानयोग तथा कर्मयोगसे परिशुद्धान्त.करण पुरुषको अनन्य और निरतिशय भक्तिसे परमात्मा प्राप्त होते हैं ॥ ४८ ॥ किं पुनस्तद्ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्यपेक्षायां लक्षणमुक्तं 'जन्माद्यस्य यतः'इति' जन्मादीति सृष्टिस्थितिप्रलयं तद्गुणसंविज्ञानो बहु- व्रीहि अस्याचिन्त्यविचित्ररचनारच्यस्य नियतदेशकालभोग- ब्रह्मादिस्तम्बपर्य्यन्तक्षेत्रज्ञमिश्रस्य जगत यतो यस्मात् सर्व्वे- श्वरात् निखिलहेयप्रत्यनीकस्वरूपात् सत्यसङ्कल्पाद्यनवधिका- तिशयासंख्येयकल्याणगुणात् सर्व्वज्ञात् सर्व्वशक्त पुंस सृष्टिस्थि- तिप्रलया प्रवर्त्तन्त इति सूत्रार्थ ॥ ४९ ॥ ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिये ऐसा कहा है वह ब्रह्म किंरूप हे इस आशङ्कासे ब्रह्मस्व- रूप कहते हैं ( जन्माद्यस्येति ) जन्म है आदि जिसमें ऐसे तद्गुणसविज्ञान बहुव्रीहि- समाससे जन्म, स्थिति, लय गृहीत होते हैं अभिप्राय यह है कि बहुव्रीहि दो प्रकार है एक तद्गुणसंविज्ञान दूसरा अतद्गुणसविज्ञान । प्रथममें विग्रहवाक्यगत पदके अर्थ सहित अन्य पदार्थका ग्रहण होता है यथा लम्बकर्णको लाओ दूसरेमें विग्रह वाक्य- गत पदार्थका ग्रहण नही यथा समुद्रको जिसने देखा हो उसको लाओ। तद्वत् यहापर भी जन्मसहित अन्यपदार्थका ग्रहण होता है तथा च विचित्र रचनासे रचित देश, काल, भोगसे नियत ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्य्यन्त क्षेत्रज्ञयुक्त जिस सकल हेयगु- णरहित कल्याणगुणयुक्त सर्व्वेश्वर सर्व्वज्ञ सर्व्वशक्तिमान् पुरुषसे जगत्की सृष्टि स्थिति और प्रलय हो वही ब्रह्म है । यह सूत्रार्थ है ॥ ४९ ॥ इत्थम्भूते ब्रह्मणि किं प्रमाणमिति जिज्ञासायां शास्त्रमेव प्रमा- णमित्युक्तं 'शास्त्रयोनित्वात् इति' । शास्त्रं योनि कारणं प्रमाणं